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👹डाकिनी मन्त्र साधना👹यह साधना अत्यंत प्राचीन है।इस साधना को करने का अधिकार तामसिक साधक को है अर्थात जो माँस मदिरा का सेवन करते हैं।सिद्ध होने पर इनके माध्यम से साधक किसी भी कार्य को सुगमता पूर्वक कर सकते है।यह क्षण मात्र में कार्य करती है।स्त्री वशीकरण, पुरुष वशीकरण, समाज के रावण, सूर्पनखाजैसे दुष्ट लोगो को दण्डित भी करती है।कार्यालयों में रुके हुए कार्य, प्रॉपर्टी के कार्य आदि को भी सुगमता से सम्पन कर देती है।।यह साधना श्मशान के किनारे, सुनसान खण्डर, कुँए अथवा बावड़ी के पास , वीराने जंगल में सिद्ध की जाती है।यह साधना मन्त्र आपको किसी भी पुस्तक से प्राप्त हो सकता है किन्तु सिद्धि विधान आपको इस पोस्ट के माध्यम से , हमारे सानिद्ध्य में अथवा किसी सिद्ध गुरु से ही प्राप्त होगा।पोस्ट में जैसी विधि कही गयी है वैसे ही करे, , तो साधक को डाकिनी सिद्ध हो जायेगी।डाकिनी का मन्त्र जाप बन्द आँखों से किया जाता है और साधना के मध्याह्म में एक बार आँख खोलकर पीली सरसों को मन्त्र से अभिमन्त्रित करके अपने चारो दिशाओ में फेंका जाता है फिर उसके बाद मन्त्र जाप किया जाता है।यह क्रिया 41 दिन करनी होती है।डाकिनी साधक के बन्द आँखों में दिखाई देती है अर्थात साधना के अंतिम दिन प्रकट होती है।कभी कभी साधक को आवाज भी देती है किन्तु डरे नही और अपने सामने रखे माँस मदिरा का भोग डाकिनी को दे, इससे वह संतुष्ट होती है और साधक को वचन देती है उसके सभी कार्य करने का और बदले में अपना भोग ग्रहण करती है।इसकी शक्ति कर्ण वैताली से ज्यादा होती है अर्थात इसमें 1000 प्रेत आत्माओ की शक्ति होती है।यह सभी भूत प्रेतों, जिन्नों, हमजादो आदि को मारकर अपने साथ ले जाती है।इसमें साधक जब भी कार्य की इच्छा करता है तुरुन्त करती है।साधक को यह बन्द आँखों में ही दिखाई देगी।1 कुशासन या बकरे या भैंसे का चर्म आसन2 बकरे की चर्बी का चिराग3 मिट्टी के वर्तन में 125 ग्राम बकरे की कलेजी अथवा माँस4 मिटटी के प्याले में सुगन्ध वाली मदिरा5 पीली सरसो 5 ग्राम रोज6 चमेली की धूप या अगरबत्ती7 निर्वस्त्र साधना करे।8 रुद्राक्ष की माला शुद्ध9 सिंदूर का तिलक अनिवार्य10 मन्त्र जाप दाहिने हाथ की ऊँगली मध्यमा और अंगूठा ।11 अमावस्या के दिन या पूर्णिमा के दिन से करे।12 दिशा उत्तर13 पवित्रीकरण, वास्तुदोष पूजन, गुरुमन्त्र, सुरक्षा मन्त्र करे।14 41 दिन की सिद्धि का संकल्प ले।15 10 माला जप करने के बाद पीली सरसों को दाहिने हाथ में रखकर 1 बार मन्त्र बोलकर फूंके और चारो दिशाओ में फ़ेंक दे फिर पुनः 11 माला मन्त्र जाप करे।16 डाकिनी जब भी साधक को आवाज दे तो साधक वचन लेकर डाकिनी सिद्ध करे।17 मन्त्र जाप बन्द आँखों से होगा।ताम्र कलश जल से भरकर रखे।18 साधना कॉल में मांस मंदिरा का सेवन एक समय करे।19 यह सिद्धि रात्रि 12 बजे से शुरू करे और सूर्यास्त से पहले पूरी 21 माला करे।20 साधक का साधना स्थल देव मन्दिरो आदि से 200 मीटर की दूरी पर हो।साधना स्थल पर किसी भी देवी देवता की मूर्ति नही होनी चाहिये।21 यह सिद्धि बाममार्गी है।22 41 वे दिन बंद आँखों में डाकिनी काली सी औरत की तरह खुले वालो वाली निर्वस्त्र दिखाई देगी तभी साधक समझ जाय की डाकिनी सिद्ध हो गयी है और भोग अर्पण करे।मांस मदिरा रोज साधना स्थल पर खुला छोड़ दे और सो जाये। 4 बजे तक साधना पूर्ण कर ले और जमीन पर माँस मदिरा डाल कर सो जाय।23 साधना काल में अनेक भयंकर आवाजे आती है यह आवाजे आत्माओ, प्रेतों, भूतो चुड़ैलों आदि इतर योनियों की होती है जो साधक इसको सिद्ध करते है उनको चाहिये की जब उनकी सभी आवश्यकताएं पूरी हो जाय तो इस सिद्धि का विसर्जन कर दे इसमें साधक को हमें अपना नाम माता , पिता का नाम फ़ोटो वर्तमान एड्रेस भेजे , तब दिव्य शक्ति प्रयोग से डाकिनी का संहार रात्रि काल में कर दिया जाता है और साधक को उस समय शरीर में एक झटका लगता है जिस समय डाकिनी का वध कर उसको डाकिनी योनि से मुक्त कर पुनर्जन्म हेतु विष्णुलोक भेज दिया जाता है।इससे साधक डाकिनी से मुक्ति पा लेता है और दूसरा डाकिनी को भी मुक्ति मिल जाती है तीसरा साधक जन भलाई करता है चौथा साधक के पास अतुल धन सम्पदा हो जाती है, जो साधक की आने वाली पीढ़ियों के लिये भी पर्याप्त होती है।( जिन साधको को कई कई साल बीत चुके है और उनको सिद्धियां प्राप्त नही हुयी है और ऐसे साधक जो गुरुओ को निरंतर बदलते रहते है, संपर्क कर सकते है, उनको प्रथम बार में सिद्धि सिद्ध करायी जा सकती है, धनलोभी साधक संपर्क न करे।)मन्त्रॐ स्यार की खवासिनी समन्दर पार धाईआव बैठी हो तो आवठाडी हो तो ठाडी आवजलती आ उछलती आन आये डाकिनी तो जालंधर पीर की आनशब्द साँचापिण्ड काँचाफुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ।
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जन्मपत्रिका के फल का प्रतिपादन किया जाए तो वह निश्चित रूप से सटीक होगा। 1) लग्न भाव का स्वामी अर्थात लग्नेश किसी भी भाव में, किसी भी राशि में हो, वह अशुभ फल नहीं देगा। लग्नेश की अशुभता होने पर मन के अनुकूल भले ही फल प्राप्त न हो किन्तु जातक के लिए हानिकारक फल नहीं होंगे। 2) छ्टे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी यदि अशुभ ग्रह हो तो जन्मपत्रिका में जिस भाव में होंगे उस भाव के फलों का नाश ही करेंगे। जबकि इन भावो के स्वामी शुभ ग्रह हो तो शुभ फलों की मात्रा में कमी होगी। 3) केंद्र और त्रिकोण के स्वामी जन्मपत्रिका में जिस भाव में बैठेंगे उसके फलों को शुभत्व प्रदान करेंगे। यही फल उनकी दृष्टि होने पर भी होगा। 4) किसी भी जन्मपत्रिका में गुरु और केतु छठे भाव में होने पर जातक के रोग और शत्रुओं का नाश करते है, जबकि शनि छठे और आठवें भाव में होने पर जातक के आयु में वृद्धि करते है। 5) किसी भी जन्मपत्रिका में पापी ग्रहो का तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में होना जातक के लिए शुभ होता है। क्योंकि तीसरे भाव में स्थित पापी ग्रह जातक को पराक्रमी बनाते है, वहीं छठे भाव में स्थित ग्रह जातक के रोग और शत्रुओ का नाश करते है, इसी प्रकार ग्यारहवें भाव में स्थित ग्रह जातक को धन प्राप्त करवाते है। 7) किसी भी भाव का स्वामी लग्न से, चन्द्र से और स्वयं अपने भाव से यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो शुभ फल प्रदान करता है। जबकि इन तीनो से ही केंद्र या त्रिकोण में न होने पर अशुभ फल प्रदान करता है। फल की मात्रा तीनो के आधार पर नहीं बल्कि भिन्न भिन्न भी जानी जा सकती है। अर्थात मात्र अपने भाव से केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह अच्छा फल प्रदान करेगा, यदि तीनो से ही केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह सर्वाधिक शुभ फल प्रदान करेगा। 8) शनि और राहू जिस भाव में होते है उस भाव के फल सदा विलम्ब से प्राप्त होते है। जैसे सातवें भाव में दोनों में से कोई ग्रह हो तो विवाह विलम्ब से होता है। इसीप्रकार पाँचवे भाव में हो तो संतान विलम्ब से होती है। इसीप्रकार अन्य भाव का फल समझना चाहिये। 9) यदि एक अशुभ स्थान का स्वामी दूसरे अशुभ स्थान में हो तो वह अशुभ फल नही देते। किन्तु ऐसा आयु में भाग्योदय के बाद ही होता है। 10) यदि कोई शुभ ग्रह वक्री होकर अशुभ स्थान में उच्च का होकर बैठ जाए तो वह शुभ ग्रह नीच स्थिति का फल देगा 11)दशम भाव में जिस भाव का स्वामी हो, जातक का भाग्य उसी भाव से सम्बंधित व्यक्ति या उस भाव के कारकत्व के कार्य को अपनाने पर चमकता है। जैसे दशम भाव में तीसरे भाव का स्वामी बैठा हो तो जातक के भाग्योदय में या तो भाई का या स्वयं के पराक्रम का योगदान होगा। तीसरा भाव जातक के भाई-बहन, पराक्रम और शारीरिक अंगो में कान व भुजा से सम्बंधित होता है, अतः इन दोनों अंगो के लिए लाभदायक पदार्थों का व्यापार करने पर जीवन में कभी भी हानि नहीं उठानी पड़ेगी। इसीप्रकार यदि पंचम भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो जातक को मनोरंजन के पदार्थों से अधिक लाभ होगा, और उसके भाग्योदय में उसकी प्रेमिका या संतान का महत्वपूर्ण योगदान होगा। इसीप्रकार अन्य भावो को भी समझना चाहिये। 12) कहने को तो उच्च ग्रह सर्वाधिक शुभ फल देते है, किन्तु उनकी दृष्टि नीच भाव पर भी होती है जिसका वे नाश करते है। अतः जीवन के लिए जितने शुभ उच्च ग्रह होते है उतने ही वे हानिकारक भी होते है। 13) जन्मपत्रिका के जिस भाव में कोई भी ग्रह न हो, या ग्रह तो हो लेकिन उस पर किसी अन्य ग्रह की कोई दृष्टि न हो तो वह भाव या ग्रह सुप्त अवस्था में माना जाता है, जिसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। 14) मिथुन, कन्या, धनु और मीन लग्न के जन्मपत्रिका में बुध और गुरु केंद्राधिपत्य दोष से दूषित होते है अतः इस स्थिति में इन दोनों ग्रहो से शुभ फल के आशा करना व्यर्थ होता है। यद्यपि लग्नेश होने पर ये अशुभ फल नहीं देते है। 15) जिस जन्मपत्रिका में जितने अधिक ग्रह उच्च, स्वराशि या मित्र राशियो में होते है जातक को उतना ही अधिक सुख देते है। इसके विपरीत जितने अधिक ग्रह नीच या शत्रु राशियों में होते है वे जातक को उतना ही अधिक संघर्षपूर्ण जीवन देते है। 16) राहु या केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती है. अतः ये जिस राशि में होते है उसके स्वामी के समान फल देते है और जिस ग्रह के साथ होते है उस ग्रह के गुणों को ग्रहण कर लेते है। 17) किसी भी प्रकार का शुभ या अशुभ ग्रह, स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में जन्मपत्रिका में किसी भी भाव में हों, वे सदा शुभ फल ही देंगे। किन्तु अपने नैसर्गिक लक्षणों के अनुरूप ही फल देंगे। जैसे कि शनि मंदगति व् मति भ्रम का कारक है। अतः अपनी स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में होने पर शुभ फल तो देगा परन्तु अत्यंत धीमी गति से जातक को मति भ्रम कर कितने ही समय तक भटकाने के बाद। इसीप्रकार अन्य ग्रहो का फल समझे।‬: 18) जब कोई ग्रह एक शुभ और एक अशुभ भाव का स्वामी हो तो उसका फल माध्यम हो जाता है। यदि उस ग्रह के साथ कोई शुभ ग्रह हो तो उसमे शुभत्व की मात्रा बढ़ जाती है। साथ ही ऐसी दशा में शुभ ग्रह, शुभ ग्रह की राशि या शुभ ग्रह के भाव में हो तो उसके शुभ फल अधिक प्राप्त होते है। इसके विपरीत अशुभ भाव या राशि में ऐसा ग्रह हो तो अशुभ फल अधिक मात्रा में प्राप्त होते है। जैसे मिथुन लग्न की जन्मपत्रिका में शनि अष्टम और नवम अर्थात एक घोर अशुभ और एक सर्वाधिक शुभ त्रिकोण का स्वामी होता है। ऐसी दशा में शनि यदि केंद्र या त्रिकोण (1, 4, 5, 7, 9, 10) भाव में हो तो जातक को शुभ फल प्राप्त होंगे अन्यथा नहीं। 19) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में लग्नेश की महादशा कभी भी अशुभ फल नहीं देती। 20) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में सूर्य ग्रह और चन्द्र ग्रह चाहे किसी भी भाव में और किसी भी राशि में बैठे हो, कभी भी वे मारक नहीं होते। 21) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में सप्तमेश यदि द्वादश भाव में बैठा हो तो जातक को वैवाहिक सुख या तो होता ही नहीं या न्यून सुख होता है।
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सोल्यूशन विद् लाल किताब वाटॅसअप नं.9755555085लाल किताब में रोग संबंधी उपायबृहस्पति की अशुभता अगर किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में बृहस्पति की अशुभता के कारण गैस्ट्कि या फेंफड़ों से संबन्धित बीमारी का सामना करना पड़े, तो उसे रोजाना अपने मस्तक पर केसर तिलक लगाना चाहिए। इसके साथ ही उसे प्रतिदिन थोड़ी बहुत मात्रा में केसर या गोरोचन का सेवन करना चाहिए। इस उपाय से बृहस्पति की अशुभता नष्ट होती है।शुक्र की अशुभताशुक्र की अशुभता के कारण यदि किसी स्त्री-पुरूष में गुप्त रोग पैदा हो जाएं, तो उसे गाय की सेवा करनी चाहिए। अपने घर गाय की पालना करनी चाहिए। मन्दिर या किसी देव स्थान अथवा कुल ब्राह्मण को गौ दान करनी चहिए। इस उपाय से शुक्र की अशुभ जन्य पैदा रोग षांत होते है। सूर्य की अशुतासूर्य से संबन्धित बीमारी की अवस्था यथा हृदय रोग के दौरान पानी में देसी गुड़ डालकर पीना चाहिए। इसके अलावा प्रातःकाल नियमित रूप से सूर्य को अघ्र्य देना चाहिए। इस उपाय से सूर्य संबन्धित बीमारियां नष्ट हो जाती है। चंद्र की अशुभताचंद्र से सबन्धित बीमारियों के लिए कुछ दिन कच्चा दूध और चावल किसी देव स्थान पर चढ़ाना चाहिए। इसके अलावा गौदुग्ध से निर्मित खीर या बर्फी का दान किसी मन्दिर में करते रहना चाहिए। ऐसे उपाय से चंद्र संबन्धित बीमारियां दूर होने लगती है।मंगल की अशुभतामंगल की अशुभता सबन्धित बीमारियों में जब पेट संबन्धी बीमारियां ज्यादा परेशान करने लगे, तो जातक को बरगद के पेड़ की जड़ में देसी गुड़ और कच्चा दूध मिलाकर निरंतर 43 दिन शिव मन्दिर या किसी अन्य देव स्थान पर चढ़ाना चाहिए। इस उपाय से मंगल संबन्धित बीमारियां शान्त होने लगती है।बुध की अशुभताबुध से सबन्धित बीमारियों के दौरान जब त्वचा संबंधी बीमारियां सताये तो निरंतर चार दिन अर्थात् 96 घंटे के लिए नाक में चांदी की तार डालनी चाहिए अथवा नाक में सफेद रेशमी धागा डालकर उसे बिधवा कर रखना चाहिए। तांबे के पैसे में सुराख करके उसे चलते पानी में प्रवाहित करना चहिए। इन उपाय से बुध संबन्धित बीमारियां दूर होती है।शनि की अशुभताअषभुतानि से सबन्धित बीमारियों के लिए षुद्ध नदी, नीले या झरने के बहते पानी में नित्य कच्चा नारियल बहाना चाहिए। इस उपाय से निष्चित ही षनि की अषुभता षांत होती है और षनि संबंधी रोग समाप्त होते है।राहू की अशुभताराहू सबन्धित बीमारियों के लिए पत्ते सहित मूली, जौ, सरसों का साग किसी मन्दिर में दान करना चाहिए। इससे राहू से संबन्धित बीमारियों में लाभ मिलता है।केतु की अशुभताकेतु सबन्धित बीमारियों के लिए तंदूर में मीठी रोटी बनाकर लगातार 43 दिन कुत्ते को खिलानी चाहिए। तंदूर मिट्टी का बना होना चाहिए। ऐसे उपाय केतु संबन्धी बीमारियों को शान्त करते है।अगर आप अपनी जन्मकंडुली दिखाना चाहते है या लाल किताब द्वारा किसी समस्या का निराकरण चाहते है तो संपर्क करें। 9425964795
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कार्तिक पूर्णिमा पर करें चंद्र दर्शन🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹1. यदि आपकी कुंडली में चन्द्रमा 6 - 8 - 12 वें भाव में हो या चन्द्रमा शत्रु राशि में या चन्द्रमा नीच का हो या चन्द्रमा शनि राहु केतु सूर्य के साथ हो तो ऐसे जातक को आज का चन्द्रमा पानी में जरूर देखना चाहिए. 2. जिनकी आँखों की रोशनी कम है, वे आज रात को चन्द्रमा को नंगी आँखो से एकटक देखना चाहिए.3. यदि दाम्पत्य जीवन में कड़वाहट हो तो दम्पति आज चाँद की रौशनी में कुछ समय साथ रहे. परस्पर प्रेम बढेगा. 4. चन्द्र सम्बंधित दोष दूर करने के लिये आज रात चांदनी में चन्द्र स्तोत्र का पाठ करके चाँद को कच्चा दूध अर्पण करें.🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹‬: मोर के पंख के उपाय🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹1. घर के दक्षिण. पूर्व कोण में लगाने से बरकत बढती है व अचानक कष्ट नहीं आता है2. काल सर्प के दोष को भी दूर करने की इस मोर के पंख में अद्भुत क्षमता है काल सर्प वाले व्यक्ति को अपने तकिये के खौल के अंदर ७ मोर के पंख सोमवार रात्री काल में डालें तथा प्रतिदिन इसी तकिये का प्रयोग करे और अपने बैड रूम की पश्चिम दीवार पर मोर के पंख का पंखा जिसमे कम से कम ११ मोर के पंख तो हों लगा देने से काल सर्प दोष के कारण आयी बाधा दूर होती है3. बच्चा जिद्दी हो तो इसे छत के पंखे के पंखों पर लगा दे ताकि पंखा चलने पर मोर के पंखो की हवा बच्चे को लगे धीरे धीरे हव जिद्द कम होती जायेगी4. अपनी जेब व डायरी में रखा हो तो राहू का दोष की भी नहीं परेशान करता है तथा घर में सर्प मच्छर बिच्छू आदि विषेलें जंतुओं का य नहीं रहता है5. नवजात बालक के सिर की तरफ दिन रात एक मोर का पंख चांदी के ताबीज में डाल कर रखने से बालक डरता नहीं है तथा कोईभी नजर दोष और अला बला से बचा रहता है6. यदि शत्रु अधिक तंग कर रहें हो तो मोर के पंख पर हनुमान जी के मस्तक के सिन्दूर से मंगलवार या शनिवार रात्री में उसका नाम लिख कर अपने घर के मंदिर में रात र रखें प्रातःकाल उठकर बिना नहाये धोए चलते पानी मेंभी देने से शत्रुए शत्रुता छोड़ कर मित्रता का व्यवहार करने लगता है🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
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*🏵प्रेम विवाह* हमेशा से एक संवेदनशील विषय बना रहा है जिसे लेकर वर्तमान में युवाओं के मन में जिज्ञासा बनी ही रहती है जहाँ कुछ लोग पारिवारिक सदश्यों की सहायता से पारम्परिक रीति से अपने जीवन साथी का चयन करते हैं वहीँ कुछ लोगों के जीवन में प्राकृतिक रूप से ऐसी परिस्थितियां बनती हैं के उन्हें स्वं उनका जीवनसाथी मिल जाता है या उनके प्रेम सम्बन्धों बनने पर उनका विवाह होता है, तो ऐसे कौनसे ग्रहयोग होते हैं जो प्रेम विवाह (लव मैरिज) की स्थिति बनाते हैं आईये जानते हैं - " हमारी जन्मकुंडली में "पांचवा भाव" प्रेम-सम्बन्धों (लव-अफेयर) और रोमैंस का कारक होता है और "सातवां भाव" विवाह का कारक होता है इसके आलावा "शुक्र" प्रेम-सम्बन्धों और विवाह दोनों का नैसर्गिक कारक है अर्थात दोनों को नियंत्रित करता है। चन्द्रमाँ हमारे मन और भावनात्मक गतिविधियों का कारक है तथा राहु अपरम्परागत तौर-तरीकों का कारक है अतः इन्ही घटकों द्वारा बनी कुछ विशेष ग्रहस्थितियां प्रेम विवाह का योग बनाती हैं।" -1. यदि कुंडली में पंचमेश और सप्तमेश एक साथ हों तो प्रेम विवाह (लव मैरिज) का योग बनता है।2. यदि पंचमेश और सप्तमेश समसप्तक अर्थात आमने-सामने हो तो प्रेम विवाह होता है।3. यदि पंचमेश सातवें भाव में और सप्तमेश पांचवे भाव में हो तो भी प्रेम विवाह (लव मैरिज) योग बनता है।4. यदि चन्द्रमाँ लग्न या सप्तम भाव में हो तो प्रेम विवाह (लव मैरिज) का योग होता है।5. कुंडली में जब शुक्र और राहु एक साथ हों तो प्रेम सम्बन्धों के द्वारा विवाह होता है।6. शुक्र और चन्द्रमाँ का योग भी प्रेम विवाह कराता है।7. जब सप्तमेश राहु के साथ बैठा हो तो भी प्रेम विवाह का योग होता है।विशेष - 1. यदि पंचमेश और सप्तमेश का योग हो परन्तु यह योग दुःख भाव (6, 8, 12) विशेषकर आठवें भाव में बन रहा हो तो प्रेम विवाह (लव मैरिज) में बहुत बाधायें आती हैं या प्रेम सम्बन्ध होने पर भी विवाह नहीं हो पाता।2. शुक्र और राहु का योग भी यदि आठवें भाव में बना हो तो प्रेम सम्बन्ध बार बार टूटते हैं।3. जब राहु सप्तमेश या शुक्र के साथ हो या सप्तम भाव में बैठा हो तो ऐसे में अन्तर्जाति विवाह होता है।4. यदि शुक्र राहु के योग में मंगल भी साथ बैठा हो तो ऐसे में एक से ज्यादा प्रेम सम्बन्ध बनते हैं।5. यदि पंचमेश-सप्तमेश के योग पर बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो प्रेम विवाह पारिवारिक सहमति से हो जाता है।अतः प्रेम विवाह (लव मैरिज) का योग बनने पर भी यह देखना बहुत आवश्यक है के योग किस स्थिति में बन रहा है और अन्य किन किन ग्रहों से प्रभावित है। 🔯🏵🏵🏵🏵🏵🏵🔯
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प्रिये दोस्तों यह सुनने में अजीब सा लगता लखपति , करोड़पति और करोड़पति लखपति कैसे बन सकता ह , लेकिन यह सत्य ह दोस्तों । यह दावा किया ह विश्व के जाने माने तांत्रिक , एस्ट्रोलोजर, रैकी ग्रैंड मास्टर, टैरो रीडर, पालमिस्ट, अंक ज्योतिषी और वास्तु सलाहकार द्वारा, इनके अनुसार जिस घर में असली सिद्ध हत्थाजोडी, सियारसिंघि, श्वेतार्क गणपति, दक्षिणावर्ति शंख होता ह वे लोग दिन दुनी रात चोगोनि बरकत करते ह चाहे वे प्रॉपर्टी डीलर हो, अभिनेता हो या नेता, बिज़नेसमैन हो या ऑफिसवर्कर उनके भाग्य में ये चारो भगवान का अमृत और प्रकर्ति के वरदान चार चाँद लगा देंगे ।बाज़ारो से कम कीमत पर नकली , डुप्लीकेट हत्थाजोडी, सियारसिंघि, श्वेतार्क गणपति आदि खरीद कर लोग अपने घरो इन्हें रख तो लेते ह लेकिन बरकत के नाम पर ठेंगा मिलता ह, नकली बाजारू वस्तुओ के कारण लोगो का इन दिव्य वस्तुओ के प्रति आस्था कम होती जा रही ह, दोस्तों जिस घर में असली तांत्रिक रीती से सिद्ध किये हुयी हत्थाजोडी, सियारसिंघि, श्वेतार्क गणपति और दिव्य दक्षिणावर्ति शंख हो तो उसकी 21 पीढ़ियों में गरीबी नही आ सकती। हमारे संस्थान से ये दिव्य सिद्ध और असली चारो वस्तुए मात्र 21000/- में लोगो तक पहुचाई जा रही ह , एक बार इन्हें धारण करके देखे और पर्भु का चमत्कार अपने हाथो से देखे, दोस्तों यह सुनहरा अवसर ह ईन असली वस्तुओ को पाने का वरना ढूंढते रह जाओगे बाज़ारो और जंगलो में , आइये जानते ह इन चारो करामाती वस्तुओ के विषय में:------------------…..1.हत्था जोड़ी::-हत्था जोड़ी एक वनस्पति है. एक विशेष जाती का पौधे की जड़खोदने पर उसमे मानव भुजा जैसी दो शाखाये दिख पड़ती है, इसके सिरे पर पंजा जैसा बना होता है. उंगलियों के रूप में उस पंजे कीआकृति ठीक इस तरह की होती है जैसे कोई मुट्ठी बंधे हो. जड़निकलकर उसकी दोनों शाखाओ को मोड़कर परस्पर मिला देने सेकर बढ़ता की स्थिथि आती है, यही हत्था जोड़ी है. इसकी पौधेप्राय मध्य प्रदेश में होते है, जहा वनवासी जातियों की लोग इसेनिकलकर बेच दिया करते है.हत्था जोड़ी यह बहुत ही शक्तिशाली व प्रभावकारी वस्तु है यहएक जंगली पौधे की जड़ होती है मुकदमा , शत्रु संघर्ष , दरिद्रता , वदुर्लभ आदि के निवारण में इसके जैसी चमत्कारी वस्तु आज तक देखनेमें नही आई इसमें वशीकरण को भी अदुभूत टकक्ति है , भूत दृप्रेतआदि का भय नही रहता यदि इसे तांत्रिक विधि से सिध्द करदिया जाए तो साधक निष्चित रूप से चामुण्डा देवी का कृपापात्र हो जाता है यह जिसके पास होती है उसे हर कार्य मेंसफलता मिलती है धन संपत्ति देने वाली यह बहुत चमत्कारीसाबित हुई है तांत्रिक वस्तुओं में यह महत्वपूर्ण हैहत्था जोड़ी में अद्भुत प्रभाव निहित रहता है, यह साक्षातचामुंडा देवी का प्रतिरूप है. यह जिसके पास भी होगा वह अद्भुतरुप से प्रभावशाली होगा. सम्मोहन, वशीकरण, अनुकूलन, सुरक्षा मेंअत्यंत गुणकारी होता है, हत्था जोड़ी.होली की रात को कुंए के पास जाकर थोड़ी मिट्टी खोद करउसकी एक गणेशजी की मूर्ति बनाएं। उसके ऊपर सिंदूर से लेपन कररातभर उसका अभिषेक-पूजन करें। सुबह आरती के बाद विसर्जन करदें। इससे प्रयोग से भी शीघ्र ही धन लाभ होने लगता है।हत्था जोड़ी जो की एक महातंत्र में उपयोग में लायी जाती हैऔर इसके प्रभाव से शत्रु दमन तथा मुकदमो में विजय हासिल होतीहै !मेहनत और लगन से काम करके धनोपार्जन करते हैं फिर भी आपकोआर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है तो आपकोअपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उपाय करना चाहिए। इसकेलिए किसी भी शनिवार अथवा मंगलवार के दिन हत्था जोड़ी घरलाएं। इसे लाल रंग के कपड़े में बांधकर घर में किसी सुरक्षित स्थान मेंअथवा तिजोरी में रख दें। इससे आय में वृद्घि होगी एवं धन का व्ययकम होगा।तिजोरी में सिन्दूर युक्त हत्था जोड़ी रखने से आर्थिक लाभ मेंवृद्धि होने लगती है.हाथा जोड़ी एक जड़ है। होली के पूर्व इसको प्राप्त कर स्नानकराकर पूजा करें तत्पश्चात तिल्ली के तेल में डूबोकर रख दें। दोहफ्ते पश्चात निकालकर गायत्री मंत्र से पूजने के बाद इलायचीतथा तुलसी के पत्तों के साथ एक चांदी की डिब्बी में रख दें। इससेधन लाभ होता है।हाथा जोड़ी को इस मंत्र से सिद्ध करें-ऊँ किलि किलि स्वाहा।। 2.….कुदरत का करिश्मा श्वेतार्क गणपति::-शास्त्रों में श्वेतार्क के बारे में कहा गया है- “जहां कहीं भी यहपौधा अपने आप उग आता है, उसके आस-पास पुराना धन गड़ाहोता है। जिस घर में श्वेतार्क की जड़ रहेगी, वहां से दरिद्रता स्वयंपलायन कर जाएगी। इस प्रकार मदार का यह पौधा मनुष्य के लिएदेव कृपा, रक्षक एवं समृद्धिदाता है।सफेद मदार की जड़ में गणेशजी का वास होता है, कभी-कभीइसकी जड़ गणशेजी की आकृति ले लेती है। इसलिए सफेद मदार कीजड़ कहीं से भी प्राप्त करें और उसकी श्रीगणेश की प्रतिमाबनवा लें। उस पर लाल सिंदूर का लेप करके उसे लाल वस्त्र परस्थापित करें। यदि जड़ गणेशाकार नहीं है, तो किसी कारीगर सेआकृति बनवाई जा सकती है। शास्त्रों में मदार की जड़ की स्तुतिइस मंत्र से करने का विघान है-चतुर्भुज रक्ततनुंत्रिनेत्रं पाशाकुशौ मोदरक पात्र दन्तो।करैर्दधयानं सरसीरूहस्थं गणाधिनाभंराशि चूùडमीडे।।गणेशोपासना में साधक लाल वस्त्र, लाल आसान, लाल पुष्प, लालचंदन, मूंगा अथवा रूद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। नेवैद्य में गुड़ वमूंग के लड्डू अर्पित करें। “ऊँ वक्रतुण्डाय हुम्” मंत्र का जप करें।श्रद्धा और भावना से की गई श्वेतार्क की पूजा का प्रभाव थोड़ेबहुत समय बाद आप स्वयं प्रत्यक्ष रू प से अनुभव करने लगेंगे।तन्त्र शास्त्र में श्वेतार्क गणपति की पूजा का विधान है | यह आमलक्ष्मी व गणपति की प्रतिमाओं से भिन्न होती है | यह प्रतिमाकिसी धातु अथवा पत्थर की नहीं बल्कि जंगल में पाये जाने वालेएक पोधे को श्वेत आक के नाम से जाना जाता है | इसकी जड़ कमसे कम २७ वर्ष से जयादा पुरानी हो उसमें स्वत: ही गणेश जी कीप्रतिमा बन जाती है | यह प्रक्रति का एक आश्चर्य ही है | श्वेतकआक की जड़ (मूल ) यदि खोदकर निकल दी जाये तो निचे की जड़में गणपति जी की प्रतिमा प्राप्त होगी | इस प्रतिमा का नित्यपूजन करने से साधक को धन-धान्य की प्राप्ति होती है | यहप्रतिमा स्वत: सिद्ध होती है | तन्त्र शास्त्रों के अनुसार ऐशे घर मेंयंहा यह प्रतिमा स्थापित हो , वंहा रिद्धी-सिद्ध तथाअन्नपूर्णा देवी वस् करती है | श्वेतार्क की प्रतिमा रिद्धी-सिद्धकी मालिक होती है | जिस व्यक्ति के घर में यह गणपति कीप्रतिमा स्थापित होगी उस घर में लक्ष्मी जी का निवास होताहै तथा जंहा यह प्रतिमा होगी उस स्थान में कोई भी शत्रु हानीनहीं पहुंचा सकता | इस प्रतिमा के सामने नित्य बैठकर गणपति जीका मूल मन्त्र जपने से गणपति जी के दर्शन होते हैं तथा उनकीक्रपा प्राप्त होती है |श्वेतक आक की गणपति की प्रतिमा अपने पूजा स्थान में पूर्वदिशा की तरफ ही स्थापित करें | ‘ ओम गं गणपतये नम:’ मन्त्र काप्रतिदिन जप करने | जप के लिए लाल रंग का आसन प्रयोग करें तथाश्वेत आक की जड़ की माला से यह जप करें तो जप कल में ही साधककी हर मनोकामना गणपति जी पूरी करते हैं |व्यापार स्थल पर किसी भी प्रकार की समस्या हो तो वहांश्वेतार्क गणपति तथा की स्थापना करें।श्वेतक आक गणपति एक दुर्लभ प्रकतिक उपहारजंगल में पाये जाने वाले एक पोधे को सफेद आक के नाम से जानाजाता है | इसकी जड़ पुरानी हो तो उसमें स्वत: ही गणेश जी कीप्रतिमा बन जाती है | यह प्रक्रति का एक आश्चर्य ही है | श्वेतकआक की जड़ (मूल ) यदि खोदकर निकल दी जाये तो निचे की जड़में गणपति जी की प्रतिमा प्राप्त होगी | इस प्रतिमा का नित्यपूजन करने से साधक को धन-धान्य की प्राप्ति होती है | यहप्रतिमा स्वत: सिद्ध होती है | तन्त्र शास्त्रों के अनुसार ऐशे घर मेंयंहा यह प्रतिमा स्थापित हो , वंहा रिद्धी-सिद्ध तथाअन्नपूर्णा देवी वस् करती है , श्वेतक आक गणपति पूजन विधि:श्वेतक आक गणपति की प्रतिमा रवि पुष्य या गुरु पुष्य जैसे शुभमुहूर्त पर प्राप्त करके गंगा जल में स्नान करवा कर लाल संदुर कालेप करे , अब गणपति जी को पूर्व दिशा में लाल कपड़े पर हीस्थापित करें, उसके बाद गणपति पर षोडश उपचार से पूजन कर . इसकेबाद प्रतिदिन नीचे लिखे मन्त्र की एक माला जाप करे:-ऊँ गं गणपतये नमःजप के लिए लाल रंग का आसन प्रयोग करें |पूजन लाभ:आपके सभी प्रकार के रोगों का नाश होगा, सौभाग्य में वृद्धिहोगी, चेहरे पर तेज, कांति व चमक शोभायमान होती है। साथ हीसाथ यदि किसी भी तरह का वशीकरण या फिर तांत्रिक प्रयोगकिया हुआ हो तो उसका भी नाश होकर परिवार में सुख-समृद्धिव शांति का वास होकर माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद सदैव के लिएबना रहता है। ऐसा करने से आपके घर में हमेश के लिए गणपति कीअसीम कृपा के साथ-साथ रिद्धि-सिद्धि का वास होगा।सहित॥3….दक्षिणाव्रती शंख :-एक समुंदरी-जीव होता है इसका अस्थि- निर्मित खोल ही “शख”कहलाता हैl इसे बहुत पवित्र, विष्णु -प्रिय और लक्ष्मी -सहोदरमाना जाता है l यह देव-प्रतिमा कि भांति पूज्य होता है lसामंत्ये सभी शंख वाममुखी होती है l उनकी पूजा का फलसामान्य कहा गया है l किन्तु कुश शंख (जाति- विशेस के)वाममुखी न होकर, दक्ष्णिमुखी होते है l ये विशेस पवित्र , प्रभावी, शुभ और सिधिप्रद कहे गए है l कदाचित अपने इन्ही गुणोंके कारण ये दुर्लभ होते है l ऐसा शंख प्रयाप्त हो जाने पर उसकीपूजा अवश्य करनी चाहिए lमान्यता है कि जिस घर मे दक्ष्णिवर्ती शंख रहता है , वहा श्री-समृधि भी अवशय होती है l यदि कही मिल जाए (शंख टुटा- फुटा , विकृत नहीं होना चाहिए l ) तो उसे लाकर किसी शुभ- मुहूर्त मेपंचामृत, दूध, गंगाजल, अथवा सादे शुद्ध जल से स्नान कराकर धुप-दीप से पूजाकरके चांदी के आसान पर प्रतिस्ष्ट करना चाहिए lदैनिक-पूजा के रूप मे उसे धुप-दीप रहने से लक्ष्मी जी कृपा अवश्यप्रयाप्त होती है l4.….सियार सिंगी:-सामान्तया इसे गीदड़ -सिंगी अथवा सियार सिंगी कहते है lसियार एक वन्य-जीव है l इसके सिंग नहीं होती, पर अपवाद-स्वरूपकिसी – किसी के शरीर मे अचानक से उभर आती है उस समय वहपीड़ा से चिललाता है, शिकारी ऐसे समय मे उसे पहचान कर उसेमार देते है और सियार सिंगी को काट लेते है आकार मे यह छोटी -बड़ी चपटी- गोल किसी भी तरह कि ही सकती हैl मगर आवले सेजायदा बड़ी नहीं होती है l यदि किसी को मिल जाए तो इसेशुभ नक्षत्र मे विधि विधान से पूराकरके सिद्धि कर लेनी चाहिए lकहा जाता है कि यदि इसे हत्या के साथ रखा जाए तो यह बहुतशक्तिशाली ही जाती है lधन-सम्पति, वशीकरण, शत्रु शमन मे व्यक्ति सशक्त ही जाता है lजिस व्यक्ति के पास यह होती है l उसे किसी बात कि कमी नहींहोती l उसकी सारी इछचाये अपने आप पूरी हो जाती है lसियार सिंगी से धन प्राप्तिअगर व्यापार न चल पा रह हो यां जीवन में उन्नति न हो पा रहीहो तो इस साधना को करना चाहिए. कई बार इर्षा के कारण कुछलोग तंत्र प्रयोग कर देते हैं जिससे दूकान में ग्राहक नहीं आते यांकार्य सफल नहीं होते. इन परस्थितियों में भी यह प्रयोग रामबाण की तरह असर करता है. बुधवार के दिन सियार सिंगी कोकिसी स्टील की प्लेट में स्थापित कर दें . इसपर कुमकुम या केसरका तिलक लगाये. फिर इसपर चावल और फूल अर्पित करें और निम्नमंत्र का जप आसन में बैठ कर करें.ॐ नमो भगवती पद्मा श्रीम ॐ हरीम, पूर्व दक्षिण उत्तर पश्चिमधन द्रव्य आवे , सर्व जन्य वश्य कुरु कुरु नमःइस मंत्र का मात्र १०८ बार जप २१ दिन इस सियार सिंगी केसामने करें . २१ दिन के बाद इसको किसी डिब्बी में संभल कर रखले. अगर दूकान न चल रही हो तो दूकान में किसी सुरक्षित स्थल मेंरख दे और केवल २१ बार इस मंत्र का उच्चारण करें . इस पाधना कोकरने वाले को कभी धन की याचना नहीं करनी पार्टी अपितु धनउसकी और स्वयं ही आकर्षित होता रहता ह। उपरोक्त चारो दिव्य वस्तुए असली और सिद्ध मात्र पाने के लिए सम्पर्क करे:-
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कार्तिक पूर्णिमा , देव दिवाली और त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जानी जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपने पूर्ण कला में होता है। इस शुभ दिन को कई कारणों से बेहद जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा: नवंबर 14, 2016, सोमवारकार्तिक पूर्णिमा को देव दिवाली अथवा त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन कार्तिक मास की पूर्णिमा को होता है। यह दिन बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है और कार्तिक पूर्णिमा से कई कथाएँ जुड़ी हुई हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरा नामक असुर पर विजय प्राप्त की थी। मुख्य रूप से इस दिन भगवान कार्तिकेय के साथ भगवान विष्णु और शिव की पूजा होती है।कार्तिक पूर्णिमा: परंपरायदि हम कार्तिक पूर्णिमा की बात करते हैं तो प्रबोधिनी एकादशी का बड़ा महत्व है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार चतुर्मास के दौरान भगवान विष्णु द्वारा लिए गए निद्रासन से प्रबोधिनी एकादशी के दिन जागृत होते हैं। प्रबोधिनी एकादशी पूरे भारत में कई त्यौहारों के प्रारंभ का प्रतीक है। प्रबोधिनी एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक देश में कई जगहों पर मेले आदि प्रारंभ हो जाते हैं।कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु पवित्र स्नान (कार्तिक स्नान) करते हैं जो कार्तिक पूर्णिमा की पूर्वसंध्या को किया जाता है। कार्तिक स्नान सूर्योदय से पहले एवं सूर्योदय के बाद यानी दो बार किया जाता है। कार्तिक स्नान की संध्या के बाद श्रद्धालु भगवान विष्णु, शिव एवं ब्रहमा जी के साथ अंगिरा ऋषि, सूर्य एवं कार्तिकेय की आराधना करते हैं। इस दिन सत्य नारायण की कथा कराने का भी बड़ा महत्व है। प्रार्थना आदि के बाद ईश्वर को पवित्र भोजन अन्नकूट का भोग लगाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन हिंसा, दाड़ी, बाल कटाना/बनाना, पेड़ काटना, फल-फूल को तोड़ना, फसल को काटना अथवा शारीरिक संबंध बनाना ठीक नहीं माना जाता है। इस दिन गाय को खिलाना, ब्राह्णणों को दान करना और व्रत धारण करना शुभ माना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्वर्ण दान करना भी पवित्र माना गया है। देव दिपावली के दिन मंदिर में रातभर दीपों को जलाना चाहिए। इस दौरान वाराणसी के सभी मंदिरों, घाट एवं धार्मिक स्थानों की साज सज्जा की जाती है। कहा जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन 360 दीपक जलाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। दरअस्ल 360 दीपक 360 दिन के प्रतीक माने गए हैं। इस दिन दीयों को साधुओं को दिया जाता हैं अथवा उनको जल में प्रवाह किया जाता है। यह दिन कार्तिक दीपरत्न के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि प्रज्जवलित दीपक का तेज एक रत्न के समान होता है। ऐसा कहा जाता है कि इन पवित्र जलते हुए दीयों को देखकर पशु-पक्षी एवं अन्य जीव जंतु इस नैतिक संसार से ख़ुद को आज़ाद महसूस करते हैं।कार्तिक पूर्णिमा: इस दिन होने वाली अन्य घटनाएँकार्तिक पूर्णिमा को मतस्य (मछली) के जन्मदिन के रूप में जानते हैं जो भगवान विष्णु जी के अवतार हैं। इस दिन भगवान विष्णु ने एक मछली के रूप में जन्म लिया था। भगवान कार्तिकेय (भगवान शिव के पुत्र) का जन्म भी मतस्य के साथ हुआ था। वहीं वंदा जो कि तुलसी का अवतार थीं का जन्म भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। श्रद्धालुओं के लिए कार्तिक पूर्णिमा का दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा को लेकर भी बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन राधा जी के साथ रासलीला रचाई थी।इन घटनाओं के अलावा कार्तिक पूर्णिमा हमारे पूर्वजों यानी पितृ पूजन के लिए भी महत्वपूर्ण है।मृत्युंजय हवनयद्यपि इस दिन महामृत्युंजय हवन किया जाता है, लेकिन वास्तव में यह कोई धार्मिक प्रक्रिया नहीं है। हवन का प्रारंभ हवनकुंड में अग्नि जलाकर किया जाता है। जैसे ही मंत्र को दोहराया जाता है वैसे ही हवनकुंड में घी डाला जाता है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।महामृत्युंजय मंत्र ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् ।उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माम्रतात् ।।मृत्युंजय हवन को समाप्त करने के बाद 108 बार ‘ॐ स्वाहा’ का जाप करें।
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