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‬: उच्च तथा नीच राशि के ग्रह— *शिव शक्ति ज्योतिषी इंदौर 9755555085*ज्योतिष में रूचि रखने वाले लोगों के मन में उच्च तथा नीच राशियों में स्थित ग्रहों को लेकर एक प्रबल धारणा बनी हुई है कि अपनी उच्च राशि में स्थित ग्रह सदा शुभ फल देता है तथा अपनी नीच राशि में स्थित ग्रह सदा नीच फल देता है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह को तुला राशि में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है तथा इसीलिए तुला राशि में स्थित शनि को उच्च का शनि कह कर संबोधित किया जाता है और अधिकतर ज्योतिषियों का यह मानना है कि तुला राशि में स्थित शनि कुंडली धारक के लिए सदा शुभ फलदायी होता है।**किंतु यह धारणा एक भ्रांति से अधिक कुछ नहीं है तथा इसका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं है और इसी भ्रांति में विश्वास करके बहुत से ज्योतिष प्रेमी जीवन भर नुकसान उठाते रहते हैं क्योंकि उनकी कुंडली में तुला राशि में स्थित शनि वास्तव में अशुभ फलदायी होता हैतथा वे इसे शुभ फलदायी मानकर अपने जीवन में आ रही समस्याओं का कारण दूसरे ग्रहों में खोजते रहते हैं तथा अपनी कुंडली में स्थित अशुभ फलदायी शनि के अशुभ फलों में कमी लाने का कोई प्रयास तक नहीं करते। इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आइए एक नज़र में ग्रहों के उच्च तथा नीच राशियों में स्थित होने की स्थिति पर विचार कर लें।नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह को किसी एक राशि विशेष में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है जिसे इस ग्रह की उच्च की राशि कहा जाता है। इसी तरह अपनी उच्च की राशि से ठीक सातवीं राशि में स्थित होने पर प्रत्येक ग्रह के बल में कमी आ जाती है तथा इस राशि को इस ग्रह की नीच की राशि कहा जाता है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह की उच्च की राशि तुला है तथा इस राशि से ठीक सातवीं राशि अर्थात मेष राशि शनि ग्रह की नीच की राशि है तथा मेष में स्थित होने से शनि ग्रह का बल क्षीण हो जाता है। इसी प्रकार हर एक ग्रह की 12 राशियों में से एक उच्च की राशि तथा एक नीच की राशि होती है।**किंतु यहां पर यह समझ लेना अति आवश्यक है कि किसी भी ग्रह के अपनी उच्च या नीच की राशि में स्थित होने का संबंध केवल उसके बलवान या बलहीन होने से होता है न कि उसके शुभ या अशुभ होने से। तुला में स्थित शनि भी कुंडली धारक को बहुत से अशुभ फल दे सकता है जबकि मेष राशि में स्थित नीच राशि का शनि भी कुंडली धारक को बहुतसे लाभ दे सकता है। इसलिए ज्योतिष में रूचि रखने वाले लोगों को यह बात भली भांति समझ लेनी चाहिए कि उच्च या नीच राशि में स्थित होने का प्रभाव केवल ग्रह के बल पर पड़ता है न कि उसके स्वभाव पर। पारम्परिक भारतीय ज्योतिष कभी यह नहीं कहती कि उच्च का ग्रह हमेशा अच्छे परिणाम देगा और नीच का ग्रह हमेशा खराब परिणाम देगा। लेकिन हेमवंता नेमासा काटवे की मानें तो उच्च ग्रह हमेशा खराब परिणाम देंगे और नीच ग्रह अच्छे परिणाम देंगे। इसके पीछे उनका मंतव्य मुझे यह नजर आता है कि जब कोई ग्रह उच्च का होता है तो वह इतनी तीव्रता से परिणाम देता है कि व्यक्ति की जिंदगी में कर्मों से अधिक प्रभावी परिणाम देने लगता है। यानि व्यक्ति कोई एक काम करना चाहे और ग्रह उसे दूसरी ओर लेकर जाएं। इस तरह व्यक्ति की जिंदगी में संघर्ष बढ़ जाता है। इसी वजह से काटवे ने उच्च के ग्रहों को खराब कहा होगा।कुछ परिस्थितियां ऐसी भी होती हैं जब नीच ग्रह उच्च का परिणाम देते हैं। यह मुख्य रूप से लग्न में बैठे नीच ग्रह के लिए कहा गया है। मैंने तुला लग्न में सूर्य और गुरू की युति अब तक चार बार देखी है।तुला लग्न में सूर्य नीच का हुआ और गुरू अकारक।अगर टर्मिनोलॉजी के अनुसार गणना की जाए तो सबसे निकृष्ट योग बनेगा। लेकिन ऐसा नहीं होता। लग्न में सूर्य उच्च का परिणाम देता है और वास्तव में देखा भी यही गया। लग्न में उच्च का सूर्य गुरू के साथ हो तो जातक अपने संस्थान में शीर्ष स्थान पर पहुंचता है॥*Shiv Shakti Jyotish 9425964795*आइए कुछ तथ्यों की सहायता से इस विचार को समझने का प्रयास करते हैं। शनि नवग्रहों में सबसेधीमी गति से भ्रमण करते हैं तथा एक राशि में लगभग अढ़ाई वर्ष तक रहते हैं अर्थात शनि अपनी उच्च की राशि तुला तथा नीच की राशि मेष में भी अढ़ाई वर्ष तक लगातार स्थित रहते हैं। यदि ग्रहों के अपनी उच्च या नीच राशियों में स्थित होने से शुभ या अशुभ होने की प्रचलित धारणा को सत्य मान लिया जाए तो इसका अर्थ यह निकलता है कि शनि के तुला में स्थित रहने के अढ़ाई वर्ष के समय काल में जन्में प्रत्येक व्यक्ति के लिए शनि शुभ फलदायी होंगे क्योंकि इन वर्षों में जन्में सभी लोगों की जन्म कुंडली में शनि अपनी उच्च की राशि तुला में ही स्थित होंगे। यह विचार व्यवहारिकता की कसौटी पर बिलकुल भी नहीं टिकता क्योंकि देश तथा काल के हिसाब से हर ग्रह अपना स्वभाव थोड़े-थोड़े समय के पश्चात ही बदलता रहता है तथा किसी भी ग्रह का स्वभाव कुछ घंटों के लिए भी एक जैसा नहीं रहता, फिर अढ़ाई वर्ष तो बहुत लंबा समय है।**इसलिए ग्रहों के उच्च या नीच की राशि में स्थित होने का मतलब केवल उनके बलवान या बलहीन होने से समझना चाहिए न कि उनके शुभ या अशुभ होने से। मैने अपने ज्योतिष अभ्यास के कार्यकाल में ऐसी बहुत सी कुंडलियां देखी हैं जिनमें अपनी उच्च की राशि में स्थित कोई ग्रह बहुत अशुभ फल दे रहा होता है।क्योंकि अपनी उच्च की राशि में स्थित होने से ग्रह बहुत बलवान हो जाता है, इसलिए उसके अशुभ होने की स्थिति में वह अपने बलवान होने के कारण सामान्य से बहुत अधिक हानि करता है।इसी तरह मेरे अनुभव में ऐसीं भी बहुत सी कुंडलियां आयीं हैं जिनमें कोई ग्रह अपनी नीच की राशि में स्थित होने पर भी स्वभाव से शुभ फल दे रहा होता है किन्तु बलहीन होने के कारण इन शुभ फलों में कुछ न कुछ कमी रह जाती है। ऐसे लोगों को अपनी कुंडली में नीच राशि में स्थित किन्तु शुभ फलदायी ग्रहों के रत्न धारण करने से बहुत लाभ होता है क्योंकि ऐसे ग्रहों के रत्न धारण करने से इन ग्रहों को अतिरिक्त बल मिलता है तथा यह ग्रह बलवान होकर अपने शुभ फलों में वृद्धि करने में सक्षम हो जाते हैं।हर ग्रह अपनी उच्च राशि में तीव्रता से परिणाम देता है और नीच राशि में मंदता के साथ। अगर वह ग्रह आपकी कुण्डली में अकारक है तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह उच्च का है या नीच का। सूर्य मेष में, चंद्र वृष में, बुध कन्या में, गुरू कर्क में, मंगल मकर में, शनि तुला में और शुक्र मीन राशि में उच्च के परिणाम देते हैं।यानि पूरी तीव्रता से परिणाम देते हैं।इसी तरह सूर्य तुला में, चंद्रमा वृश्चिक में, बुध मीन में, गुरू मकर में, मंगल कर्क में, शुक्र कन्या में और शनि मेष में नीच का परिणाम देते हैं।**अब हम ग्रह एवं राशियों के कुछ वर्गीकरण को जानेंगे जो कि फलित ज्योतिष के लिए अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हैं।पहला वर्गीकरण शुभ ग्रह और पाप ग्रह का इस प्रकार है -**शुभ ग्रह: चन्द्रमा, बुध, शुक्र, गुरू हैं॥**पापी ग्रह: सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु हैं।**साधारणत चन्द्र एवं बुध को सदैव ही शुभ नहीं गिना जाता। पूर्ण चन्द्र अर्थात पूर्णिमा के पास का चन्द्र शुभ एवं अमावस्या के पास का चन्द्र शुभ नहीं गिना जाता। इसी प्रकार बुध अगर शुभ ग्रह के साथ हो तो शुभ होता है और यदि पापी ग्रह के साथ हो तो पापी हो जाता है।यह ध्यान रखने वाली बात है कि सभी पापी ग्रह सदैव ही बुरा फल नहीं देते। न ही सभी शुभ ग्रह सदैव ही शुभ फल देते हैं। अच्छा या बुरा फल कई अन्य बातों जैसे ग्रह का स्वामित्व, ग्रह की राशि स्थिति, दृष्टियों इत्यादि पर भी निर्भर करता है।जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।जैसा कि उपर कहा गया एक ग्रह का अच्छा या बुरा फल कई अन्य बातों पर निर्भर करता है और उनमें से एक है ग्रह की राशि में स्थिति। कोई भी ग्रह सामान्यत अपनी उच्च राशि, मित्र राशि, एवं खुद की राशि में अच्छा फल देते हैं। इसके विपरीत ग्रह अपनी नीच राशि और शत्रु राशि में बुरा फल देते हैं।**ग्रहों की उच्चादि राशि स्थिति इस प्रकार है —-**ग्रह उच्च राशि नीच राशि स्वग्रह राशि**1 सूर्य, मेष तुला सिंह**2 चन्द्रमा, वृषभ वृश्चिक कर्क**3 मंगल, मकर कर्क मेष, वृश्चिक**4 बुध, कन्या मीन मिथुन, कन्या**5 गुरू, कर्क मकर धनु, मीन**6 शुक्र, मीन कन्या वृषभ, तुला**7 शनि, तुला मेष मकर, कुम्भ**8 राहु, धनु मिथुन**9 केतु मिथुन धनु**उपर की तालिका में कुछ ध्यान देने वाले बिन्दु इस प्रकार हैं -1 ग्रह की उच्च राशि और नीच राशि एक दूसरे से सप्तम होती हैं। उदाहरणार्थ सूर्य मेष में उच्च का होता है जो कि राशि चक्र की पहली राशि है और तुला में नीच होता है जो कि राशि चक्र की सातवीं राशि है।2 सूर्य और चन्द्र सिर्फ एक राशि के स्वामी हैं।**राहु एवं केतु किसी भी राशि के स्वामी नहीं हैं। अन्य ग्रह दो-दो राशियों के स्वामी हैं।3 राहु एवं केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती। राहु-केतु की उच्च एवं नीच राशियां भी सभी ज्योतिषी प्रयोग नहीं करते हैं।**सभी ग्रहों के बलाबल का राशि और अंशों के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है। एक राशि में 30ए अंश होते हैं।ग्रहों के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए ग्रह किस राशि में कितने अंश पर है यह ज्ञान होना अनिवार्य है।सभी नौ ग्रहों की स्थिति का विश्लेषणइस प्रकार है-**सूर्य- सूर्य सिंह राशि में स्वग्रही होता है। 1ए से 10ए अंश तक उच्च का माना जाता है। तुला के 10ए अंश तक नीच का होता है। 1ए से 20ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ माना जाता है। सिंह में ही 21ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री होता है।**चंद्र- कर्क राशि मेंचंद्रमा स्वग्रही अथवा स्वक्षेत्री माना जाता है, परन्तु वृष राशि में 3ए अंश तक उच्च का और वृश्चिक राशि में 3ए अंश तक नीच का होता है। वृष राशि में ही 4ए से 30ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ तथा कर्क राशि में 1ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है।**मंगल- मंगल मेष तथा वृश्चिक राशियों में स्वग्रही होता है। मकर राशि में 1ए से 28ए अंश तक उच्च का तथा कर्क राशि में 1ए से 28ए अंश तक नीच का माना जाता है। मेष राशि में 1ए से 18ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ होता है और 19ए से 20ए अंश तक स्वक्षेत्री कहा जाता है।**बुध- बुध ग्रह कन्या और मिथुन राशियों में स्वग्रही होता है परंतु कन्या राशि में 15ए अंश तक उच्च का और मीन राशि में 15ए अंश तक नीच का होता है। कन्या राशि में ही 16ए से 20ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ और इसी राशि में 21ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री कहलाता है।**गुरू- गुरू धनु और मीन राशियों में स्वग्रही या स्वक्षेत्री होता है।कर्क राशि में 5ए अंश तक उच्च का और मकर राशि में 5ए अंश तक नीच का होता है। 1ए से 10ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ तथा धनु राशि में ही 14ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है।**शुक्र- शुक्र ग्रह अपनी दो राशियों वृष और तुला में स्वग्रही होता है। मीन राशि में 27ए अंश तक उच्च का और कन्या राशि में 27ए अंश तक नीच का होता है। तुला राशि में 1ए से 10ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ और उसी राशि में 11ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री होता है।**शनि- शनि अपनी दो राशियों कुंभ और मकर में स्वग्रही होता है। तुला में 1ए से 20ए अंश तक उच्च का और मेष में 20ए अंश तक नीच का होता है। कुंभ राशि में ही शनि 1ए से 20ए अंश तक मूल त्रिकोण का होता है। उसके बाद 21ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री होता है।**राहू- कन्या राशि का स्वामी मिथुन और वृष में उच्च का होता है। धनु में नीच का कर्क में मूल त्रिकोस्थ माना जाता है।**केतु- केतु मिथुन राशि का स्वामी है। 15ए अंश तक धनु और वृश्चिक राशि में उच्च का होता है। 15ए अंश तक मिथुन राशि में नीच का, सिंह राशि में मूल त्रिकोण का और मीन में स्वक्षेत्री होता है।वृष राशि में ही यह नीच का होता है।**जन्म कुंडली का विश्लेषण अंशों के आधार पर करने पर ही ग्रहों के वास्तविक बलाबल को ज्ञात किया जाता है। उदाहरण के लिए सिंह लग्न की जन्म कुंडली में सूर्य लग्न में बैठे होने से वह स्वग्रही है। यह जातक को मान सम्मान, धनधान्य बचपन से दिला रहा है। दशम भाव में वृष का चंद्रमा होने से जातक उत्तरोत्तर उन्नति करता रहेगा। अत: यह दो ग्रह ही उसके भाग्यवर्धक होंगे।**नीच भंग राज योग —–ग्रह अगर नीच राशि में बैठा हो या शत्रु भाव में तो आम धारणा यह होती है कि जब उस ग्रह की दशा आएगी तब वह जिस घर में बैठा है उस घर से सम्बन्धित विषयों में नीच का फल देगा. लेकिन इस धारणा से अगल एक मान्यता यह है कि नीच में बैठा ग्रह भी कुछ स्थितियों में राजगयोग के समान फल देता है. इस प्रकार के योग को नीच भंग राजयोग के नाम से जाना जाता है.**नीच भंग राजयोग के लिए आवश्यक स्थितियां——ज्योतिषशास्त्र के नियमों में बताया गया है कि नवमांश कुण्डली में अगर ग्रह उच्च राशि में बैठा हो तो जन्म कुण्डली में नीच राशि में होते हुए भी वह नीच का फल नहीं देता है. इसका कारण यह है कि इस स्थिति में उनका नीच भंग हो जाता है.जिस राशि में नीच ग्रह बैठा हो उस राशि का स्वामी ग्रह उसे देख रहा हो अथवा जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठा हो उस राशि का स्वामी स्वगृही होकर साथ में बैठा हो तो स्वत: ही ग्रह का नीच भंग हो जाता है।**नीच भंग के संदर्भ में एक नियम यह भी है कि नीच राशि में बैठा ग्रह अगर अपने सामने वाले घर यानी अपने से सातवें भाव में बैठे नीच ग्रह को देख रहा है, तो दोनों नीच ग्रहों का नीच भंग हो जाता है.अगर आपकी कुण्डली में ये स्थितियां नहीं बनती हों तो इन नियमों से भी नीच भंग का आंकलन कर सकते हैं जैसे जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठे हों उस राशि के स्वामी अपनी उच्च राशि में विराजमान हों तो नीच ग्रह का दोष नहीं लगता है।**एक नियम यह भी है कि जिस राशि में ग्रह नीच का होकर बैठा है उस ग्रह का स्वामी जन्म राशि से केन्द्र में विराजमान है साथ ही जिस राशि में नीच ग्रह उच्च का होता है उस राशि का स्वामी भी केन्द्र में बैठा हो तो सर्वथा नीच भंग राज योग बनता है. अगर यह स्थिति नहीं बनती है तो लग्न भी इस का आंकलन किया जा सकता है।यानी जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठा उस राशि का स्वामी एवं जिस राशि में नीच ग्रह उच्च का होता है।उसका स्वामी लग्न से कहीं भी केन्द्र में स्थित हों तो नीच भंग राज योग का शुभ फल देता है.अगर आपकी कुण्डली में ग्रह नीच राशियों में बैठे हैं तो इन स्थितियों को देखकर आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं कि आपकी कुण्डली में नीच राशि में बैठा ग्रह नीच का फल देगा अथवा यह नीच भंग राजयोग बनकर आपको अत्यंत शुभ फल प्रदान करेगा.**नीच भंग राजयोग का फल—–नीच भंग राज योग कुण्डली में एक से अधिक होने पर भी उसी प्रकार फल देता है जैसे एक नीच भंग राज योग होने पर .आधुनिक परिवेश में ज्योतिषशास्त्री मानते है कि ऐसा नहीं है कि इस योग के होने से व्यक्ति जन्म से ही राजा बनकर पैदा लेता है. यह योग जिनकी कुण्डली में बनता है उन्हें प्रारम्भ में कुछ मुश्किल हालातों से गुजरना पड़ता है जिससे उनका ज्ञान व अनुभव बढ़ता है तथा कई ऐसे अवसर मिलते हैं जिनसे उम्र के साथ-साथ कामयाबी की राहें प्रशस्त होती जाती हैं.यह योग व्यक्ति को आमतौर पर राजनेता, चिकित्सा विज्ञान एवं धार्मिक क्षेत्रों में कामयाबी दिलाता है जिससे व्यक्ति को मान-सम्मान व प्रतिष्ठा मिलती है. वैसे इस योग के विषय में यह धारणा भी है कि जिस व्यक्ति की कुण्डली में जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठा है उस राशि का स्वामी एवं उस ग्रह की उच्च राशि का स्वामी केन्द्र स्थान या त्रिकोण में बैठा हो तो व्यक्ति महान र्धमात्मा एवं राजसी सुखों को भोगने वाला होता है.इसी प्रकार नवमांश में नीच ग्रह उच्च राशि में होने पर भी समान फल मिलता है.shiv shakti jyotish Indore‬: कुंडली में भी विशेष योग होते हैं, जिनसे यह पता चलता है कि शासकीय नॉकरी, अथवा उच्चाधिकारी बनने में सफलता मिलेगी या नहीं, *मँगल शासन करने वाला ग्रह है, दशम भाव राजसत्ता से सम्बंधित है, यदि मंगल , दशम भाव दशमेश की स्तिथी अच्छी ही तो अच्छी सर्विस प्राप्त होने के योग बनते हैं। * सूर्य बुध गुरु शनि का दशम भाव में रहना या दशम भाव से द्रष्टि सम्बन्ध , दशमेश से इन ग्रहों की मित्रता भी नोकरी का कारक हैं।। *दशम भाव में मंगल उच्च राशि का हो *दशम भाव में शनि का अपनी उच्च राशि में होना।*दशम भाव में सूर्य, या गुरु का उच्च राशि में होना।। *केंद्र में कोई भी ग्रह उच्च राशि का हो, उस पर एवं दशम भाव पर शुभ ग्रह की दृष्टि होना।। *लग्नेश की लग्न पर दृष्टि हो, तथा मंगल का दशमेश से सम्बन्ध होने पर , लग्नेश एवं दशमेश की युति होने पर उच्चाधिकार प्राप्ति का योग होता है ।। *दशमेश केंद्र या त्रिकोण में हो, किसी त्रिकोणेश का केन्द्रेश से योग हो । *तुला लग्न कुंडली मे दशम भाव में चंद्र तथा चतुर्थ भाव में शुक्र होने पर भी अच्छी नोकरी के योग होते हैं।। *मकर लग्न कुंडली में दशम भाव में शुक्र पर शनि की दृष्टि हो या शनि पर शुक्र की नजर हो।Shiv Shakti Jyotish indore ‬: विविध टोटकेे :---1. जन्मकुंडली में यदि ग्यारहवें घर में शनि हो, तो मुख्य द्वार की चौखट बनाने से पहले उसके नीचे चन्दन दबा दें, सुख-समृद्धि से घर सुशोभित रहेगा।2. भवन निर्माण से पहले भूखंड पर पांच ब्राह्मणों को भोजन करना बहुत शुभ होता है। इससे घर में धन, ऐश्वर्य व सुखों का वास होता है। बच्चे भी संस्कारी व आज्ञाकारी होते हैं।3. यदि जीवन समस्याओं व दुखों से भरा हो, तो सौ ग्राम साबुत चावल किसी तालाब में डाल दें।4. यदि घर में मां को लगातार कोई कष्ट सता रहा हो, तो 121 पेड़े लेकर बच्चों को बांट दें कष्ट दूर हो जाएगा।5. यदि जमीन जायदाद लाख कोशिशों के बावजूद अधिक दामों न बिक पा रहा हो, तो कभी-कभी चाय की पत्ती जमादार को दें। चांदी का चैकोर टुकड़ा सदैव अपने पास रखें और चांदी के गिलास में ही पानी पीएं। हमेशा सफेद टोपी पहनें। संपत्ति अधिक दामों में बिक जाएगी।6. राहु ग्रह की अशुभता दूर करनी हो, तो भगवती काली की उपासना करें । राहु अशुभ हो, तो अचानक शारीरिक कष्ट होता है। चांदी की चेन गलें में पहनें राहत मिलेगी। कुत्तों को रोटी अवश्य खिलाएं, गरीबों को सूज़ी का हलवा अपने हाथ से बांटें, कष्ट दूर होगा।7. अक्षय तृतीया पर धनदा यंत्र पीले रेशमी कपड़े पर स्थापित करें, कनकधारा स्तोत्र का पाठ धूप, दीप, नैवेद्य के साथ करें और प्रतिदिन यंत्र का दर्शन करें। घर में सुख-समृद्धि का वास होगा, दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल जाएगा । हर पाठक को इस शुभ अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए ।8. यदि व्यवसाय या रोजगार में विघ्न बहुत आ रहे हों, तो दस अंधों को भोजन कराएं और गुलाब जामुन खिलाएं। अपने माता-पिता की सेवा करें, विघ्न अपने आप दूर हो जाएंगे ।9. पढाई करते वक्त विशेष कर नींद आए और पढ़ाई में मन न लगे, रूकावटें आए तो इसके लिए पूर्व की तरफ सिरहाना करके सोएं। रोज रामायण के सुन्दरकांड के कुछ अंशों का पाठ करना चाहिए। इसके साथ-साथ सवा 5 रत्ती का एक खूबसूरत मोती और सवा 6 रत्ती का मूंगा चांदी की अंगूठी में जड़वा कर क्रमशः छोटी अंगुली और अनामिका में धारण करें । पढ़ते वक्त नींद नहीं आएगी तथा इस उपाय से विद्यार्थी परीक्षा में अव्वल आते हैं और समस्त रूकावटें दूर हो जाती हैं।10. मानसिक अशांति की समस्या किसी पूर्व पाप का परिणाम होता है। इसे दूर करने के लिए यह उपाय बहुत लाभकारी है। प्रतिदिन हनुमान जी की पूजा और उनका स्मरण करें। हनुमान चालीसा का अवश्य पाठ करें। शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से उपाय शुरू करें। सोते वक्त एक छोटा सा चाकू सिरहाने के नीचे रखें। जिस कमरे में सोते हों, कपूर का लैंप जलाएं। समस्या का सामधान हो जाता है। पूर्व जन्म के पाप नष्ट होने लगते हैं और स्थितियां अनुकूल होने लगती हैं तथा मानसिक अशांति दूर होती है।11. कर्ज से मुक्ति के लिए: कर्ज से पीड़ित व्यक्ति को चाहिए कि दोनों मुटठी में काली राई लें। चौराहे पर पूर्व दिशा की ओर मुंह रखें तथा दाहिने हाथ की राई को बाईं ओर और बाएं हाथ की राई को दाहिनी दिशा में फेंक दें। एक साथ राई को फेंकना चाहिए। राई फेंकने के पश्चात चौराहे पर सरसों का तेल डाल कर दोमुखी दीपक जला देना चाहिए। दिया मिट्टी का रखना चाहिए। यह प्रयोग शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार को संध्या के समय करें। श्रद्धा द्वारा किया गया यह उपाय अवश्य कर्ज से मुक्ति दिलवाता है। एक बार सफलता न प्राप्त हो, तो दोबारा फिर कर लेना चाहिए। जिस चौराहे पर टोटका किया जा चुका हो उस दिन उस चौराहे पर टोटका नहीं करना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि अमावस्या हो और शनिवार हो तो यह विशेष फलदायी होता है । तब यह टोटका करना जादुई चमत्कार से कम नहीं है
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[18/09 1:42 pm] Chetan Joshi: गोचर विज्ञानब्रह्मांड में स्थित ग्रह अपने-अपने मार्ग पर अपनी-अपनी गति से सदैव भ्रमण करते हुए एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते रहते हैं। जन्म समय में ये ग्रह जिस राशि में पाये जाते हैं वह राशि इनकी जन्मकालीन राशि कहलाती है जो कि जन्म कुंडली का आधार है। जन्म के पश्चात् किसी भी समय वे अपनी गति से जिस राशि में भ्रमण करते हुए दिखाई देते हैं, उस राशि में उनकी स्थिति गोचर कहलाती है। वर्ष भर के समय की जानकारी गुरु और शनि से, मास की सूर्य से और प्रतिदिन की चंद्रमा के गोचर से प्राप्त की जा सकती है। वास्तविकता तो यह है कि किसी भी ग्रह का गोचर फल उस ग्रह की अन्य प्रत्येक ग्रह से स्थिति के आधार पर भी कहना चाहिए न कि केवल चंद्रमा की स्थिति से।गोचर फलादेश के सिद्धांत:1. मनुष्य को ग्रह गोचर द्वारा ग्रहों की, मुख्यतः ग्रहों की जन्मकालीन स्थिति के अनुरूप ही अच्छा अथवा बुरा फल मिलता है। इस विषय में मंत्रेश्वर महाराज ने ‘फलदीपिका’ में लिखा है। ‘‘यद भागवो गोचरतो विलग्नात्देशश्वरः सर्वोच्च सुहृदय ग्रहस्थः तद् भाववृद्धि कुरूते तदानीं बलान्वितश्चेत प्रजननेऽपि तस्य’’ अर्थात् यदि कोई ग्रह जन्म कुंडली में बली होकर गोचर में भी अपनी उच्च राशि, अपनी राशि अथवा मित्र राशि में जा रहा हो तो लग्न से जिस भाव में गोचर द्वारा जा रहा होगा, उसी भाव के शुभ फल को बढ़ायेगा। इसी विषय को पुनः अशुभ फल के रूप में भी फलदीपिका कार इस प्रकार लिखते हैं। ‘‘बलोनितो जन्मनि पाकनाथौ मौढ्यं स्वनीचं रिपुमंदिरं वा। प्राप्तश्च यद भावमुपैति चारात् तदभाव नाशकुरूते तदानीम्।। अर्थात् यदि कुंडली में कोई ग्रह जिसकी दशा चल रही हो, निर्बल है, अस्त है, नीच राशि में अथवा शत्रु राशि में स्थित है तो वह ग्रह गोचर में लग्न के जिस भाव को देखेगा या जायेगा उस भाव का नाश करेगा।2. यदि जन्मकुंडली में कोई ग्रह अशुभ भाव का स्वामी हो या अशुभ स्थान में पड़ा हो या नीच राशि अथवा नीच नवांश में हो तो वह ग्रह-गोचर में शुभ स्थान में आ जाने पर भी अपना गोचर का पूर्णअशुभ फल देगा।3. यदि कोई ग्रह जन्मकुंडली में शुभ हो, और गोचर में बलवान होकर शुभ स्थान में भ्रमण कर रहा हो तो उत्तम फल करता है।4. यदि कोई ग्रह जन्मकुंडली के अनुसार शुभ हो, गोचर में भी शुभ भाव में होकर नीच आदि प्रकार से अधम हो तो कम शुभ फल करता है।5. यदि कोई ग्रह जन्म कुंडली में अशुभ हो और गोचर में शुभ भाव में हो, परंतु नीच, शत्रु आदि राशि में हो तो बहुत कम शुभ फल करेगा, अधिकांश अशुभ फल ही प्रदान करेगा।6. यदि कोई ग्रह जन्मकुंडली में अशुभ है और गोचर में भी अशुभ भाव में अशुभ राशि आदि में स्थित है तो वह अत्यंत अशुभ फल प्रदान करेगा। 7. जब ग्रह गोचरवश शुभ स्थान से जा रहा हो और जन्मकुंडली में स्थित दूसरे शुभ ग्रहों से अंशात्मक दृष्टि योग कर रहा हो तो विशेष शुभ फल प्रदान करता है।8. गोचर में जब ग्रह मार्गी से वक्री होता है अथवा वक्री से मार्गी होता है तब विशेष प्रभाव दिखलाता है।9. जब गोचर में कोई ग्रह अग्रिम राशि में चला जाता है और कुछ समय के लिए वक्री होकर पिछली राशि में आ जाता है तब भी वह आगे की राशि का फल प्रदान करता है।10. सूर्य और चंद्रमा का गोचर फल: जिस जातक के जन्म नक्षत्र पर सूर्य या चंद्र ग्रहण पड़ता है तो उस व्यक्ति के स्वास्थ्य आयु आदि के लिए बहुत अशुभ होता है। इस संबंध में ‘मुहूर्त’ चिंतामणि’ का निम्नलिखित श्लोक इस प्रकार है- ‘‘जन्मक्र्षे निधने ग्रहे जन्मतोघातः क्षति श्रीव्र्यथा, चिन्ता सौख्यकलत्रादौस्थ्यमृतयः स्युर्माननाशः सुखम्। लाभोऽपाय इति क्रमातदशुभ्यध्वस्त्यै जपः स्वर्ण, गोदानं शान्तिस्थो ग्रहं त्वशुभदं नोवीक्ष्यमाहुवरे।।’’ अर्थात जिस व्यक्ति के जन्म नक्षत्र पर ग्रहण पड़ा हो उसकी सूर्य चंद्र के द्वारा जन्म नक्षत्र पर गोचर भ्रमण के समय मृत्यु हो सकती है। यही फल जन्म राशि पर ग्रहण लगने से कहा है। जन्म राशि से द्वितीय भाव में ग्रहण पड़े तो धन की हानि, तृतीय में पड़े तो धन की प्राप्ति होती है, पांचवे तो चिंता, छठे पड़े तो सुखप्रद होता है। सातवें पड़े तो स्त्री से पृथकता हो या उसका अनिष्ट हो, आठवें पड़े तो रोग हो, नवें पड़े तो मानहानि, दशम में पड़े तो कार्यों में सिद्धि, एकादश पड़े तो विविध प्रकार से लाभ और बारहवें पड़े तो अधिक व्यय तथा धन नाश होता है।11. यदि वर्ष का फल अशुभ हो अर्थात् शनि, गुरु और राहु गोचर में अशुभ हों और मास का फल उत्तम हो तो उस मास में शुभ फल बहुत ही कम आता है।12. यदि वर्ष और मास दोनों का फल शुभ हो तो उस मास में अवश्य अतीव शुभ फल मिलता है। 13. ग्रहों का गोचर में शुभ अशुभ फल जो उनके चंद्र राशि में भिन्न भावों में आने पर कहा है उसमें बहुत बार कमी आ जाती है। उस कमी का कारण ‘वेध’ भी होता है। जब कोई ग्रह किसी भाव में गोचरवश चल रहा हो तो उस भाव से अन्यत्र एक ऐसा भाव भी होता है जहां कोई अन्य ग्रह स्थित है तो पहले ग्रह का ‘वेध’ हो जाता है अर्थात् उसका शुभ अथवा अशुभ फल नहीं हो पाता। जैसे सूर्य चंद्र लग्न से जब तीसरे भाव में आता है, तो वह शुभ फल करता है, परंतु यदि गोचर में ही चंद्र लग्न से नवम् भाव में कोई ग्रह बैठा हो तो फिर सूर्य की तृतीय स्थिति का फल रुक जायेगा, क्योंकि तृतीय स्थित सूर्य के लिए नवम वेध स्थान है। इसी प्रकार चंद्रमा जब गोचर में चंद्र लग्न से पंचम भाव में स्थित हो तो कोई ग्रह यदि चंद्र लग्न से छठे भाव में आ जाय तो पंचम चंद्र का वेध हो जायेगा। इसी प्रकार अन्य ग्रहों का भी वेध द्वारा फल का रुक जाना समझ लेना चाहिए। सूर्य तथा शनि पिता पुत्र हैं। इसलिए इनमें परस्पर वेध नहीं होता है। इसी प्रकार चंद्र बुध माता पुत्र है। अतः चंद्र और बुध में भी परस्पर वेध नहीं होता। वेध को समझने के लिए एक तालिका बनाई गई है, जिसमें नौ ग्रहों के चंद्र लग्न से विविध भावों पर आने से कहां-कहां वेध होना है दर्शाया गया है। इस तालिका में अंकों से तात्पर्य भाव से है जो कि चंद्र लग्न से गिनी जाती है। उदाहरण: जैसे सूर्य तृतीय भाव में हो तो नवम भाव स्थित ग्रह (शनि को छोड़कर) इसको वेध करेगा। यदि चतुर्थ भाव में हो तो तृतीय भाव में स्थित ग्रह (शनि को छोड़कर) इसका वेध करेगा। यदि पंचम भाव में हो तो छठे भाव में स्थित कोई भी ग्रह (शनि को छोड़कर) इसको वेध करेगा इत्यादि।14. मुहूर्त चिंतामणि में कहा गया है कि ‘‘दुष्टोऽपि खेटो विपरीतवेधाच्छुभो द्विकोणेशुभदः सितेऽब्जः ।।’’ अर्थात कोई ग्रह यदि गोचर में दुष्ट है, अर्थात जन्म राशि में अशुभ स्थानों में स्थित होने के कारण अशुभ फलदाता है और फिर वेध में आ गया है तो वह शुभफल दाता हो जाता है। दूसरे शब्दों में वेध का प्रभाव नाशात्मक है। यदि अशुभता का नाश होता है तो शुभता की प्राप्ति स्वतः सिद्ध होती है। 15. गोचर में चल रहे ग्रहों के फल के तारतम्य के सिलसिले में स्मरणीय है, वह यह है कि फल बहुत अंशों में ग्रह अष्टक वर्ग पर निर्भर करता है। अपने अष्टक वर्ग में उसे उस स्थान में चार से अधिक रेखा प्राप्त होती हैं तो उस ग्रह की अशुभता कुछ दूर हो जायेगी। यदि उसे चार से कम रेखा मिलती हैं तो जितनी-जितनी कम रेखा होती जायेंगी उतनी ही फल में अशुभता बढ़ती जायेगी। यदि उसे कोई रेखा प्राप्त नहीं हो तो फल बहुत ही अशुभ होगा। यदि गोचरवश शुभ ग्रह को चार से अधिक रेखा प्राप्त होती हैं तो स्पष्ट है तो जितनी-जितनी अधिक रेखा होंगी, उतना ही फल उत्तम होता जायेगा। नोट: अष्टक वर्ग में रेखा को शुभ फल मानते है तथा बिंदु को अशुभ। दक्षिण भारत में बिंदु को शुभ एवं रेखा को अशुभ मानते हैं। महर्षि पराशर नें रेखा को शुभ एवं बिंदु को अशुभ के रूप में अंकित करने की सलाह दी है। इसीलिये यहां रेखा को शुभ के रूप में अंकित है।16. गोचर में ग्रह कब फल देते हैं- ग्रहों की जातक विचार में जो फल प्रदान करने की विधि है वही गोचर में भी है। फलदीपिकाकार मंत्रेश्वर महाराज ने लिखा है। ‘‘क्षितितनय पतंगो राशि पूर्व त्रिभागे सुरपति गुरुशुक्रौ राशि मध्य त्रिभागे तुहिन किरणमन्दौराशि पाश्चात्य भागे शशितनय भुजड्गौ पाकदौ सार्वकालम्।।’’ अर्थात सूर्य तथा मंगल गोचर वश जब किसी राशि में प्रवेश करते हैं तो तत्काल ही अपना प्रभाव दिखलाते हंै। एक राशि में 30 अंश होते हैं, इसलिए सूर्य और मंगल 0 डिग्री से 10 डिग्री तक ही विशेष प्रभाव करते हैं। गुरु और शुक्र मध्य भाग में अर्थात 10 अंश से 20 अंश विशेष शुभ तथा अशुभ प्रभाव दिखलाते हैं। चंद्रमा और शनि, राशि के अंतिम भाग अर्थात 29 अंश से 30 अंश तक विशेष प्रभावशाली रहते हैं। बुध तथा राहु सारी राशि में अर्थात् 0 अंश से 30 अंश तक सर्वत्र एक सा फल दिखाते हैं।17. ग्रहों के गोचर में फलप्रदान करने के विषय में ‘काल प्रकाशिका’ नामक पुस्तक में थोड़ा सा मतभेद चंद्र और राहु के विषय में है। उसमें कहा गया है। ‘‘सूर्योदौ फलदावादौ गुरुशुक्रौ मध्यगौ मंदाही फलदावन्तये बुधचन्द्रौ तु सर्वदा। अर्थात सूर्य तथा मंगल राशि के प्रारंभ में, गुरु, शुक्र मध्य में, शनि और राहु अंत में तथा बुध और चंद्रमा सब समय में फल देते हैं।जन्म कालीन ग्रहों पर से गोचर ग्रहों के भ्रमण का फल:1. जन्मकालिक ग्रहों से सूर्य का गोचर फल: जन्मस्थ सूर्य पर से या उससे सातवें स्थान (जन्म कुंडली) से गोचर के सूर्य का गोचर व्यक्ति को कष्ट देता है। धन लाभ तो होता है किंतु टिकता नहीं, व्यवसाय भी ठीक नहीं चलता। शरीर अस्वस्थ रहता है। यदि दशा, अंतर्दशा भी अशुभ हो तो पिता की मृत्यु हो सकती है। इस अवधि में जातक का अपने पिता से संबंध ठीक नहीं रहता है। जन्मस्थ चंद्रमा पर से या इससे सातवें स्थान में गुजरता हुआ सूर्य शुभ फल प्रदान करता है। यदि सूर्य कुंडली में अशुभ स्थान का स्वामी हो तो मानसिक कष्ट, अस्वस्थता होती है। यदि सूर्य शुभ स्थान का स्वामी हो तो शुभ फल देता है। जन्मस्थ मंगल पर से या इससे सातवें स्थान में गोचर रवि का प्रस्थान प्रायः अशुभ फल देता है। यदि कुंडली में मंगल बहुत शुभ हो तो अच्छा फल मिलता है। जन्मस्थ बुध से या उसके सातवें स्थान से सूर्य गुजरता है तो सामान्य तथा शुभ फल करता है परंतु संबंधियों से वैमनस्य की संभावना रहती है। जन्मस्थ गुरु पर से या उसके सातवें स्थान से गोचर का सूर्य शुभ फल नहीं देेता है। इस अवधि में उन्नति की संभावना कम रहती है। जन्मस्थ शुक्र पर से या उससे सातवें स्थान से सूर्य भ्रमण करने पर स्त्री सुख नहीं मिलता। स्त्री बीमार रहती है। व्यय होता है। राज्य की ओर से कष्ट होता है। जन्मस्थ शनि से या उससे सप्तम स्थान पर गोचर का सूर्य कष्ट देता है।2. जन्मकालिक ग्रहों से चंद्र का गोचर फल: जन्मकालिक ग्रहों से चंद्र का गोचर फल जन्मस्थ चंद्र के पक्षबल पर निर्भर करता है। यदि पक्षबल में बली हो तो शुभ अन्यथा क्षीण होने पर अशुभ फल देता है। जन्मस्थ सूर्य पर से या उससे सातवें स्थान से गोचर के चंद्रमा का शुभ प्रभाव जन्मस्थ चंद्र के शुभ होने पर निर्भर है। चंद्रमा स्वास्थ्य की हानि, धन की कमी, असफलता तथा आंख में कष्ट देता है। जन्मस्थ गुरु पर से या उससे सातवें स्थान से गोचर का चंद्रमा बली हो तो स्त्री सुख देता है। ऐशो आराम के साधन जुट जाते हैं, धन का लाभ होता है लेकिन जन्मकालीन चंद्रमा क्षीण हो तो इसके विपरीत अशुभ फल मिलता है। जन्मस्थ शनि पर से अथवा उससे सप्तम स्थान पर से जब गोचर का चंद्रमा गुजरता है तो धन मिलता है लेकिन निर्बल हो तो मनुष्य को व्यापार में घाटा होता है।3. जन्मकालिक ग्रहों से मंगल का गोचर फल: जन्म के सूर्य पर से अथवा उससे सातवें, छठे अथवा उससे दसवें स्थान पर से गोचर का मंगल जब जाता है तब उस अवधि में रोग होता है। खर्च बढ़ता है। व्यवसाय में बाधा आती है और नौकरी में भी वरिष्ठ पदाधिकारी नाराज हो जाते हैं। आंखों में कष्ट होता है तथा पेट के आॅपरेशन की संभावना रहती है। पिता को कष्ट होता है। जन्म के चंद्रमा पर से अथवा उससे सातवें, छठे अथवा दसवें स्थान पर गोचरवश जब मंगल आता है तो शारीरिक चोट की संभावना रहती है। क्रोध आता है। भाईयों द्वारा कष्ट होता है। धन का नाश होता है। यदि जन्म कुंडली में मंगल बली हो तो धन लाभ होता है। राजयोग कारक हो तो भी धन का विशेष लाभ होता है। जन्मस्थ मंगल पर से अथवा उससे सातवें, छठे अथवा दसवें स्थान में गोचरवश मंगल आता है और जन्मकुंडली में मंगल दूसरे, चैथे, पांचवे, सातवें, आठवें अथवा बारहवें स्थान में हो और विशेष बलवान न हो तो धन हानि, कर्ज, नौकरी छूटना, बल में कमी, भाइयों से कष्ट व झगड़ा होता है तथा शरीर में रोग होता है। जन्मस्थ बुध पर अथवा उससे सातवें, छठे अथवा दसवें स्थान से जब मंगल भ्रमण करता है तो अशुभ फल मिलता है। बड़े व्यापारियों के दो नंबर के खाते पकड़े जाते हैं। झूठी गवाही या जाली हस्ताक्षर के मुकदमे चलते हैं। धन हानि होती है। जन्मस्थ गुरु पर से अथवा उससे सातवें, छठे अथवा दसवें स्थान में गोचरवश मंगल आता है तो लाभ होता है। लेकिन संतान को कष्ट होता है। जन्मस्थ शुक्र पर से अथवा उससे सातवें, छठे अथवा दसवें स्थान में गोचरवश मंगल भ्रमण करता है तो कामवासना तीव्र होती है। वैश्या इत्यादि से यौन रोग की संभावना रहती है। आंखों में कष्ट तथा पत्नी को कष्ट होता है। पत्नी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है। जन्मस्थ शनि पर से अथवा उससे सातवें, छठे अथवा दसवें स्थान से मंगल गुजरता है और यदि जन्मकुंडली में शनि द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, अष्टम, नवम अथवा द्वादश भाव में शत्रु राशि में स्थित हो तो उस गोचर काल में बहुत दुख और कष्ट होते हैं। भूमि व्यवसाय से या अन्य व्यापार से हानि होती है। मुकदमा खड़ा हो जाता है। स्त्री वर्ग एवं निम्न स्तर के व्यक्तियों से हानि होती है। यदि जन्मकुंडली में शनि एवं मंगल दोनों की शुभ स्थिति हो तो विशेष हानि नहीं होती है। लेकिन मानसिक तनाव बना रहता है।4. जन्मकालिक ग्रहों से बुध का गोचर फल: बुध के संबंध में यह मौलिक नियम है कि यदि बुध शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो शुभ एवं पापी ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो पाप फल करता है। इसलिए गोचर के बुध का फल उस ग्रह के फल के अनुरूप होता है जिससे या जिनसे जन्मकुंडली में बुध अधिक प्रभावित है। यदि बुध पर सूर्य मंगल, शनि यदि नैसर्गिक पापी ग्रहों का प्रभाव शुभ ग्रहों के अपेक्षा अधिक हो तो ऊपर दिये गये सूर्य, मंगल, शनि आदि ग्रहों के गोचर फल जैसा फल करेगा। विपरीत रूप से यदि जन्मकुंडली में बुध पर प्रबल प्रभाव, चंद्र, गुरु अथवा शुक्र का हो तो इन ग्रहों के गोचर फल जैसा फल भी देगा।5. जन्मकालिक ग्रहों से गुरु का गोचर फल: जन्मकालिक सूर्य से अथवा उससे सप्तम, पंचम अथवा नवम भाव से गोचरवश जाता हुआ गुरु यदि चंद्र लग्न के स्वामी का मित्र है तो गुरु बहुत अच्छा फल प्रदान करता है। यदि गुरु साधारण बली है तो साधारण फल होगा। यदि गुरु, चंद्र लग्नेश का शत्रु अथवा शनि, राहू अधिष्ठित राशि का भी स्वामी हो तो खराब फल करेगा। जन्मस्थ चंद्र पर से अथवा इससे सप्तम, पंचम अथवा नवम भाव से जाता हुआ गुरु अशुभ फल करता है। यदि जन्मकुंडली में चंद्रमा 2, 3, 6, 7, 10 और 11 राशि में हो और गुरु शनि अथवा राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी हो तो ऐसा गोचर का गुरु रोग देता है। माता से वियोग करता है। धन का नाश एवं व्यवसाय में हानि होती है। कर्ज के कारण मानसिक परेशानी होती है तथा घर से दूर भी कराता है। जन्मस्थ मंगल पर से अथवा इससे सप्तम, पंचम या नवम भाव से गुजरता हुआ गुरु प्रायः शुभ फल देता है। यदि कुंडली में गुरु राहु या शनि अधिष्ठित राशियों का स्वामी हो तो खराब फल मिलता है। जन्मस्थ बुध पर से अथवा इससे सप्तम, पंचम या नवम भाव में, आया हुआ गोचर का गुरु निम्न प्रकार से फल प्रदान करता है। (क) यदि बुध अकेला हो और किसी ग्रह के प्रभाव में न हो तो शुभ फल मिलता है । (ख) यदि बुध पर गुरु के मित्र ग्रहों का अधिक प्रभाव हो तो गोचर के गुरु का वही फल होगा जो उन-उन ग्रहों पर गुरु की शुभ दृष्टि का होता है अर्थात शुभ फल प्राप्त होगा। (ग) यदि बुध पर गुरु के शत्रु ग्रहों का अधिक प्रभाव हो तो गोचर का गुरु अनिष्ट फल देगा। विशेषतया उस समय जब कि जन्म कुंडली में गुरु, शनि, राहु अधिष्ठित राशियों का स्वामी हो और बुध पर दैवी श्रेणी के ग्रहों का प्रभाव हो। (घ) यदि बुध अधिकांशतः आसुरी श्रेणी के ग्रहों से प्रभावित हो तथा गुरु, शनि, राहु अधिष्ठित राशियों का स्वामी हो तो गुरु के गोचर में कुछ हद तक शुभता आ सकती है। जन्मस्थ गुरु पर से अथवा उससे सप्तम, पंचम अथवा नवम भाव में गोचरवश आया हुआ गुरु शुभ फल नहीं देता है। यदि यह जन्मकुंडली में 3, 6, 8 अथवा 12 भावों में शत्रु राशि में स्थित हो या पाप युक्त, पाप दृष्ट हो या शनि राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी हो, ऐसी स्थिति में वह खराब फल देता है। यदि गुरु जन्म समय में बलवान हो तो शुभ फल होता है। जन्मस्थ शुक्र पर से अथवा इससे सप्तम, पंचम अथवा नवम भाव में जब गोचर वश गुरु आता है तो शुभ फल देता है, यदि शुक्र जन्म कुंडली में बली हो अर्थात् द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम अथवा द्वादश भाव में स्थित हो। यदि शुक्र जन्मकुंडली में अन्यत्र हो और गुरु भी पाप दृष्ट, पापयुक्त हो तो गोचर का गुरु खराब फल देता है। जन्मस्थ शनि पर से अथवा इससे सप्तम, पंचम अथवा नवम भाव से गोचरवश जब गुरु आता है तो शुभफल करता है। यदि शनि जन्मकुंडली में प्रथम, द्वितीय, तृतीय, षष्ठ, सप्तम अष्टम, दशम अथवा एकादश भावों में हो तो डूबा हुआ धन मिलता है तथा लाभ होता है यदि शनि अन्यत्र हो और पराशरीय नियमों के अनुसार अशुभ आधिपत्य भी हो तो गोचर का गुरु कोई लाभ नहीं पहुंचा सकता है बल्कि हानिप्रद ही सिद्ध होता है।6. जन्मकालिक ग्रहों से शुक्र का गोचर फल: जन्म के सूर्य पर से अथवा इससे सप्तम स्थान में गोचरवश जाता हुआ शुक्र लाभप्रद होता है। यदि शुक्र का आधिपत्य अशुभ हो तो व्यसनों में समय बीतता है। जन्मस्थ चंद्र पर से अथवा इससे सप्तम भाव में गोचर वश आया हुआ शुक्र मन में विलासिता उत्पन्न करता है। वाहन का सुख मिलता है। धन की वृद्धि तथा स्त्री वर्ग से लाभ होता है। चंद्र यदि निर्बल हो तो अल्प मात्रा मंे लाभ मिलता है। जन्मस्थ मंगल पर से या उससे सप्तम भाव में गोचरवश आया हुआ शुक्र बल वृद्धि करता है, कामवासना में वृद्धि करता है, भाई के सुख को बढ़ाता है तथा भूमि से लाभ होता है। जन्मस्थ बुध पर से अथवा उससे सप्तम भाव में गोचर वश आया हुआ शुक्र विद्या लाभ देता है। सभी से प्यार मिलता है। स्त्री वर्ग से तथा व्यापार से लाभ होता है। यह फल तब तक मिलता है जब बुध अकेला हो। यदि बुध किसी ग्रह विशेष से प्रभावित हो तो गोचर का फल उस ग्रह पर से शुक्र के संचार जैसा होता है। जन्मस्थ गुरु पर से अथवा उससे सातवें भाव में गोचरवश जब शुक्र आता है जो सज्जनों से संपर्क बढ़ता है, विद्या में वृद्धि होती है। पुत्र से धन मिलता है, राजकृपा होती है, सुख बढ़ता है। यदि शुक्र निर्बल हो और शनि राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी हो तो फल विपरीत होता है। जन्मस्थ शुक्र पर से अथवा उससे सप्तम भाव से जब शुक्र गुजरता है तो विलासिता की वस्तुओं में और स्त्रियों से संपर्क में वृद्धि करता है। तरल पदार्थों से लाभ देता है। स्त्री सुख में वृद्धि करता है तथा व्यापार में वृद्धि करता है। कमजोर शुक्र कम फल देता है। जन्मस्थ शनि पर से अथवा इससे सप्तम भाव से गोचरवश जब शुक्र आता है तो मित्रों की वृद्धि, भूमि आदि की प्राप्ति, स्त्री वर्ग से लाभ, नौकरी की प्राप्ति होती है। कमजोर शुक्र कम फल प्रदान करता है।7. जन्मकालिक ग्रहों से शनि का गोचर फल: जन्म के सूर्य पर से अथवा उससे सप्तम, एकादश अथवा चतुर्थ भाव में जब गोचरीय शनि आता है तो नौकरी छूटने की संभावनाएं रहती है, पेट में रोग तथा पिता को परेशानी होती है। जन्मस्थ चंद्र पर से अथवा इससे सप्तम, एकादश अथवा चतुर्थ भाव में शनि भ्रमण करता है तब धन हानि, मानसिक तनाव होता है तथा रोग होता है। यदि चंद्र लग्न आसुरी श्रेणी की हो तो मिश्रित फल मिलता है तथा आर्थिक लाभ भी हो सकता है। जन्मस्थ मंगल पर से अथवा इससे सप्तम भाव से गोचरवश यदि शनि जाए तो शत्रुओं से पाला पड़ता है, स्वभाव में क्रूरता बढ़ती है तथा भाईयों से अनबन रहती है। राज्य से परेशानी है। रक्त विकार एवं मांसपेशियों में कष्ट होता है। बवासीर हो सकता है। जन्मस्थ बुध पर से अथवा इससे सप्तम, एकादश अथवा चतुर्थ भाव में जब गोचर वश शनि जाता है तो बुद्धि का नाश, विद्या हानि, संबंधियों से वियोग व्यापार में हानि, मामा से अनबन एवं अंतड़ियों में रोग होता है। यदि बुध आसुरी श्रेणी का हो तो धन का विशेष लाभ होता है। जन्मस्थ गुरु पर से अथवा इससे सप्तम, एकादश अथवा चतुर्थ भाव से जब गोचरवश शनि जाता है तब कर्मचारियों की ओर से विरोध, धन में कमी पुत्र से अनबन अथवा वियोग होता है। सुख में कमी आती है। जिगर के रोग होते हैं। जन्मस्थ शुक्र पर से अथवा उससे सप्तम स्थान से, एकादश अथवा चतुर्थ भाव से गोचरवश शनि पत्नी से वैमनस्य कराता है। यदि शुक्र जन्म कुंडली में राहु, शनि आदि से पीड़ित हो तो तलाक भी करवा सकता है। प्रायः धन और सुख में कमी लाता है। सिवाय इसके जबकि जन्म लग्न आसुरी श्रेणी का हो। जन्मस्थ शनि पर से अथवा इससे सप्तम, एकादश अथवा चतुर्थभाव में जब गोचर वश शनि भ्रमण करता है तो निम्न वर्ग के लोगों से हानि, भूमि, नाश, टांगों में दर्द तथा कई प्रकार के दुख होते हैं। यदि लग्न तथा चंद्र लग्न आसुरी श्रेणी के हो तो धन, पदवी आदि सभी बातों में सुख मिलता है।8. जन्मकालिक ग्रहों से राहु/केतु का गोचर फल: राहु और केतु छाया ग्रह है। इसका भौतिक अस्तित्व नहीं। यही कारण है कि इनको गोचर पद्धति में सम्मिलित नहीं किया गया है तो भी ज्योतिष की प्रसिद्ध लोकोक्ति है। शनिवत राहू कुजावत केतु अतः गोचर में राहू शनि जैसा तथा केतु मंगल जैसा ही फल करता है। यह स्मरणीय है कि राहु और केतु का गोचर मानसिक विकृति द्वारा ही शरीर, स्वास्थ्य तथा जीवन के लिए अनिष्टकारक होता है, विशेषतया जबकि जन्मकुंडली में भी राहु, केतु पर शनि, मंगल तथा सूर्य का प्रभाव हो, क्योंकि ये छाया ग्रह राहु जहां भी प्रभाव डालते हैं वहां न केवल अपना बल्कि इन पाप एवं क्रूर ग्रहों का भी प्रभाव साथ-साथ डालते हैं। राहु और केतु की पूर्ण दृष्टि नवम एवं पंचम पर भी (गुरु की भांति) रहती है। अतः गोचर में इन ग्रहों का प्रभाव और फल देखते समय यह देख लेना चाहिए कि ये अपनी पंचम और नवम, अतिरिक्त दृष्टि से किस-किस ग्रह को पीड़ित कर रहे हैं। ऐसा भी नहीं कि सदा ही राहु तथा केतु का गोचरफल अनिष्टकारी होता है। कुछ एक स्थितियों में यह प्रभाव सट्टा, लाॅटरी, घुड़दौड़ आदि द्वारा तथा ग्ग्ग्ग्ग्अन्यथा भी अचानक बहुत लाभप्रद सिद्ध हो सकता है। वह तब, जब, कुंडली में राहु अथवा केतु शुभ तथा योगकारक ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हों और गोचर में ऐसे ग्रह पर से भ्रमण कर रहे हों जो स्वयं शुभ तथा योग कारक हों। उदाहरण के लिए यदि योगकारक चंद्रमा तुला लग्न में हो और राहु पर जन्मकुंडली में शनि की युति अथवा दृष्टि हो तो गोचर वश राहु यदि बुध अथवा शुक्र अथवा शनि पर अपनी सप्तम, पंचम अथवा नवम दृष्टि डाल रहा हो तो राहु के गोचर काल में धन का विशेष लाभ होता है, यद्यपि राहु नैसर्गिक पाप ग्रह है। अष्टक वर्ग से गोचर का फल: गोचर के फलित का अष्टक वर्ग के फलित से तालमेल बैठाने की प्रक्रिया में निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिये।1. यदि कोई ग्रह गोचर में उस राशि से संचरण कर रहा हो जिसमें उस ग्रह से संबंधित रेखाष्टक वर्ग में 4 से अधिक रेखाएं हो और सर्वाष्टक वर्ग की 30 से अधिक रेखाएं हों तो गोचर में चंद्र से अशुभ स्थिति में होने के बावजूद उस भाव-राशि से संबंधित कार्य कलापों और विषयों के संदर्भ में वह ग्रह शुभ फल प्रदान करता है।2. यदि कोई ग्रह गोचर में उस राशि में संचरण कर रहा हो जिसमें उस ग्रह से संबंधित रेखाष्टक वर्ग में 4 से कम रेखाएं हो और सर्वाष्टक वर्ग में 30 से कम रेखाएं हों तो भले ही वह ग्रह चंद्र से शुभ स्थानों में गोचर कर रहा हो, अशुभ फल ही देता है। ऐसी स्थिति में यदि उक्त ग्रह के संचरण वाली राशि चंद्र से अशुभ स्थान पर हो तो अशुभ फल काफी अधिक मिलते हैं।3. ग्रह अष्टक वर्ग में भी शुभ हों और कुंडली में उपचय स्थान (3, 6, 10वें तथा 11 वें स्थान) में निज राशि में या मित्र की राशि में या अपनी उच्च राशि में स्थित हो तो बहुत शुभ फल देते हैं और यदि अनुपचय स्थान में नीच अथवा शत्रु राशि में हो और गोचर में भी अशुभ हो तो अधिक अशुभ फल देते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अष्टक वर्ग से ग्रह का उतार-चढ़ाव देखा जाता है।4. यदि किसी भाव को कोई रेखा न मिले तो उस भाव से गोचर फल अत्यंत कष्टकारी होता है। चार रेखा प्राप्त हो तो मिश्रित फल अर्थात मध्यमफल मिलता है। 5 रेखा मिलने पर फल अच्छा होता है। 6 रेखा मिले तो बहुत अच्छा, 7 रेखा मिले तो उत्तम फल और 8 में से 8 रेखा मिल जाये तो सर्वोत्तम फल कहना चाहिए।5. जातक परिजात में अष्टकवर्ग को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। जो ग्रह उच्च, मित्र राशि अथवा केंद्र (1, 4, 7, 10) कोण (5, 9), उपचय (3, 6, 10, 11) में स्थित है, जो शुभ वर्ग में है। बलवान है तो भी यदि अष्टक वर्ग में कोई रेखा नहीं पाता है तो फल का नाश करने वाला ही होता है और यदि कोई ग्रह पापी, नीच या शत्रु ग्रह के वर्ग में हो अथवा गुलिक राशि के स्वामी हो, परंतु अष्टक वर्ग में 5, 6, 7 अथवा 8 रेखा पाता है तो यह ग्रह उत्तम फल देता है।6. सारावली ने अष्टकवर्ग के संबंध में जो सम्मति दी है, हम समझते हैं कि वह अधिक युक्तिसंगत है। सारावली में कहा गया है। ‘‘इत्युक्तं शुभ मन्यदेवमशुभं चारक्रमेण ग्रहाः’’ शक्ताशक्त विशेषितं विद्धति प्रोत्कृष्टमेतत्फलम्। स्वार्थी स्वोच्च्सुहृदगृहेषु सुतरां शस्तं त्वनिष्टसमम् नीचाराति गता ह्यानिष्ट बहुलं शक्तं न सम्यक् फलम्।। अर्थात इस प्रकार गोचरवश ये ग्रह शुभ अथवा अशुभ फल करते हैं। अष्टकवर्ग द्वारा ग्रह अच्छा, बुरा अथवा सम फल देते हैं। परंतु ग्रह उच्च राशि अथवा स्वक्षेत्र में होकर भी यदि अष्टकवर्ग में अशुभ हो अर्थात कम रेखा प्राप्त हों, तो बुरा फल देते हैं। 4. कोई ग्रह किसी राशि विशेष में कब-कब अपना शुभ या अशुभ फल दिखलाएगा? इसके लिए प्रत्येक राशि को आठ बराबर भागों में बांट लिया जाता है। एक राशि के 30 अंशों को आठ बराबर भाग में बांटने पर मान 3 अंश 45 कला के बराबर होता है। इन अष्टमांशों को कक्षाक्रम से ही ग्रहों को अधिपत्य दिया गया है तथा वे तदनुसार ही फल देते हैं। माना किसी व्यक्ति को शनि योगकारक उत्तमफल दायक है। अब शनि जब-जब अधिक रेखा युक्त राशि में गोचर करेगा तो उसे अच्छा फल मिलेगा। यह एक सामान्य नियम है। शनि एक राशि में 2 वर्ष 6 माह तक रहेगा। तो क्या पूरे समय में व्यक्ति को शुभ या अशुभ फल मिलता रहेगा या किसी विशेष भाग में? इसका उत्तर हमें गोचराष्टक वर्ग से मिलेगा। आचार्यों ने राशि को आठ बराबर भागों में बांटा है। उन आठ भागों को कक्षा क्रम से आठो वर्गाधिपति कहते हैं। अब देखना है कि अपने भिन्नाष्टक वर्ग में किस राशि में शनि को किस ग्रह ने रेखायें दी थी।[18/09 1:42 pm] Chetan Joshi: पीड़ित बृहस्पति ===========शुभ ग्रहों में बृहस्पति अत्यधिक शुभ है लेकिन जब स्वयं पीड़ित होता है तब सम्बन्धित व्यक्ति बहुत ही परेशान होता है.मान-सम्मान तथा धनहीन और मुर्ख जैसी स्तिथि हो जाती है.अनुभव में आया है कि बृहस्पति सूर्य के साथ होकर जब अस्त होता है.तथा राहू के साथ युति होती है इन परिस्तिथियों में बृहस्पति स्वयं बहुत तनाव व कष्ट में रहता है.राहू के साथ युति में चांडाल योग की रचना बनती है जिसके कारण बृहस्पति के शुभता में आंच आती है एक तरह से बृहस्पती से सम्बन्धित फलों का क्षरण हो जाता है.राहू को क्रूर व राक्षसी स्ववभाव के कारण बृहस्पति के आचरण में भी परिवर्तन होते हैं व्यक्ति की सोच व स्वभाव में सात्विकता में कमी आ जाती है , जीवन में धोका, फरेब व विश्वासघात बहुत देखने को मिलता है.नीच का बृहस्पति जिस भाव में होगा उस भाव की हानि करेगा.जैसे, , , सप्तम में नीच का बृहस्पती हो सकता है 2 विवाह करा दे.तो कोई अचरज की बात नहीं हैलेकिन सप्तम में यदि इन्ही की राशि है तो केन्द्रीय दोष के साथ साथ मारक भी बन जायेंगें..[18/09 1:42 pm] Chetan Joshi: *सूर्य का कन्या राशि में गोचर*वैदिक ज्योतिष में सूर्य को नव ग्रहों के राजा की उपाधि दी गई है। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है अत: सूर्य के बिना जीवन संभव नहीं है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा और पिता का कारक माना गया है इसलिए कुंडली में सूर्य को पूर्वजों का प्रतिनिधि कहा जाता है। सूर्य प्रधान जातक सरकारी और अन्य सेवाओं में बड़े पदों पर आसीन रहते हैं।सूर्य ग्रह 17 सितंबर 2017 (रविवार) को रात्रि 12:55 बजे कन्या राशि में गोचर करेगा। सूर्य इस राशि में 17 अक्टूबर 2017 (मंगलवार) को दोपहर 12:50 बजे तक स्थित रहेगा। निश्चित ही सूर्य के इस गोचर का प्रभाव आपके जीवन पर पड़ेगा। उन तमाम प्रभावों का उल्लेख नीचे आपकी राशि के अनुसार दिया जा रहा है साथ ही शुभ और उत्तम फल की प्राप्ति के लिए प्रभावी उपाय बताए गए हैं। यह राशिफल आपकी चंद्र राशि पर आधारित है*मेष**सूर्य आपकी राशि से षष्ठम भाव* में गोचर करेगा। सूर्य की यह स्थिति आपके लिए सकारात्मक रहेगी। इस दौरान आपको अच्छे परिणाम मिलेंगे। वहीं आपके साहस और बल के कारण शत्रु भयभीत महसूस करेंगे। प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छी तैयारी के कारण आप सफल रहेंगे। कार्य क्षेत्र में आप अच्छा प्रदर्शन करेंगे और सीनियर्स भी आपके काम से ख़ुश रहेंगे। गोचर के दौरान आपको स्वास्थ्य लाभ मिलेगा। सरकार की किसी योजना से आप लाभान्वित हो सकते हैं। निजी जीवन में भी ख़ुशियाँ बनी रहेंगी।*वृषभ**सूर्य आपकी राशि से पंचम भाव* में गोचर करेगा। इस दौरान आप असमंजस की स्थिति में रह सकते हैं और बड़े निर्णय लेने में आपको परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। कार्य क्षेत्र में सीनियर्स के साथ आपके रिश्ते बिगड़ सकते हैं, कोशिश करें कि सीनियर्स के साथ आपके रिश्ते मधुर रहें। समाज में भी कुछ लोगों से आपका विवाद संभव है। बच्चों की सेहत का पूरा ध्यान रखें। जीवनसाथी को गोचर के अनुकूल परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। करियर में उन्हें ज़बरदस्त सफलता मिलने के योग हैं। यात्राओं का परिणाम आपके लिए प्रतिकूल रहेगा। वैसे कुल मिलाकर गोचर आपके लिए अच्छा है।*मिथुन**सूर्य आपकी राशि से चतुर्थ भाव* में गोचर करेगा। इस दौरान आपको मानसिक तनाव तथा स्वास्थ्य में कमज़ोरी रह सकती है। मानसिक तनाव को दूर करने के लिए मनोरंजन का सहारा लिया जा सकता है। माता जी के स्वास्थ्य में भी कमी देखी जा सकती है इसलिए उनकी सेहत की देखभाल ज़रुरी है। घर में परिजनों के साथ किसी बात को लेकर आपका मनमुटाव हो सकता है इसलिए ऐसे मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान न दें जिससे घर की शांति भंग हो। यदि ज़्यादा ज़रुरी न हो तो यात्रा को टाला जा सकता है। वहीं वैवाहिक जीवन में भी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जीवनसाथी को कार्य क्षेत्र में गोचर का लाभ मिलेगा।*कर्क**सूर्य आपकी राशि से तृतीय भाव* में गोचर करेगा। इस दौरान स्वास्थ्य की दृष्टि से गोचर आपको सकारात्मक परिणाम देने वाला है। भौतिक सुख सुविधाओं का आप आनंद लेंगे। अपने लक्ष्य के प्रति आपकी इच्छा शक्ति में वृद्धि होगी। कार्यक्षेत्र में आप सराहनीय कार्य करेंगे जिससे सीनियर्स भी आपके काम से ख़ुश रहेंगे। उच्च अधिकारियों से आपके रिश्ते बनेंगे। समाज में भी प्रतिष्ठित लोगों के साथ आपका उठना-बैठना होगा। छोटी दूरी की यात्राएं आपके लिए लाभकारी साबित हो सकती हैं। इसके अलावा दोस्तों और भाई-बहनों की मदद से आपको आर्थिक लाभ मिल सकता है। विरोधियों पर आपका भय बना रहेगा। समाज में भी आपका मान-सम्मान बढ़ेगा। कार्यक्षेत्र में आपकी पदोन्नति की प्रबल संभावना है। लोगों के प्रति आपका व्यवहार मधुर और सौम्य रहेगा।*सिंह**सूर्य आपकी राशि से द्वितीय भाव* में गोचर करेगा। इस दौरान आपको थोड़ा संभलकर चलना होगा। कठोर शब्द बोलकर किसी की भावना को आहत न करें, बल्कि सभी से प्रेम से बातचीत करें। गोचर की अवधि में आपको शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। बुखार, सिरदर्द और आँखों में संक्रमण जैसी समस्या से गुज़रना पड़ सकता है। परिवार में किसी बात को लेकर झगड़ा भी हो सकता है। घर में परिजनों के बीच सामंजस्य बिठाने का प्रयास करें। गोचर के दौरान जीवनसाथी का स्वास्थ्य कुछ कमज़ोर रह सकता है अतः उनकी सेहत का ख़्याल रखें। धन के लेन-देन में सावधानी बरतें। दोस्तों और रिश्तेदारों से किसी बात पर आपका मनमुटाव हो सकता है, हालाँकि ऐसे मामलों को ज़्यादा तूल न दें। निजी जीवन से जुड़ी समस्याएँ आपके लिए मानसिक तनाव का कारण बन सकती हैं। तनाव से बचने के लिए मनोरंजन का सहारा लिया जा सकता है।*कन्या**सूर्य आपकी राशि में गोचर करेगा और यह आपके प्रथम भाव* में स्थित होगा। इस दौरान धन के लेन-देन में सावधानी बरतें और ऐसा कोई काम न करें जिससे समाज में आपकी मानहानि होती हो। गोचर की अवधि में बुखार, सिरदर्द, अपच और आँख में किसी प्रकार का संक्रमण आदि हो सकता है इसलिए अपनी सेहत का ख़्याल रखें। काम के वक़्त आपको आलस आ सकता है और इसी वजह से आपके काम लंबित रह सकते हैं। वहीं काम के चलते आपको घर से दूर जाना पड़ सकता है। तनाव और अहंकार आपके जीवन को प्रभावित कर सकते हैं इसलिए हमेशा इनसे बचें। विदेशr संबंधों से आपको लाभ प्राप्त हो सकता है।*तुला**सूर्य आपकी राशि से द्वादश भाव* में गोचर करेगा। इस दौरान आप विदेश यात्रा पर जा सकते हैं। काम के चलते घर से दूर भी रहना पड़ सकता है। आप किसी हिल स्टेशन पर जाने की योजना बना सकते हैं। इस बीच अपनी सेहत का भी पूरा ध्यान रखें। गोचर की अवधि में आपका ख़र्चा थोड़ा बढ़ सकता है। अनुचित कार्यों को न करें वरना आपकी मानहानि संभव है। अपने विरोधियों से भी सावधान रहें। दोस्तों से किसी बात को लेकर मनमुटाव हो सकता है परंतु आप बात को ज़्यादा न बढ़ाएँ।*वृश्चिक**सूर्य आपकी राशि से एकादश भाव* में संचरण करेगा। सूर्य की यह स्थिति आपके लिए सकारात्मक रहेगी। विभिन्न स्रोतों से आपको लाभ मिलने के योग हैं। इस दौरान आपकी आय में वृद्धि होने की संभावना है और शत्रुओं पर आप विजय प्राप्त करेंगे। दान-धर्म के कार्यों में आपकी रुचि बढ़ेगी। कार्यक्षेत्र में वरिष्ठ कर्मियों का सहयोग और उनका मार्गदर्शन आपको प्राप्त होगा। इसके अलावा सूर्य के इस गोचर के दौरान कोई बड़ी उपलब्धि हासिल हो सकती है। पिता के आशीर्वाद और उनकी प्रेरणा से आप जीवन की राह पर आगे बढ़ेंगे।*धनु**सूर्य आपकी राशि से दशम भाव* में स्थित होगा। इस दौरान कार्य क्षेत्र में आपको सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं। जैसे- नौकरी में आपकी पदोन्नति और आय में वृद्धि हो सकती है। सरकार की ओर से भी लाभ मिलने के शुभ संकेत हैं। आर्थिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से गोचर आपके लिए शुभ होने के संकेत दे रहा है। समाज में प्रभावी व्यक्तियों से आपके संबंध बनेंगे और समय आने पर उनके द्वारा आपको लाभ मिल सकता है। अपने कार्य में आपको सफलता मिलेगी। वहीं सोसायटी में आपका मान-सम्मान भी बढ़ेगा।*मकर**सूर्य आपकी राशि से नवम भाव* में गोचर करेगा। इस अवधि में आपको उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है। अनैतिक और ग़ैरक़ानूनी कामों से दूर रहें वरना समाज में आपका मान-सम्मान गिर सकता है। पैसों की लेन-देन में सावधानी बरतें, वरना आपको धन की हानि हो सकती है। पिताजी के साथ किसी बात को लेकर मनमुटाव हो सकता है। आपकी सेहत कुछ कमज़ोर रह सकती है इसलिए अपनी सेहत पर पूरी तरह से ध्यान दें और मानसिक तनाव को अपने ऊपर हावी न होने दें। किसी मुद्दे पर वरिष्ठ जनों से वैचारिक मतभेद होने की संभावना है। कार्य क्षेत्र में सफलता पाने के लिए आपको संघर्ष करना पड़ सकता है।*कुंभ**सूर्य आपकी राशि से अष्टम भाव* में गोचर करेगा। इस दौरान किसी कारण आपको विवाद का सामना करना पड़ सकता है इसलिए ऐसा कोई भी काम न करें जिससे विवाद की स्थिति पैदा हो। आपके पिछले कर्मों का फल आपको इस गोचर के दौरान मिलने वाला है। शत्रुओं से आपका सामना हो सकता है। यदि बल और बुद्धि दोनों से दुश्मन का सामना करते हैं तो आपको सफलता मिलने की संभावना है। अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें, अन्यथा किसी रोग का सामना करना पड़ सकता है। ग़ैरक़ानूनी काम से दूर रहें। इस अवधि में जीवनसाथी को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी से गुज़रना पड़ सकता है। अप्रत्याशित ख़र्चे भी आपके लिए समस्या का कारण बन सकता है इसलिए धन का ख़र्च सोच समझकर करें और बचत पर ज़्यादा ध्यान दें।*मीन**सूर्य आपकी राशि से सप्तम भाव* में जाएगा। इस दौरान जीवनसाथी से मतभेद होने के संकेत हैं। अहंकार आपके वैवाहिक रिश्ते में खटास पैदा कर सकता है, इसलिए इसका त्याग करें। इसके अलावा गोचर के दौरान जीवनसाथी और बच्चों की सेहत कुछ कमज़ोर रह सकती है अतः उनकी सेहत पर भी ध्यान दें। व्यापार के लिए परिस्थितियाँ आपके लिए अनुकूल नहीं है। बिज़नेस पार्टनर के साथ किसी तरह का विवाद हो सकता है। यदि आप नौकरी कर रहे हैं तो आपको कोई शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है। यात्रा के दौरान आपको अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। अपच, पेटदर्द, सिरदर्द एवं मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ आपको घेर सकती हैं, लिहाज़ा पहले से सेहत को लेकर सतर्क रहें।*जय श्री महाकाल*[18/09 1:42 pm] Chetan Joshi: ज्योतिष में गण्डमूल / मूल नक्षत्रभारतीय ज्योतिष शास्त्र में २७ नक्षत्रों में ६ नक्षत्र गंड मूल नक्षत्रों की श्रेणी में माने गये हैं-चंद्र मण्डल से एक लाख योजन ऊपर नक्षत्र मण्डल है।अश्वनी, -श्लेषा, -मघा-, ज्येष्ठा, -मूल और रेवती।उपरोक्त नक्षत्रों में उत्पन्न जातक –जातिका गंड मूलक कहलाते हैं, इन नक्षत्रों में उत्पन्न जातक स्वयं व् कुटुम्बी जनों के लिये अशुभ माने गये हैं।''जातो न जीवतिनरो मातुरपथ्यो भवेत्स्वकुलहन्ता ''लेकिन पहले यह जानना परम आवश्यक है कि गंड मूल किसे कहते हैंगंड कहते हैं जहाँ एक राशि और नक्षत्र समाप्त हो रहे हो उसे गंड कहते हैं।मूल कहते हैं –जहाँ दूसरी राशि से नक्षत्र का आरम्भ हो उसे मूल कहते हैं।राशि चक्र और नक्षत्र चक्र दोनों में इन ६ नक्षत्रो पर संधि होती है और संधि समय को जितना लाभकारी माना गया है उतना ही हानिकारक भी है, संधि क्षेत्र हमेशा नाजुक और अशुभ होते हैं इसी प्रकार गंड मूल नक्षत्र भी संधि क्षेत्र में आने से दुष्परिणाम देने वाले होते हैं और राशि चक्र में यह स्थिति तीन बार आती है।अब यह समझने का प्रयास करे कि कैसे इन ६ नक्षत्रो को गंड मूल कहा गया है।१ - आश्लेषा नक्षत्र और कर्क राशि का एक साथ समाप्त होना और यही से मघा नक्षत्र और सिंह राशि का प्रारम्भ।२ - ज्येष्ठा नक्षत्र और वृश्चिक राशि का समापन और यही से मूल नक्षत्र और धनु राशि का प्रारम्भ।३- रेवती नक्षत्र और मीन राशि का समापन और यही से अश्वनी नक्षत्र और मेष राशि का प्रारम्भ।यहाँ तीन गंड नक्षत्र हैं आश्लेषा , ज्येष्ठा , रेवती।और तीन मूल नक्षत्र हैं मघा, मूल और अश्वनी।जिस प्रकार एक ऋतु का जब समापन होता है और दूसरी ऋतु का आगमन होता है तो उन दोनों ऋतुओं का मोड स्वास्थ्य के लिये उत्तम् नहीं माना गया है इसी प्रकार नक्षत्रों का स्थान परिवर्तन जीवन और स्वास्थ्य के लिये हानिकारक माना गया है।गण्डमूल / मूल नक्षत्र :इस श्रेणी में ६ नक्षत्र आते है !१. रेवती, २. अश्विनी, ३. आश्लेषा, ४. मघा, ५. ज्येष्ठा, ६. मूल यह ६ नक्षत्रमूल संज्ञक / गण्डमूल संज्ञक नक्षत्र होते है !रेवती, आश्लेषा, ज्येष्ठा का स्वामी बुध है ! अश्विनी, मघा, मूल का स्वामी केतु है !इन्हें २ श्रेणी में विभाजित किया गया है -बड़े मूल व छोटे मूल। मूल, ज्येष्ठा व आश्लेषा बड़े मूल कहलाते है, अश्वनी, रेवती व मघा छोटे मूल कहलाते है। बड़े मूलो में जन्मे बच्चे के लिए २७ दिन के बाद जब चन्द्रमा उसी नक्षत्र में जाये तो शांति करवानी चाहिए ऐसा पराशर का मत भी है, तब तक बच्चे के पिता को बच्चे का मुह नहीं देखना चाहिए ! जबकि छोटे मूलो में जन्मे बच्चे की मूल शांति उस नक्षत्र स्वामी के दूसरे नक्षत्र में करायी जा सकती है अर्थात १०वे या १९वे दिन में !यदि जातक के जन्म के समय चंद्रमा इन नक्षत्रों में स्थित हो तो मूल दोष होता है ; इसकी शांति नितांत आवश्यक होती है !जन्म समय में यदि यह नक्षत्र पड़े तो दोष होता है !दोष मानने का कारण यह है की नक्षत्र चक्र और राशी चक्र दोनों में इन नक्षत्रों पर संधि होती है ( चित्र में यह बात स्पष्टता से देखि जा सकती है ) !और संधि का समय हमेशा से विशेष होता है ! उदाहरण के लिए रात्रि से जब दिन का प्रारम्भ होता है तो उस समय को हम ब्रम्हमुहूर्त कहते है। और ठीक इसी तरह जब दिन से रात्रि होती है तो उस समय को हम गदा बेला / गोधूलीकहते है ! इन समयों पर भगवान का ध्यान करने के लिए कहा जाता है -जिसका सीधा सा अर्थ है की इन समय पर सावधानी अपेक्षित होती है !संधि का स्थान जितना लाभप्रद होता है उतना ही हानि कारक भी होता है !संधि का समय अधिकतर शुभ कार्यों के लिए अशुभ ही माना जाता है !गण्डमूल में जन्म का फल :गण्डमूल के विभिन्न चरणों में दोष विभिन्न लोगो को लगता है, साथ ही इसका फल हमेशा बुरा हीहो ऐसा नहीं है !अश्विनी नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :प्रथम पद में - पिता के लिए कष्टकारीद्वितीय पद में - आराम तथा सुख केलिए उत्तमतृतीय पद में - उच्च पदचतुर्थ पद में - राज सम्मानआश्लेषा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :प्रथम पद में - यदि शांति करायीं जाये तो शुभद्वितीय पद में - संपत्ति के लिए अशुभतृतीय पद में - माता को हानिचतुर्थ पद में - पिता को हानिमघा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :प्रथम पद में - माता को हानिद्वितीय पद में - पिता को हानितृतीय पद में - उत्तमचतुर्थ पद में - संपत्ति व शिक्षा के लिए उत्तमज्येष्ठा नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :प्रथम पद में - बड़े भाई के लिए अशुभद्वितीय पद में - छोटे भाई के लिए अशुभतृतीय पद में - माता के लिए अशुभचतुर्थ पद में - स्वयं के लिए अशुभमूल नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :प्रथम पद में - पिता के जीवन में परिवर्तनद्वितीय पद में - माता के लिए अशुभतृतीय पद में - संपत्ति की हानिचतुर्थ पद में - शांति कराई जाये तो शुभ फलरेवती नक्षत्र में चन्द्रमा का फल :प्रथम पद में - राज सम्मानद्वितीय पद में - मंत्री पदतृतीय पद में - धन सुखचतुर्थ पद में - स्वयं को कष्टअभुक्तमूलज्येष्ठा की अंतिम एक घडी तथा मूल की प्रथम एक घटी अत्यंत हानिकर हैंइन्हें ही अभुक्तमूल कहा जाता है, शास्त्रों के अनुसार पिता को बच्चे से ८ वर्षतक दूर रहना चाहिए ! यदि यह संभव ना हो तो कम से कम ६ माह तो अलगही रहना चाहिए ! मूल शांति के बाद ही बच्चे से मिलना चाहिए !अभुक्तमूल पिता के लिए अत्यंत हानिकारक होता है !यह तो था नक्षत्र गंडांत इसी आधार पर लग्न और तिथि गंडांत भी होता है।लग्न गंडांत :-मीन-मेष, कर्क-सिंह, वृश्चिक-धनु लग्न की आधी-२ प्रारंभ व अंत कीघडी कुल २४ मिनट लग्न गंडांत होता है !तिथि गंडांत :- ५, १०, १५ तिथियों के अंत व ६, ११, १ तिथियों के प्रारम्भ की २-२ घड़ियाँ तिथि गंडांत है रहता है !जन्म समय में यदि तीनों गंडांत एक साथ पड़ रहे है तो यह महा-अशुभ होता है।नक्षत्र गंडांत अधिक अशुभ, लग्न गंडांत मध्यम अशुभ व तिथि गंडांत सामान्य अशुभ होता है, जितने ज्यादा गंडांत दोष लगेंगे किसी कुंडली में उतना ही अधिक अशुभ फल कारक होंगे।गण्ड का परिहार :१. गर्ग के मतानुसाररविवार को अश्विनी में जन्म हो या सूर्यवार बुधवार को ज्येष्ठ, रेवती, अनुराधा, हस्त, चित्रा, स्वाति हो तो नक्षत्र जन्म दोष कम होता है !२. बादरायण के मतानुसार गण्ड नक्षत्र में चन्द्रमा यदि लग्नेश से कोई सम्बन्ध, विशेषतया दृष्टि सम्बन्ध न बनाता हो तो इस दोष में कमी होती है !३. वशिष्ठ जी के अनुसार दिन में मूल का दूसरा चरण हो और रात में मूल का पहला चरण हो तो माता-पिता के लिए कष्ट होता है इसलिए शांति अवश्य कराये!४. ब्रम्हा जी का वाक्य है की चन्द्रमा यदि बलवान हो तो नक्षत्र गण्डांत व गुरु बलि हो तो लग्न गण्डांत का दोष काफी कम लगता है !५. वशिष्ठ के मतानुसार अभिजीत मुहूर्त में जन्म होने पर गण्डांतादी दोष प्रायः नष्ट हो जाते है ! लेकिन यह विचार सिर्फ विवाह लग्न में ही देखें, जन्म में नहीं !निम्नलिखित विशेष परिस्थितियों में गण्ड या गण्डांत का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है (लेकिन फिर भी शांति अनिवार्य है) !इन नक्षत्रों में जिनका जन्म हुआ हो तो उस नक्षत्र की शान्ति हेतु जप और हवन अवश्य कर लेनी चाहिए --१ अश्वनी के लिये ५००० मन्त्र जप।२ आश्लेषा के लिये १०००० मन्त्र जप।३ मघा के लिये १०००० मन्त्र जप।४ ज्येष्ठा के लिये ५००० मन्त्र जप।५ मूल के लिये ५००० मन्त्र जप।६ रेवती के लिये५००० मन्त्र जप।इन नक्षत्रों की शान्ति हेतु ग्रह, स्व इष्ट, कुल देवताओं का पूजन , रुद्राभिषेक तथा नक्षत्र तथा नक्षत्र के स्वामी का पूजन अर्चन करने के बाद दशांश हवन किसी सुयोग्य ब्राह्मण से अवश्य करवाए ।
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शारदीय नवरात्रि 2017 कलश स्थापना का मुर्हत:-21 सितम्बर 2017 गुरूवार को प्रात 6 बजे से 7 बजकर 30 मिनट तक शुभ का चौघड़िया है इसमें घट स्थापना कर सकते हैं क्यों कि कुछ साधक प्रातः काल घट स्थापना होने तक कुछ भी खाते पीते नहीं है उनको प्रात काल के इस महुर्त में घट स्थापना कर लेनी चाहिये। कुछ साधक अभिजीत मर्हंत में घट स्थापना करना चाहते हैं उनको दोपहर 12 बजे से 12 बजकर 24 मिनट के बीच में घट स्थापना करनी होगी क्यों कि इस दिन 12 बजे से लेकर 1 बजकर 30 मिनट तक लाभ का चौघड़िया है जो लोग दुकानों व व्यापारिक प्रतिष्ठानों में घट स्थापना करना चाहते हैं उनके लिये भी लाभ के चौघड़िया में घट स्थापना करना उतम है। यहा स्पष्ट रहे कि अभिजित महुर्त 11 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 24 मिनट तक है व लाभ का चौघड़िया 12 बजे से लेकर 1 बजकर 30 मिनट तक माना गया है इसलिये 12 बजे से 12 बजकर 24 मिनट का समय ऐसा है कि उसमें लाभ का चौघड़िया एवम अभिजित मर्हुत दोनो ही है। प्रतिपदा तिथि – घटस्थापना , श्री शैलपुत्री पूजा द्वितीया तिथि – श्री ब्रह्मचारिणी पूजातृतीय तिथि – श्री चंद्रघंटा पूजाचतुर्थी तिथि – श्री कुष्मांडा पूजापंचमी तिथि – श्री स्कन्दमाता पूजाषष्ठी तिथि – श्री कात्यायनि पूजासप्तमी तिथि – श्री कालरात्रि पूजाअष्टमी तिथि – श्री महागौरी पूजा , महा अष्टमी पूजा , सरस्वती पूजानवमी तिथि – चैत्र नवरात्रा – राम नवमी , शारदीय नवरात्रा – श्री सिद्धिदात्री पूजा , महानवमी पूजा , आयुध पूजानवरात्री में घट स्थापना का बहुत महत्त्व होता है। नवरात्री की शुरुआत घट स्थापना से की जाती है। शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित किया जाता है।घट स्थापना प्रतिपदा तिथि के पहले एक तिहाई हिस्से में कर लेनी चाहिए। इसे कलश स्थापना भी कहते है।कलश को सुख समृद्धि , ऐश्वर्य देने वाला तथा मंगलकारी माना जाता है। कलश के मुख में भगवान विष्णु , गले में रूद्र , मूल में ब्रह्मा तथा मध्यमें देवी शक्ति का निवास माना जाता है। नवरात्री के समय ब्रह्माण्ड में उपस्थित शक्तियों का घट में आह्वान करके उसे कार्यरत किया जाता है।इससे घर की सभी विपदा दायक तरंगें नष्ट हो जाती है तथा घर में सुख शांति तथा समृद्धि बनी रहती है। घट स्थापना की सामग्री – Ghat Sthapna Samagri — जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र। यह वेदी कहलाती है।— जौ बोने के लिए शुद्ध साफ़ की हुई मिटटी जिसमे कंकर आदि ना हो।— पात्र में बोने के लिए जौ ( गेहूं भी ले सकते है )— घट स्थापना के लिए मिट्टी का कलश ( सोने, चांदी या तांबे का कलश भी ले सकते है )— कलश में भरने के लिए शुद्ध जल— गंगाजल— रोली , मौली— इत्र— पूजा में काम आने वाली साबुत सुपारी— दूर्वा— कलश में रखने के लिए सिक्का ( किसी भी प्रकार का कुछ लोग चांदी या सोने का सिक्का भी रखते है )— पंचरत्न ( हीरा , नीलम , पन्ना , माणक और मोती )— पीपल , बरगद , जामुन , अशोक और आम के पत्ते ( सभी ना मिल पायें तो कोई भी दो प्रकार के पत्ते ले सकते है )— कलश ढकने के लिए ढक्कन ( मिट्टी का या तांबे का )— ढक्कन में रखने के लिए साबुत चावल— नारियल— लाल कपडा— फूल माला— फल तथा मिठाई— दीपक , धूप , अगरबत्ती घट स्थापना की विधि – Ghat Sthapna Vidhiसबसे पहले जौ बोने के लिए एक ऐसा पात्र लें जिसमे कलश रखने के बाद भी आस पास जगह रहे। यह पात्र मिट्टी की थाली जैसा कुछ होतो श्रेष्ठ होता है। इस पात्र में जौ उगाने के लिए मिट्टी की एक परत बिछा दें। मिट्टी शुद्ध होनी चाहिए । पात्र के बीच में कलश रखने की जगहछोड़कर बीज डाल दें। फिर एक परत मिटटी की बिछा दें। एक बार फिर जौ डालें। फिर से मिट्टी की परत बिछाएं। अब इस पर जल काछिड़काव करें।कलश तैयार करें। कलश पर स्वस्तिक बनायें। कलश के गले में मौली बांधें। अब कलश को थोड़े गंगा जल और शुद्ध जल से पूरा भर दें।कलश में साबुत सुपारी , फूल और दूर्वा डालें। कलश में इत्र , पंचरत्न तथा सिक्का डालें। अब कलश में पांचों प्रकार के पत्ते डालें। कुछ पत्तेथोड़े बाहर दिखाई दें इस प्रकार लगाएँ। चारों तरफ पत्ते लगाकर ढ़क्कन लगा दें। इस ढ़क्कन में अक्षत यानि साबुत चावल भर दें।नारियल तैयार करें। नारियल को लाल कपड़े में लपेट कर मौली बांध दें। इस नारियल को कलश पर रखें। नारियल का मुँह आपकी तरफहोना चाहिए। यदि नारियल का मुँह ऊपर की तरफ हो तो उसे रोग बढ़ाने वाला माना जाता है। नीचे की तरफ हो तो शत्रु बढ़ाने वाला मानतेहै , पूर्व की और हो तो धन को नष्ट करने वाला मानते है। नारियल का मुंह वह होता है जहाँ से वह पेड़ से जुड़ा होता है ।अब यह कलश जौ उगाने के लिए तैयार किये गये पात्र के बीच में रख दें। अब देवी देवताओं का आह्वान करते हुए प्रार्थना करें कि” हे समस्त देवी देवता आप सभी नौ दिन के लिए कृपया कलश में विराजमान हों “।आह्वान करने के बाद ये मानते हुए कि सभी देवता गण कलश में विराजमान है। कलश की पूजा करें।कलश को टीका करें , अक्षत चढ़ाएं , फूल माला अर्पित करें , इत्र अर्पित करें , नैवेद्य यानि फल मिठाई आदि अर्पित करें।घट स्थापना या कलश स्थापना के बाद देवी माँ की चौकी स्थापित करें।देवी माँ की चौकी की स्थापना और पूजा विधि – Choki Sthapna Vidhiलकड़ी की एक चौकी को गंगाजल और शुद्ध जल से धोकर पवित्र करें।साफ कपड़े से पोंछ कर उस पर लाल कपड़ा बिछा दें।इसे कलश के दायी तरफ रखें।चौकी पर माँ दुर्गा की मूर्ति अथवा फ्रेम युक्त फोटो रखें।माँ को चुनरी ओढ़ाएँ।धूप , दीपक आदि जलाएँ।नौ दिन तक जलने वाली माता की अखंड ज्योत जलाएँ।देवी मां को तिलक लगाए ।माँ दुर्गा को वस्त्र, चंदन, सुहाग के सामान यानि हलदी, कुमकुम, सिंदूर, अष्टगंध आदि अर्पित करें ।काजल लगाएँ ।मंगलसूत्र, हरी चूडियां , फूल माला , इत्र , फल , मिठाई आदि अर्पित करें।श्रद्धानुसार दुर्गा सप्तशती के पाठ , देवी माँ के स्रोत , सहस्रनाम आदि का पाठ करें।देवी माँ की आरती करें।पूजन के उपरांत वेदी पर बोए अनाज पर जल छिड़कें।रोजाना देवी माँ का पूजन करें तथा जौ वाले पात्र में जल का हल्का छिड़काव करें। जल बहुत अधिक या कम ना छिड़के । जल इतना हो किजौ अंकुरित हो सके। ये अंकुरित जौ शुभ माने जाते है। । यदि इनमे से किसी अंकुर का रंग सफ़ेद हो तो उसे बहुत अच्छा माना जाता है।यह दुर्लभ होता है।नवरात्री के व्रत उपवास – Navratri Vrat Upvas नवरात्री में लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार देवी माँ की भक्ति करते है। कुछ लोग पलंग के ऊपर नहीं सोते। कुछ लोग शेव नहीं करते , कुछ नाखुन नहीं काटते। इस समय नौ दिन तक व्रत , उपवास रखने का बहुत महत्त्व है। अपनी श्रद्धानुसार एक समय भोजन और एक समयफलाहार करके या दोनों समय फलाहार करके उपवास किया जाता है। इससे सिर्फ आध्यात्मिक बल ही प्राप्त नहीं होता , पाचन तंत्र भीमजबूत होता है तथा मेटाबोलिज्म में जबरदस्त सुधार आता है।व्रत के समय अंडा , मांस , शराब , प्याज , लहसुन , मसूर दाल , हींग , राई , मेथी दाना आदि वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए। इसकेअलावा सादा नमक के बजाय सेंधा नमक काम में लेना चाहिए।नवरात्री में कन्या पूजन – Navratri Kanya Poojanमहाअष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन किया जाता है। कुछ लोग अष्टमी के दिन और कुछ नवमी के दिन कन्या पूजन करते है। परिवारकी रीति के अनुसार किसी भी दिन कन्या पूजन किया जा सकता है। तीन साल से नौ साल तक आयु की कन्याओं को तथा साथ ही एकलांगुरिया (छोटा लड़का ) को खीर , पूरी , हलवा , चने की सब्जी आदि खिलाये जाते है। कन्याओं को तिलक करके , हाथ में मौली बांधकर, गिफ्ट दक्षिणा आदि देकर आशीर्वाद लिया जाता है , फिर उन्हें विदा किया जाता है।महानवमी और विसर्जन – Maha Navmi Visarjanमहानवमी के दिन माँ का विशेष पूजन करके पुन: पधारने का आवाहन कर, स्वस्थान विदा होने के लिए प्रार्थना की जाती है। कलश के जलका छिड़काव परिवार के सदस्यों पर और पूरे घर में किया जाता है। ताकि घर का प्रत्येक स्थान पवित्र हो जाये। अनाज के कुछ अंकुर माँ केपूजन के समय चढ़ाये जाते है। कुछ अंकुर दैनिक पूजा स्थल पर रखे जाते है , शेष अंकुरों को बहते पानी में प्रवाहित कर दिया जाता है। कुछलोग इन अंकुर को शमीपूजन के समय शमी वृक्ष को अर्पित करते हैं और लौटते समय इनमें से कुछ अंकुर केश में धारण करते हैं ।
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spiritual cultivationBy gathering good and bad powers dispersed in the sky and surrounding environment, the knowledge of influencing a person with that energized power is called vashikaran, it is not a bad thing, but it is seen in a bad way, because Its name is different from the system, it is not bad to explain your point to someone or to do any good work with you; The solution is possible by seclusion and asana, such as love, love marriage, life problems, for example difficult problems, planclose, husband-wife, relieving enemy enemy, husband wife's relationship, court case, love marriage, Especially for the failure of children as a problem, physical problems, problem in family, interruption in marriage, debt, upper, vandalism, black magic, and failure in the most important love are done! So far, thousands of people have taken advantage of Vashikaran, what is vachikshan, Vashikaran is the supernatural power of any man or woman to subdue the mind and body, by vashikaran, you have completely surrendered any man or woman Whether it is with you or away, Vashikaran means to subdue someone, though vachikaran is an unusual science but it is a science. Getting this knowledge is difficult but not impossible. Most people think that how to be abducted ...?So the most important meditation for captivating is .... It is only the focus of focusing your mind on one place, one point, one place, any object that is to be subdued. Carefully develop your energy in your body. All know about Lord Shiva, they remain meditated for ages and ages. In the ancient times, all the Rishmuni used to spend their time in meditation, which resulted in them being ruddy. And as much as you can meditate or meditate, you will find that there is a strong presence on your face, a joy, a sweet smile will always appear blurred on your face, your personality will disappear, your walking and confidence will be seen. . When this starts to happen, when you start speaking, everyone will see you listening, your boss, your life partner, your friends will easily agree to your heart before your sweet smile and the brightness of the face. That's the easy and easy way of embezzlement.Today everybody wants that he has the power of great power and he looks most different in the crowd, then we are giving some ideas for the same magical attraction and make your place in society.VasectomyTake a hypnosis prism and keep it on the height of your eyes at just 3 feet, and sit in the dark room and place a red light bulb of a Zero watt on the back or burn a lamp, after which it is chaotic, the chanting of important Brahmsmi chanting continuously for 15 minutes By doing this continuously, only 15 to 30 days you will have hypnosis power in your eyes.. Women try to see a red dot between your eyes on your head. If after some time the bidi starts appearing to yourself, then understand that hypnosis power has awakened in you.The easiest way to emancipationHere is the simple, experienced and accurate way of getting vestilation i.e. to make or adapt its effect. This is the perfect and effective way to do this: Make a picture of the person you want to subdue, which is almost the size of the book and a clear image. Keep that picture at such a height that when you sit in Padmasana, the image of that picture remains in front of your eyes. After doing pranayama for 5 minutes, concentrate on that picture. Go into full deep meditation and talk about your mind repeatedly with the personality of that picture. After some time, raise your deep belief in your mind that your efforts have started to take effect. This experiment is to be before sunrise.This whole experiment is successful every time on a pilgrim basis. But its success depends entirely on the individual's concentration and unwavering belief. Only 15 to 30 days the effect of this experiment seems to be obvious.Note- Before doing any sadhana, practice your energy only by matching your energy. For this, we can send photos of Khichi full size to us at our whatsup. Without meditation, there may be loss or profit in the practice of meditation.The above given procedure is not a complete method. You can contact us from Vashikaran Sadhana Specialist, you can contact us too.Ganga Bhairavi is a fire bath. Of course, you can not put the fire on your body, you can touch the ecosystem of your body in just one special way. There is a certain pattern in your atmosphere. If you touch the fire in those places, then suddenly you will feel shine and clarity. You can also get the power to make vows. Please do any research in the care of the specialist. . Guiding is necessary for fire bath never to be in your mind. You can also contact us. We Indians know it well. In our homes, our grandmother used to take our eyes, which is actually purification of the atmosphere. Many times people have seen that when the children are sick, they get cured as soon as they take a small amount of fire bath. It affects your system.
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तीन साल में 66 वर्ष का युवा 8000 किमी के हाइवे बनवाकर50 लाख मकान बनवाकरकरोडो शौचालय बनवाकर6 नए एम्स बनवाकर3 नयी पनडुब्बियां बनवाकरतेजस विमान हिन्दुस्तान में बनवाकरधनुष तोप दिलाकरOrop देकरसर्जिकल स्ट्राइक करकेतीनो सेना को मजबूत बना कर65 देशों से व्यापारिक रिश्ते बनाकरचीन को पीछे छोड़करविकास दर 7.5के ऊपर ले जाकरमहगाई 5 से नीचे लाकरफसल बीमा देकर12 रु में 2 लाख का बीमा देकरनोटबंदी करके नक्सलियों पाकिस्तानियो को दुखी करकेराफेल विमान का सौदा करकेसऊदी अरब में शेख से मंदिर बनवा केबुरहान वानी को ऊपर पहुचा केअलगाववादी कश्मीरियों को औकात में लाके। बस सब की गालियाँ खाता है। जो काम करता है, वो कभी ये नहीं कहता कि*काम बोलता है*क्योंकि *काम दिखता है।**"मोदी जी"* आप को "शर्म" आनी चाहिए कि आपने "अपने परिवार" और अपने भाइयों को अपनी "कैबिनेट" में या "राजनीति" में लाने का ज़रा भी "प्रयास नहीं किया" आप को इस बात के लिए भी "शर्म" आनी चाहिए कि आप के "भाई" साधारण नागरिक का जीवन जी रहे हैं और आप की "भतीजी गरीबी" में "मर गई" !! *"मोदी जी"* आप को "शासन चलाने" की कला *"मुलायम सिंह"* से "सीखनी" चाहिए जहाँ "सैफई" के उनके परिवार के करीब "36 सदस्य" आज *"उत्तर प्रदेश"* में "ब्लाक प्रमुख" के पदों पर सुशोभित हैं वही *"मुलायम सिंह"* जिन्हें "दो वक़्त की रोटी" भी मुश्किल से नसीब होती थी आज *"करोडपति"* ही नहीं *"अरबपति"* हैं !! "30 वर्ष" पहले *"बहन मायावती"* का "पूरा परिवार" दिल्ली में "एक कमरे" में रहा करता था, आज *"मायावती के भाई"* का "बंगला" सुन्दरता में *"ताज महल"* को भी "मात" दे रहा है !! *"देवगोडा"* अपने "पोते" को *"100 करोड़" की "बहु भाषाई फिल्म"* में बतौर *"सुपर हीरो"* उतार रहे हैं, "कर्नाटक" के "हासन जिले" में "आधी से ज्यादा" खेती की ज़मीन *"देवगोडा परिवार"* की है !! *"कर्नाटक" के मुख्यमंत्री "सिद्धारमैया"* का "बेटा" जो "सरकारी अस्पताल" में *"मुख्य चिकित्सक"* है और *"छोटा पुत्र" जिसका अभी हाल में "निधन" हुआ है, उसका "ब्रुसेल्स" में बड़ा कारोबार है, और उसके बच्चे "जर्मनी" में "पढ़" रहे हैं* *"सोनिया का दामाद"* जो कि "मुरादाबाद" में "पुराने पीतल" के आइटम "बेचा" करता था, आज *"पांच सितारा होटल" का "मालिक"* है, उसका *"शिमला" में एक "महल" है और "लक्ज़री कारों" का "मालिक" है* !!जबकि *"आप की माँ" आज भी "ऑटोरिक्शा" में चलती है और आप के "भाई ब्लू कालर जॉब" यानि मेंहनत "मजदूरी" कर रहे हैं और आप की एक "भतीजी" शिक्षामित्र है (आप उसे टीचर की नौकरी भी नहीं दिलवा पाए ) जो कि दूसरो के "कपडे सिलती" है तथा "ट्यूशन पढ़ा" कर अपनी "जीविका" चला रही है* !! *"मोदी जी"* देश बहुत "शर्मिंदा" है कि आप "प्रधानमंत्री" होते हुए भी अपने "भाइयों" को "MLA या MP" का "टिकट नहीं दिलवा पाए" आप "चाहते" तो अपनी "बहनों" को "राज्य सभा" में "MP" बनवा सकते थे और आप के *"जीजा", * "जिला स्तर" के "चुनाव लड़" कर "ब्लाक प्रमुख" तो बन ही सकते थे, *आप "सीखने" में बहुत "सुस्त" हैं* "15 वर्ष" तक "गुजरात" में और *"प्रधानमंत्री"* का "आधा कार्यकाल", *"दिल्ली"* में बिताने के बाद भी आप *"लालू, मुलायम, सोनिया गाँधी, बहन मायावती"* से कुछ भी "नहीं सीखे" और अपनी "रसोई का खर्च" भी "खुद वहन" कर रहे हैं !! ------------------------------------- उपरोक्त बातो से हमे *"शर्मिंदा"* तो होना पड़ा लेकिन उतना ही *"गर्व"* भी है कि हमने अपने जीवन का *"पहला वोट" , "2014" में एक बहुत ही "ईमानदार और देशभक्त इंसान" को वोट दिया "हम सभी गर्व" करते है की हमे अपने जीवन में आप जैसे देशभक्त का मार्गदर्शन मिला सच में "ईमानदारी और कर्तब्यनिष्ठा" की "पराकाष्ठा" है* ------------------------------------मेरे भाइयों ! इस मैसेज को ब्लास्ट कर ही दीजिए ! देशहित के लिए जरूरी है !! -------------------------------------
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रक्षा बंधन विशेषकई दिनों से एक मैसेज व्हाटस ऐप पर प्रचारित किया जा रहा है ।कि राखी के दिन ग्रहण होने से राखी दिन में 11-15 से1-30 के बीच मैं ही बांधे।जो सरासर गलत है।मैंने पुर्व में भी कहा था । आज उसका प्रमाण दे रहा हूँ । निर्णय सिंधु ' के परिच्छेद २ पेज नंबर 180 में लिखा हुआ* है कि " इदं रक्षाबंधनं नियतकालत्वात भद्रावर्ज्य ग्रहणदिनेपि कार्यं होलिकावत् । ग्रहणसंक्रांत्यादौ रक्षानिषेधाभावात् ।"इसी निर्णय सिंधु के पेज 180 पंक्ति नं 11 में पढ़े जिसमे लिखा हुआ है कि रक्षाबंधन नियत काल मे होने से भद्रा को छोड़ कर ग्रहण के दिन भी होली के समान ही करना चाहिए । आगे पढ़ें उसमें लिखा हुआ है कि ग्रहण का सूतक अनियतकाल के कर्मों में लगता है जबकि राखी श्रावण सुदी पूर्णिमा को ही मनाया जाता है । रक्षा बंधन को ना पहले दिन ना दूसरे दिन मनाया जाता है । उसी दिन मनाया जाता है इसलिए नियत कर्म होने के कारण इसको ग्रहण का दोष नहीं लगता है । सभी सनातन प्रेमियों से निवेदन है कि आप रक्षाबंधन 7 अगस्त को 11. 08 के बाद पूरे दिन आराम से कर सकते है । अफवाहों से दूर रहे जिनको पूरा ज्ञान नहीं है वे लोग विरोध ही करेंगे । शिव शक्ति ज्योतिष इंदौर
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☀ *घर में दरिद्रता आने के कुछ कारण...* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~*1:-* रसोई घर के पास में पेशाब करना ।*2:-* टूटी हुई कंघी से कंघा करना ।*3:-* टूटा हुआ सामान उपयोग करना।*4:-* घर में कूड़ा-करकट रखना।*5:-*रिश्तेदारों से बदसुलूकी करना।*6:-* बांए पैर से पैंट पहनना।*7:-* सांध्या वेला मे सोना।*8:-* मेहमान आने पर नाखुश होना।*9:-* आमदनी से ज्यादा खर्च करना।*10:-* दाँत से रोटी काट कर खाना।*11:-* चालीस दिन से ज्यादा बाल रखना*12:-*दाँत से नाखून काटना।*13:-*औरतों का खड़े-खड़े बाल बाँधना।*14:-*फटे हुए कपड़े पहनना ।*15:-*सुबह सूरज निकलने के बाद तक सोते रहना।*16:-*पेड़ के नीचे पेशााब करना।*17:-*उल्टा सोना।*18:-*शमशान भूमि में हँसना ।*19:-*पीने का पानी रात में खुला रखना।*20:-*रात में मांगने वाले को कुछ ना देना ।*21:-*मन में बुरे ख्याल लाना।*22:-*पवित्रता के बगैर धर्मग्रंथ पढना।*23:-*शौच करते वक्त बातें करना।*24:-*हाथ धोए बगैर भोजन करना ।*25:-*अपनी औलाद को हरदम कोसना।*26:-*दरवाजे पर बैठना।*27:-*लहसुन प्याज के छीलके जलाना।*28:-*साधू फकीर को अपमानित करना, उनसे रोटी या फिर और कोई चीज खरीदना।*29:-*फूँक मार के दीपक बुझाना।*30:-*ईश्वर को धन्यवाद किए बगैर भोजन करना।*31:-*झूठी कसम खाना।*32:-*जूते चप्पल उल्टा देख कर उसको सीधा नहीं करना।*33:-*मकड़ी का जाला घर में रखना।*34:-*रात को झाड़ू लगाना।*35:-*अन्धेरे में भोजन करना ।*36:-*घड़े में मुँह लगाकर पानी पीना।*37:-*धर्मग्रंथ न पढ़ना।*38:-*नदी, तालाब में शौच साफ करना और उसमें पेशाब करना ।*39:-*गाय, बैल को लात मारना ।*40:-*माता-पिता का अपमान करना ।*41:-*किसी की गरीबी और लाचारी का मजाक उड़ाना ।*42:-*दाँत गंदे रखना और रोज स्नान न करना ।*43:-*बिना स्नान किये भोजन करना ।*44:-*पड़ोसियों का अपमान करना, गाली देना ।*45:-*मध्यरात्रि में भोजन करना ।*46:-*गंदे बिस्तर पर सोना ।*47:-*वासना और क्रोध से भरे रहना ।*48:-*दूसरे को अपने से हीन समझना । इत्यादि- ___________________________💥 *शास्त्रों में लिखा है- कि जो दूसरों का भला करता है, ईश्वर उसका भी भला करता है। मित्रों अच्छा व उपयोगी लगे तो अवश्य शेअर करें...👏*
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भाग्योदय करवाने वाले ग्रह **भाग्योदय कराने वाले कुछ ग्रह जन्मकुण्डली में महत्वपूर्ण होते हैं। ये प्रत्येक जन्मकुण्डली में अलग-अलग भी हो सकते हैं जैसे लग्नेश, पंचमेश, नवमेश, दशमेश, आत्मकारक, अमात्यकारक, नवांश कुण्डली के दशमेश, दशमांश कुण्डली के दशमेश, चतुर्थांश कुण्डली के नवमेश आदि। इनमें से यदि एक भी ग्रह शक्तिशाली हो तो भाग्योदय करा सकता है। ज्योतिष में सर्वाधिक कौशल का काम होता है "भाग्योदय कारक ग्रह" को पहचानना। उपरोक्त ग्रहों में से यदि एक भी अनुकूल हों तो तकदीर बना देते हैं।**सबसे शानदार नियम तो यही होगा कि पहले भाग्योदय कारक ग्रह को खोज लीजिए, यदि इस ग्रह का जन्मकुण्डली के सप्तमेश, नवांश कुण्डली के सप्तमेश या दाराकारक ग्रह के साथ युति-दृष्टि या परिवर्तन का संबंध हों तो ऐसे युवक-युवतियों का विवाह के बाद भाग्योदय होता है। विवाह होने के बाद ही जीवन को या कॅरियर को सही दिशा मिल पाती है। अनेक ऐसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जिनके वास्तविक कॅरियर या जीवन की शुरुआत ही विवाह के बाद हुई।**कुछ ऐसे भी मिलेंगे जिनका विवाह के बाद पतन हो गया इसलिए यह सार्वभौम रूप से नहीं कहा जा सकता कि हर किसी का विवाह के बाद भाग्योदय होगा। ज्योतिष विद्या इस विषय में ज्यादा सहायक सिद्ध होती है। अनुकूल जन्मकुण्डली वालों का विवाह सदैव उन्नतिकारक रहता है। कभी-कभी कुछ युवक-युवतियों की कुण्डलियाँ तो थोड़ी कमजोर होती हैं फिर भी उनके पारिवारिक संस्कार इतने श्रेष्ठ होते हैं कि दुर्योग अधिक प्रभावी नहीं हो पाते, इसलिए श्रेष्ठ कुल और परिवार के तथा सदाचार व उत्तम व्यवहार वाले, शिक्षित वर और कन्या, विवाह हेतु उपयुक्त होते हैं।**जिस कन्या की पत्रिका में प्रबल राजयोग हो और राजयोग कारक किसी भी ग्रह की दशा-अंतर्दशा 20 से 30 वर्ष की आयु में प्राप्त होती है तो ऐसी कन्या का विवाह जिस भी युवक से होगा, उसके भाग्य में चार चाँद लग जाएंगे अथवा यदि वह कन्या भी अपना कारोबार करती हो या नौकरी करती हो तो पति को मिलने वाले परिणाम आधे हो जायेंगे परंतु पति के जीवन में भी उन्नति तो आयेगी ही।**भाग्यशाली वर : जिस लड़के की कुण्डली में निम्न योग हों और उसकी कुण्डली जिस कन्या से मेल रखती हो तो विवाह उपरांत उस कन्या का भाग्य अवश्य उदय होता है -**1. जन्मकुण्डली में भाग्येश (नवमेश) केन्द्र, त्रिकोण या लाभ भाव में अपनी उच्च राशि में हों तो ऐसा युवक भाग्यशाली होता है।**2. नवमेश पंचम भाव में, पंचमेश नवम भाव में और दशमेश दशम में हों।**3. तृतीयेश व नवमेश की युति हो और उन पर बलवान शुभ ग्रह की दृष्टि हो।**4. नवमेश की चतुर्थेश से युति हो और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो।**5. नवमेश लग्न में, लग्नेश नवम में एवं दशमेश लाभ भाव में स्थित हों।**6. नवमेश या पंचमेश शुक्र हों और किसी शुभ ग्रह से दृष्ट हों।**7. नवमेश व दशमेश की युति केन्द्र में हो तथा नवम भाव में एक भी शुभ ग्रह हो तो लड़का भाग्यशाली होता है।**8. लग्नेश लाभ भाव में, लाभेश नवम भाव में और नवमेश लग्न में हों तो ऐसे जातक का पुन: पुन: भाग्योदय होता है।**भाग्यशाली कन्या : जिस कन्या की पत्रिका में निम्न योग हों वह सौभाग्यशाली होती है। कुण्डली मिलान होने पर जिस वर के साथ ऐसी कन्या का विवाह होता है उसकी किस्मत खुल जाती है।**1. जिस कन्या की पत्रिका में भाग्येश सिंहासनांश में हो तथा उस पर लग्नेश या दशमेश की दृष्टि हो तो कन्या सौभाग्यशालिनी होती है।**2. जिसकी कुण्डली में नवमेश शुभ ग्रह से युत या दृष्ट हो और नवम भाव में कोई भी शुभ ग्रह स्थित हो तो वह कन्या बहुत भाग्यशाली होती है।**3. जिस कन्या की पत्रिका में चंद्रमा, बुध और गुरु लग्न में हों, वह कन्या भाग्यशाली होती है।**4. जन्म लग्न में बुध-गुरु और शुक्र तीनों स्थित हों, वह कन्या बहुत यश प्राप्त करती है।**5. जिस कन्या की कुण्डली में लग्न, पंचम व नवम भाव पर शुभ ग्रहों का अधिक प्रभाव हो वह बहुत भाग्यशाली होतीहै।**6. भाग्यवान वर या कन्या से विवाह होने पर विवाह के बाद जीवन में बहुत उन्नति मिलती है।
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सप्तम का शनि नहीं देगा वैवाहिक सुखसप्तम भाव लग्न कुडंली में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, लग्न से सातवाँ भाव ही दाम्पत्य व विवाह के लिए कारक माना है। इस भाव एवं इस भाव के स्वामी के साथ ग्रहों की स्थिति व दृष्टि संबंध के अनुसार उस जातक पर शुभ-अशुभ प्रभाव पड़ता है।सप्तम भाव विवाह एवं जीवनसाथी का घर माना जाता है। इस भाव में शनि का होना विवाह और वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता है। इस भाव में शनि की स्थिति होने पर व्यक्ति की शादी सामान्य आयु से देरी से होती है। सप्तम भाव में शनि अगर नीच राशि में हो तो तब यह संभावना रहती है कि व्यक्ति काम पीड़ित होकर किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करता है जो उम्र में उससे अधिक बड़ा हो।शनि के साथ सूर्य की युति अगर सप्तम भाव में हो तो विवाह देर से होता है एवं कलह से घर अशांत रहता है। चन्द्रमा के साथ शनि की युति होने पर व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम नहीं रखता एवं किसी अन्य के प्रेम में गृह कलह को जन्म देता है।सप्तम शनि एवं उससे युति बनाने वाले ग्रह विवाह एवं गृहस्थी के लिए सुखकारक नहीं होते हैं। नवमांश कुडंली या जन्म कुडंली में जब शनि और चन्द्र की युति हो तो शादी 30 वर्ष की आयु के बाद ही करनी चाहिए क्योकि इससे पहले शादी की संभावना नहीं बनती है।जिनकी कुडंली में चन्द्रमा सप्तम भाव में होता है और शनि लग्न में उनके साथ भी यही स्थिति होती है एवं इनकी शादी असफल होने की भी संभावना प्रबल रहती है। कुडंली में लग्न स्थान से शनि द्वादश होता है और सूर्य द्वितीयेश होता है एवं लग्न कमजोर हो तो उनकी शादी बहुत विलंब से होती है अथवा ऐसी स्थिति बनती है कि ऐसे व्यक्ति शादी नहीं करते। शनि जिस वधु की कुडंली में सूर्य या चन्द्रमा से युत या दृष्ठ होकर लग्न या सप्तम में होते हैं उनकी शादी में भी बाधा रहती है।शनि जिनकी कुडंली में छठे भाव में होता है एवं सूर्य अष्टम में और सप्तमेश कमजोर अथवा पाप पीड़ित होता है, उनके विवाह में भी काफी बाधाएँ आती हैं। शनि और राहु की युति जब सप्तम भाव में होती है तब विवाह सामान्य से अधिक आयु में होता है, यह एक ग्रहण योग भी है।इस प्रकार की स्थिति तब भी होती है जब शनि और राहु की युति लग्न में होती है और वह सप्तम भाव पर दृष्‍टि डालते हैं। जन्मपत्रिका में शनि-राहु की युति होने पर सप्तमेश व शुक्र अगर कमजोर हो तो विवाह अति विलंब से होता है। जिन कन्याओं के विवाह में शनि के कारण देरी हो उन्हें जन्मकुडंली के अनुसार उपाय करना लाभदायक रहता है।
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