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तीन साल में 66 वर्ष का युवा 8000 किमी के हाइवे बनवाकर50 लाख मकान बनवाकरकरोडो शौचालय बनवाकर6 नए एम्स बनवाकर3 नयी पनडुब्बियां बनवाकरतेजस विमान हिन्दुस्तान में बनवाकरधनुष तोप दिलाकरOrop देकरसर्जिकल स्ट्राइक करकेतीनो सेना को मजबूत बना कर65 देशों से व्यापारिक रिश्ते बनाकरचीन को पीछे छोड़करविकास दर 7.5के ऊपर ले जाकरमहगाई 5 से नीचे लाकरफसल बीमा देकर12 रु में 2 लाख का बीमा देकरनोटबंदी करके नक्सलियों पाकिस्तानियो को दुखी करकेराफेल विमान का सौदा करकेसऊदी अरब में शेख से मंदिर बनवा केबुरहान वानी को ऊपर पहुचा केअलगाववादी कश्मीरियों को औकात में लाके। बस सब की गालियाँ खाता है। जो काम करता है, वो कभी ये नहीं कहता कि*काम बोलता है*क्योंकि *काम दिखता है।**"मोदी जी"* आप को "शर्म" आनी चाहिए कि आपने "अपने परिवार" और अपने भाइयों को अपनी "कैबिनेट" में या "राजनीति" में लाने का ज़रा भी "प्रयास नहीं किया" आप को इस बात के लिए भी "शर्म" आनी चाहिए कि आप के "भाई" साधारण नागरिक का जीवन जी रहे हैं और आप की "भतीजी गरीबी" में "मर गई" !! *"मोदी जी"* आप को "शासन चलाने" की कला *"मुलायम सिंह"* से "सीखनी" चाहिए जहाँ "सैफई" के उनके परिवार के करीब "36 सदस्य" आज *"उत्तर प्रदेश"* में "ब्लाक प्रमुख" के पदों पर सुशोभित हैं वही *"मुलायम सिंह"* जिन्हें "दो वक़्त की रोटी" भी मुश्किल से नसीब होती थी आज *"करोडपति"* ही नहीं *"अरबपति"* हैं !! "30 वर्ष" पहले *"बहन मायावती"* का "पूरा परिवार" दिल्ली में "एक कमरे" में रहा करता था, आज *"मायावती के भाई"* का "बंगला" सुन्दरता में *"ताज महल"* को भी "मात" दे रहा है !! *"देवगोडा"* अपने "पोते" को *"100 करोड़" की "बहु भाषाई फिल्म"* में बतौर *"सुपर हीरो"* उतार रहे हैं, "कर्नाटक" के "हासन जिले" में "आधी से ज्यादा" खेती की ज़मीन *"देवगोडा परिवार"* की है !! *"कर्नाटक" के मुख्यमंत्री "सिद्धारमैया"* का "बेटा" जो "सरकारी अस्पताल" में *"मुख्य चिकित्सक"* है और *"छोटा पुत्र" जिसका अभी हाल में "निधन" हुआ है, उसका "ब्रुसेल्स" में बड़ा कारोबार है, और उसके बच्चे "जर्मनी" में "पढ़" रहे हैं* *"सोनिया का दामाद"* जो कि "मुरादाबाद" में "पुराने पीतल" के आइटम "बेचा" करता था, आज *"पांच सितारा होटल" का "मालिक"* है, उसका *"शिमला" में एक "महल" है और "लक्ज़री कारों" का "मालिक" है* !!जबकि *"आप की माँ" आज भी "ऑटोरिक्शा" में चलती है और आप के "भाई ब्लू कालर जॉब" यानि मेंहनत "मजदूरी" कर रहे हैं और आप की एक "भतीजी" शिक्षामित्र है (आप उसे टीचर की नौकरी भी नहीं दिलवा पाए ) जो कि दूसरो के "कपडे सिलती" है तथा "ट्यूशन पढ़ा" कर अपनी "जीविका" चला रही है* !! *"मोदी जी"* देश बहुत "शर्मिंदा" है कि आप "प्रधानमंत्री" होते हुए भी अपने "भाइयों" को "MLA या MP" का "टिकट नहीं दिलवा पाए" आप "चाहते" तो अपनी "बहनों" को "राज्य सभा" में "MP" बनवा सकते थे और आप के *"जीजा", * "जिला स्तर" के "चुनाव लड़" कर "ब्लाक प्रमुख" तो बन ही सकते थे, *आप "सीखने" में बहुत "सुस्त" हैं* "15 वर्ष" तक "गुजरात" में और *"प्रधानमंत्री"* का "आधा कार्यकाल", *"दिल्ली"* में बिताने के बाद भी आप *"लालू, मुलायम, सोनिया गाँधी, बहन मायावती"* से कुछ भी "नहीं सीखे" और अपनी "रसोई का खर्च" भी "खुद वहन" कर रहे हैं !! ------------------------------------- उपरोक्त बातो से हमे *"शर्मिंदा"* तो होना पड़ा लेकिन उतना ही *"गर्व"* भी है कि हमने अपने जीवन का *"पहला वोट" , "2014" में एक बहुत ही "ईमानदार और देशभक्त इंसान" को वोट दिया "हम सभी गर्व" करते है की हमे अपने जीवन में आप जैसे देशभक्त का मार्गदर्शन मिला सच में "ईमानदारी और कर्तब्यनिष्ठा" की "पराकाष्ठा" है* ------------------------------------मेरे भाइयों ! इस मैसेज को ब्लास्ट कर ही दीजिए ! देशहित के लिए जरूरी है !! -------------------------------------
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👹डाकिनी मन्त्र साधना👹यह साधना अत्यंत प्राचीन है।इस साधना को करने का अधिकार तामसिक साधक को है अर्थात जो माँस मदिरा का सेवन करते हैं।सिद्ध होने पर इनके माध्यम से साधक किसी भी कार्य को सुगमता पूर्वक कर सकते है।यह क्षण मात्र में कार्य करती है।स्त्री वशीकरण, पुरुष वशीकरण, समाज के रावण, सूर्पनखाजैसे दुष्ट लोगो को दण्डित भी करती है।कार्यालयों में रुके हुए कार्य, प्रॉपर्टी के कार्य आदि को भी सुगमता से सम्पन कर देती है।।यह साधना श्मशान के किनारे, सुनसान खण्डर, कुँए अथवा बावड़ी के पास , वीराने जंगल में सिद्ध की जाती है।यह साधना मन्त्र आपको किसी भी पुस्तक से प्राप्त हो सकता है किन्तु सिद्धि विधान आपको इस पोस्ट के माध्यम से , हमारे सानिद्ध्य में अथवा किसी सिद्ध गुरु से ही प्राप्त होगा।पोस्ट में जैसी विधि कही गयी है वैसे ही करे, , तो साधक को डाकिनी सिद्ध हो जायेगी।डाकिनी का मन्त्र जाप बन्द आँखों से किया जाता है और साधना के मध्याह्म में एक बार आँख खोलकर पीली सरसों को मन्त्र से अभिमन्त्रित करके अपने चारो दिशाओ में फेंका जाता है फिर उसके बाद मन्त्र जाप किया जाता है।यह क्रिया 41 दिन करनी होती है।डाकिनी साधक के बन्द आँखों में दिखाई देती है अर्थात साधना के अंतिम दिन प्रकट होती है।कभी कभी साधक को आवाज भी देती है किन्तु डरे नही और अपने सामने रखे माँस मदिरा का भोग डाकिनी को दे, इससे वह संतुष्ट होती है और साधक को वचन देती है उसके सभी कार्य करने का और बदले में अपना भोग ग्रहण करती है।इसकी शक्ति कर्ण वैताली से ज्यादा होती है अर्थात इसमें 1000 प्रेत आत्माओ की शक्ति होती है।यह सभी भूत प्रेतों, जिन्नों, हमजादो आदि को मारकर अपने साथ ले जाती है।इसमें साधक जब भी कार्य की इच्छा करता है तुरुन्त करती है।साधक को यह बन्द आँखों में ही दिखाई देगी।1 कुशासन या बकरे या भैंसे का चर्म आसन2 बकरे की चर्बी का चिराग3 मिट्टी के वर्तन में 125 ग्राम बकरे की कलेजी अथवा माँस4 मिटटी के प्याले में सुगन्ध वाली मदिरा5 पीली सरसो 5 ग्राम रोज6 चमेली की धूप या अगरबत्ती7 निर्वस्त्र साधना करे।8 रुद्राक्ष की माला शुद्ध9 सिंदूर का तिलक अनिवार्य10 मन्त्र जाप दाहिने हाथ की ऊँगली मध्यमा और अंगूठा ।11 अमावस्या के दिन या पूर्णिमा के दिन से करे।12 दिशा उत्तर13 पवित्रीकरण, वास्तुदोष पूजन, गुरुमन्त्र, सुरक्षा मन्त्र करे।14 41 दिन की सिद्धि का संकल्प ले।15 10 माला जप करने के बाद पीली सरसों को दाहिने हाथ में रखकर 1 बार मन्त्र बोलकर फूंके और चारो दिशाओ में फ़ेंक दे फिर पुनः 11 माला मन्त्र जाप करे।16 डाकिनी जब भी साधक को आवाज दे तो साधक वचन लेकर डाकिनी सिद्ध करे।17 मन्त्र जाप बन्द आँखों से होगा।ताम्र कलश जल से भरकर रखे।18 साधना कॉल में मांस मंदिरा का सेवन एक समय करे।19 यह सिद्धि रात्रि 12 बजे से शुरू करे और सूर्यास्त से पहले पूरी 21 माला करे।20 साधक का साधना स्थल देव मन्दिरो आदि से 200 मीटर की दूरी पर हो।साधना स्थल पर किसी भी देवी देवता की मूर्ति नही होनी चाहिये।21 यह सिद्धि बाममार्गी है।22 41 वे दिन बंद आँखों में डाकिनी काली सी औरत की तरह खुले वालो वाली निर्वस्त्र दिखाई देगी तभी साधक समझ जाय की डाकिनी सिद्ध हो गयी है और भोग अर्पण करे।मांस मदिरा रोज साधना स्थल पर खुला छोड़ दे और सो जाये। 4 बजे तक साधना पूर्ण कर ले और जमीन पर माँस मदिरा डाल कर सो जाय।23 साधना काल में अनेक भयंकर आवाजे आती है यह आवाजे आत्माओ, प्रेतों, भूतो चुड़ैलों आदि इतर योनियों की होती है जो साधक इसको सिद्ध करते है उनको चाहिये की जब उनकी सभी आवश्यकताएं पूरी हो जाय तो इस सिद्धि का विसर्जन कर दे इसमें साधक को हमें अपना नाम माता , पिता का नाम फ़ोटो वर्तमान एड्रेस भेजे , तब दिव्य शक्ति प्रयोग से डाकिनी का संहार रात्रि काल में कर दिया जाता है और साधक को उस समय शरीर में एक झटका लगता है जिस समय डाकिनी का वध कर उसको डाकिनी योनि से मुक्त कर पुनर्जन्म हेतु विष्णुलोक भेज दिया जाता है।इससे साधक डाकिनी से मुक्ति पा लेता है और दूसरा डाकिनी को भी मुक्ति मिल जाती है तीसरा साधक जन भलाई करता है चौथा साधक के पास अतुल धन सम्पदा हो जाती है, जो साधक की आने वाली पीढ़ियों के लिये भी पर्याप्त होती है।( जिन साधको को कई कई साल बीत चुके है और उनको सिद्धियां प्राप्त नही हुयी है और ऐसे साधक जो गुरुओ को निरंतर बदलते रहते है, संपर्क कर सकते है, उनको प्रथम बार में सिद्धि सिद्ध करायी जा सकती है, धनलोभी साधक संपर्क न करे।)मन्त्रॐ स्यार की खवासिनी समन्दर पार धाईआव बैठी हो तो आवठाडी हो तो ठाडी आवजलती आ उछलती आन आये डाकिनी तो जालंधर पीर की आनशब्द साँचापिण्ड काँचाफुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ।
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जन्मपत्रिका के फल का प्रतिपादन किया जाए तो वह निश्चित रूप से सटीक होगा। 1) लग्न भाव का स्वामी अर्थात लग्नेश किसी भी भाव में, किसी भी राशि में हो, वह अशुभ फल नहीं देगा। लग्नेश की अशुभता होने पर मन के अनुकूल भले ही फल प्राप्त न हो किन्तु जातक के लिए हानिकारक फल नहीं होंगे। 2) छ्टे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी यदि अशुभ ग्रह हो तो जन्मपत्रिका में जिस भाव में होंगे उस भाव के फलों का नाश ही करेंगे। जबकि इन भावो के स्वामी शुभ ग्रह हो तो शुभ फलों की मात्रा में कमी होगी। 3) केंद्र और त्रिकोण के स्वामी जन्मपत्रिका में जिस भाव में बैठेंगे उसके फलों को शुभत्व प्रदान करेंगे। यही फल उनकी दृष्टि होने पर भी होगा। 4) किसी भी जन्मपत्रिका में गुरु और केतु छठे भाव में होने पर जातक के रोग और शत्रुओं का नाश करते है, जबकि शनि छठे और आठवें भाव में होने पर जातक के आयु में वृद्धि करते है। 5) किसी भी जन्मपत्रिका में पापी ग्रहो का तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में होना जातक के लिए शुभ होता है। क्योंकि तीसरे भाव में स्थित पापी ग्रह जातक को पराक्रमी बनाते है, वहीं छठे भाव में स्थित ग्रह जातक के रोग और शत्रुओ का नाश करते है, इसी प्रकार ग्यारहवें भाव में स्थित ग्रह जातक को धन प्राप्त करवाते है। 7) किसी भी भाव का स्वामी लग्न से, चन्द्र से और स्वयं अपने भाव से यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो शुभ फल प्रदान करता है। जबकि इन तीनो से ही केंद्र या त्रिकोण में न होने पर अशुभ फल प्रदान करता है। फल की मात्रा तीनो के आधार पर नहीं बल्कि भिन्न भिन्न भी जानी जा सकती है। अर्थात मात्र अपने भाव से केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह अच्छा फल प्रदान करेगा, यदि तीनो से ही केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह सर्वाधिक शुभ फल प्रदान करेगा। 8) शनि और राहू जिस भाव में होते है उस भाव के फल सदा विलम्ब से प्राप्त होते है। जैसे सातवें भाव में दोनों में से कोई ग्रह हो तो विवाह विलम्ब से होता है। इसीप्रकार पाँचवे भाव में हो तो संतान विलम्ब से होती है। इसीप्रकार अन्य भाव का फल समझना चाहिये। 9) यदि एक अशुभ स्थान का स्वामी दूसरे अशुभ स्थान में हो तो वह अशुभ फल नही देते। किन्तु ऐसा आयु में भाग्योदय के बाद ही होता है। 10) यदि कोई शुभ ग्रह वक्री होकर अशुभ स्थान में उच्च का होकर बैठ जाए तो वह शुभ ग्रह नीच स्थिति का फल देगा 11)दशम भाव में जिस भाव का स्वामी हो, जातक का भाग्य उसी भाव से सम्बंधित व्यक्ति या उस भाव के कारकत्व के कार्य को अपनाने पर चमकता है। जैसे दशम भाव में तीसरे भाव का स्वामी बैठा हो तो जातक के भाग्योदय में या तो भाई का या स्वयं के पराक्रम का योगदान होगा। तीसरा भाव जातक के भाई-बहन, पराक्रम और शारीरिक अंगो में कान व भुजा से सम्बंधित होता है, अतः इन दोनों अंगो के लिए लाभदायक पदार्थों का व्यापार करने पर जीवन में कभी भी हानि नहीं उठानी पड़ेगी। इसीप्रकार यदि पंचम भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो जातक को मनोरंजन के पदार्थों से अधिक लाभ होगा, और उसके भाग्योदय में उसकी प्रेमिका या संतान का महत्वपूर्ण योगदान होगा। इसीप्रकार अन्य भावो को भी समझना चाहिये। 12) कहने को तो उच्च ग्रह सर्वाधिक शुभ फल देते है, किन्तु उनकी दृष्टि नीच भाव पर भी होती है जिसका वे नाश करते है। अतः जीवन के लिए जितने शुभ उच्च ग्रह होते है उतने ही वे हानिकारक भी होते है। 13) जन्मपत्रिका के जिस भाव में कोई भी ग्रह न हो, या ग्रह तो हो लेकिन उस पर किसी अन्य ग्रह की कोई दृष्टि न हो तो वह भाव या ग्रह सुप्त अवस्था में माना जाता है, जिसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। 14) मिथुन, कन्या, धनु और मीन लग्न के जन्मपत्रिका में बुध और गुरु केंद्राधिपत्य दोष से दूषित होते है अतः इस स्थिति में इन दोनों ग्रहो से शुभ फल के आशा करना व्यर्थ होता है। यद्यपि लग्नेश होने पर ये अशुभ फल नहीं देते है। 15) जिस जन्मपत्रिका में जितने अधिक ग्रह उच्च, स्वराशि या मित्र राशियो में होते है जातक को उतना ही अधिक सुख देते है। इसके विपरीत जितने अधिक ग्रह नीच या शत्रु राशियों में होते है वे जातक को उतना ही अधिक संघर्षपूर्ण जीवन देते है। 16) राहु या केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती है. अतः ये जिस राशि में होते है उसके स्वामी के समान फल देते है और जिस ग्रह के साथ होते है उस ग्रह के गुणों को ग्रहण कर लेते है। 17) किसी भी प्रकार का शुभ या अशुभ ग्रह, स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में जन्मपत्रिका में किसी भी भाव में हों, वे सदा शुभ फल ही देंगे। किन्तु अपने नैसर्गिक लक्षणों के अनुरूप ही फल देंगे। जैसे कि शनि मंदगति व् मति भ्रम का कारक है। अतः अपनी स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में होने पर शुभ फल तो देगा परन्तु अत्यंत धीमी गति से जातक को मति भ्रम कर कितने ही समय तक भटकाने के बाद। इसीप्रकार अन्य ग्रहो का फल समझे।‬: 18) जब कोई ग्रह एक शुभ और एक अशुभ भाव का स्वामी हो तो उसका फल माध्यम हो जाता है। यदि उस ग्रह के साथ कोई शुभ ग्रह हो तो उसमे शुभत्व की मात्रा बढ़ जाती है। साथ ही ऐसी दशा में शुभ ग्रह, शुभ ग्रह की राशि या शुभ ग्रह के भाव में हो तो उसके शुभ फल अधिक प्राप्त होते है। इसके विपरीत अशुभ भाव या राशि में ऐसा ग्रह हो तो अशुभ फल अधिक मात्रा में प्राप्त होते है। जैसे मिथुन लग्न की जन्मपत्रिका में शनि अष्टम और नवम अर्थात एक घोर अशुभ और एक सर्वाधिक शुभ त्रिकोण का स्वामी होता है। ऐसी दशा में शनि यदि केंद्र या त्रिकोण (1, 4, 5, 7, 9, 10) भाव में हो तो जातक को शुभ फल प्राप्त होंगे अन्यथा नहीं। 19) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में लग्नेश की महादशा कभी भी अशुभ फल नहीं देती। 20) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में सूर्य ग्रह और चन्द्र ग्रह चाहे किसी भी भाव में और किसी भी राशि में बैठे हो, कभी भी वे मारक नहीं होते। 21) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में सप्तमेश यदि द्वादश भाव में बैठा हो तो जातक को वैवाहिक सुख या तो होता ही नहीं या न्यून सुख होता है।
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*🏵प्रेम विवाह* हमेशा से एक संवेदनशील विषय बना रहा है जिसे लेकर वर्तमान में युवाओं के मन में जिज्ञासा बनी ही रहती है जहाँ कुछ लोग पारिवारिक सदश्यों की सहायता से पारम्परिक रीति से अपने जीवन साथी का चयन करते हैं वहीँ कुछ लोगों के जीवन में प्राकृतिक रूप से ऐसी परिस्थितियां बनती हैं के उन्हें स्वं उनका जीवनसाथी मिल जाता है या उनके प्रेम सम्बन्धों बनने पर उनका विवाह होता है, तो ऐसे कौनसे ग्रहयोग होते हैं जो प्रेम विवाह (लव मैरिज) की स्थिति बनाते हैं आईये जानते हैं - " हमारी जन्मकुंडली में "पांचवा भाव" प्रेम-सम्बन्धों (लव-अफेयर) और रोमैंस का कारक होता है और "सातवां भाव" विवाह का कारक होता है इसके आलावा "शुक्र" प्रेम-सम्बन्धों और विवाह दोनों का नैसर्गिक कारक है अर्थात दोनों को नियंत्रित करता है। चन्द्रमाँ हमारे मन और भावनात्मक गतिविधियों का कारक है तथा राहु अपरम्परागत तौर-तरीकों का कारक है अतः इन्ही घटकों द्वारा बनी कुछ विशेष ग्रहस्थितियां प्रेम विवाह का योग बनाती हैं।" -1. यदि कुंडली में पंचमेश और सप्तमेश एक साथ हों तो प्रेम विवाह (लव मैरिज) का योग बनता है।2. यदि पंचमेश और सप्तमेश समसप्तक अर्थात आमने-सामने हो तो प्रेम विवाह होता है।3. यदि पंचमेश सातवें भाव में और सप्तमेश पांचवे भाव में हो तो भी प्रेम विवाह (लव मैरिज) योग बनता है।4. यदि चन्द्रमाँ लग्न या सप्तम भाव में हो तो प्रेम विवाह (लव मैरिज) का योग होता है।5. कुंडली में जब शुक्र और राहु एक साथ हों तो प्रेम सम्बन्धों के द्वारा विवाह होता है।6. शुक्र और चन्द्रमाँ का योग भी प्रेम विवाह कराता है।7. जब सप्तमेश राहु के साथ बैठा हो तो भी प्रेम विवाह का योग होता है।विशेष - 1. यदि पंचमेश और सप्तमेश का योग हो परन्तु यह योग दुःख भाव (6, 8, 12) विशेषकर आठवें भाव में बन रहा हो तो प्रेम विवाह (लव मैरिज) में बहुत बाधायें आती हैं या प्रेम सम्बन्ध होने पर भी विवाह नहीं हो पाता।2. शुक्र और राहु का योग भी यदि आठवें भाव में बना हो तो प्रेम सम्बन्ध बार बार टूटते हैं।3. जब राहु सप्तमेश या शुक्र के साथ हो या सप्तम भाव में बैठा हो तो ऐसे में अन्तर्जाति विवाह होता है।4. यदि शुक्र राहु के योग में मंगल भी साथ बैठा हो तो ऐसे में एक से ज्यादा प्रेम सम्बन्ध बनते हैं।5. यदि पंचमेश-सप्तमेश के योग पर बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो प्रेम विवाह पारिवारिक सहमति से हो जाता है।अतः प्रेम विवाह (लव मैरिज) का योग बनने पर भी यह देखना बहुत आवश्यक है के योग किस स्थिति में बन रहा है और अन्य किन किन ग्रहों से प्रभावित है। 🔯🏵🏵🏵🏵🏵🏵🔯
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कार्तिक पूर्णिमा पर करें चंद्र दर्शन🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹1. यदि आपकी कुंडली में चन्द्रमा 6 - 8 - 12 वें भाव में हो या चन्द्रमा शत्रु राशि में या चन्द्रमा नीच का हो या चन्द्रमा शनि राहु केतु सूर्य के साथ हो तो ऐसे जातक को आज का चन्द्रमा पानी में जरूर देखना चाहिए. 2. जिनकी आँखों की रोशनी कम है, वे आज रात को चन्द्रमा को नंगी आँखो से एकटक देखना चाहिए.3. यदि दाम्पत्य जीवन में कड़वाहट हो तो दम्पति आज चाँद की रौशनी में कुछ समय साथ रहे. परस्पर प्रेम बढेगा. 4. चन्द्र सम्बंधित दोष दूर करने के लिये आज रात चांदनी में चन्द्र स्तोत्र का पाठ करके चाँद को कच्चा दूध अर्पण करें.🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹‬: मोर के पंख के उपाय🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹1. घर के दक्षिण. पूर्व कोण में लगाने से बरकत बढती है व अचानक कष्ट नहीं आता है2. काल सर्प के दोष को भी दूर करने की इस मोर के पंख में अद्भुत क्षमता है काल सर्प वाले व्यक्ति को अपने तकिये के खौल के अंदर ७ मोर के पंख सोमवार रात्री काल में डालें तथा प्रतिदिन इसी तकिये का प्रयोग करे और अपने बैड रूम की पश्चिम दीवार पर मोर के पंख का पंखा जिसमे कम से कम ११ मोर के पंख तो हों लगा देने से काल सर्प दोष के कारण आयी बाधा दूर होती है3. बच्चा जिद्दी हो तो इसे छत के पंखे के पंखों पर लगा दे ताकि पंखा चलने पर मोर के पंखो की हवा बच्चे को लगे धीरे धीरे हव जिद्द कम होती जायेगी4. अपनी जेब व डायरी में रखा हो तो राहू का दोष की भी नहीं परेशान करता है तथा घर में सर्प मच्छर बिच्छू आदि विषेलें जंतुओं का य नहीं रहता है5. नवजात बालक के सिर की तरफ दिन रात एक मोर का पंख चांदी के ताबीज में डाल कर रखने से बालक डरता नहीं है तथा कोईभी नजर दोष और अला बला से बचा रहता है6. यदि शत्रु अधिक तंग कर रहें हो तो मोर के पंख पर हनुमान जी के मस्तक के सिन्दूर से मंगलवार या शनिवार रात्री में उसका नाम लिख कर अपने घर के मंदिर में रात र रखें प्रातःकाल उठकर बिना नहाये धोए चलते पानी मेंभी देने से शत्रुए शत्रुता छोड़ कर मित्रता का व्यवहार करने लगता है🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
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