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गणेश चतुर्थी 2017: जानिए क्या है पूजा का शुभ मुहूर्त, क्या महासंयोग बन रहे हैं इस सालइस वर्ष के गणेशोत्सव की दूसरी विशेष बात यह कि इस बार यह त्यौहार 10 दिनों के बजाय 11 दिनों तक मनाया जाएगाऋद्धि और सिद्धि के स्वामी श्री गणेश का जन्मोत्सव 'गणेश चतुर्थी' वर्ष 2017 में 25 अगस्त को मनाई जाएगी. विघ्नहर्ता सुखकर्ता विनायक इस साल अनेकानेक अमंगल को मंगल में बदलने का योग लेकर उपस्थित हो रहे हैं. लेकिन आइए सबसे पहले जानते हैं, इस वर्ष गणेश चतुर्थी की पूजा और अन्य अनुष्ठान के लिए शुभ समय और मुहूर्त क्या है?जानिए क्या है गणेश-पूजन की अवधिवैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल गणपति पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:06 बजे से आरम्भ हो कर दोपहर बाद 01:39 बजे तक है. पौराणिक प्रमाणों के अनुसार, गजानन श्री गणेश का जन्म दिन के मध्याह्न में हुआ था. लिहाजा श्री गणेश पूजन की यह उपरोक्त अवधि, जो कि लगभग 2 घंटे 33 मिनट की है, हर प्रकार से उत्तम है.भाद्रपद की चतुर्थी को हुआ था श्री गणेश का आविर्भावहिंदू पंचाग के अनुसार गणेश चतुर्थी त्यौहार भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है. इसी तिथि को मध्याह्न में शक्ति-स्वरूपा देवी पार्वती ने दिव्य-स्नान के समय अपनी त्वचा के मैल से एक बालक का स्वरूप गढ़ा और उसमें प्राण आरोपित कर अपने महल की पहरेदारी में नियुक्त कर दिया. बालक की निष्ठा, सजगता और तत्परता इतनी प्रबल थी कि देवाधिदेव शिव भी उसका उल्लंघन नहीं कर पाए और फिर जो हुआ वह तो जग-विदित है.चतुर्थी तिथि का आरम्भ और समापन समयहिन्दू पंचांग के अनुसार, चतुर्थी तिथि 24 अगस्त 2017 को शाम में 08:27 बजे से आरम्भ होगी. इस तिथि की समाप्ति 25 अगस्त को शाम में 08:31 बजे होगी. लेकिन 08:31 बजे के बाद भी चन्द्रमा उदित रहेंगे, जो शाम में 09:20 बजे अस्त होंगे. इसलिए जिन श्रद्धालुओं की चंद्र-दर्शन निषेध में आस्था है, उन्हें 09:20 बजे तक चंद्रमा को देखने से बचना चाहिए.गजकेसरी योग में विराजेंगे श्री गणेशइस साल भगवान श्री गणेश गजकेसरी योग में विराजेंगे, जो छात्रों, बुद्धिजीवियों के साथ-साथ राजनीतिज्ञों के लिए बहुत कल्याणकारी सिद्ध होगा. यह योग कई शुभ संयोग लेकर आ रहा है. सबसे महत्वपूर्ण संयोग तो यह है कि इस दिन से कर्मधिपति शनिदेव की चाल सीधी हो जाएगी. फलतः सभी राशियों पर शनिदेव के प्रकोप का असर धीरे-धीर समाप्त होने लगेगा और जातकों के बिगड़े काम बनने लगेंगे.11 दिनों तक मनाया जाएगी गणेश चतुर्थीइस वर्ष के गणेशोत्सव की दूसरी विशेष बात यह कि इस बार यह त्यौहार 10 दिनों के बजाय 11 दिनों तक मनाया जाएगा. यानी मोदकप्रिय गणेश अपने भक्तों के घरों में 11 दिनों तक मेहमान बनकर विराजेंगे और अपनी कृपादृष्टि बनाए रखेंगे. यह परिघटना हिन्दू पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि में तिथि-वृद्धि के कारण संभव हुआ है. इस तिथि को एक दिन बढ़ जाने से श्री गणेश का जलविहार अब 12वें दिन यानी 5 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन होगा.पूजा की तारीखगणेश चतुर्थी 25 अगस्त 2017 को है. चतुर्थी 24 अगस्त 2017 को रात 20:27 बजे शुरू होगी.पूजा का शुभ मुहूर्तगणेश जी की मुर्ति लाने का समय: प्रातः 07:38 से 08:32 तक. गणेश पूजन का शुभ समय प्रातः 09:15 से 10:28 बजे तक , दोपहर 12:16 से 01:17 तक है.पूजा की सामग्रीगणेश जी की पूजा करने के लिए चौकी या पाटा, जल कलश, लाल कपड़ा, पंचामृत, रोली, मोली, लाल चंदन, जनेऊ गंगाजल, सिंदूर चांदी का वर्क लाल फूल या माला इत्र मोदक या लडडू धानी सुपारी लौंग, इलायची नारियल फल दूर्वा, दूब पंचमेवा घी का दीपक धूप, अगरबत्ती और कपूर की आवश्यकता होती है.पूजा की विधिभगवान गणेश की पूजा करने लिए सबसे पहले सुबह नहा धोकर शुद्ध लाल रंग के कपड़े पहने. क्योकि गणेश जी को लाल रंग प्रिय है. पूजा करते समय आपका मुंह पूर्व दिशा में या उत्तर दिशा में होना चाहिए.सबसे पहले गणेश जी को पंचामृत से स्नान कराएं. उसके बाद गंगा जल से स्नान कराएं. गणेश जी को चौकी पर लाल कपड़े पर बिठाएं. ऋद्धि-सिद्धि के रूप में दो सुपारी रखें. गणेश जी को सिन्दूर लगाकर चांदी का वर्क लगाएं. लाल चंदन का टीका लगाएं. अक्षत (चावल) लगाएं. मौली और जनेऊ अर्पित करें. लाल रंग के पुष्प या माला आदि अर्पित करें. इत्र अर्पित करें. दूर्वा अर्पित करें. नारियल चढ़ाएं. पंचमेवा चढ़ाएं. फल अर्पित करें. मोदक और लडडू आदि का भोग लगाएं. लौंग इलायची अर्पित करें. दीपक, अगरबत्ती, धूप आदि जलाएं इससे गणेश जी प्रसन्न होते हैं.गणेश जी की प्रतिमा के सामने प्रतिदिन गणपति अथर्वशीर्ष व संकट नाशन गणेश आदि स्तोत्रों का पाठ करे.यह मंत्र पढ़ें गणेश मन्त्र उच्चारित करेंऊँ वक्रतुण्ड़ महाकाय सूर्य कोटि समप्रभः. निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा..ऐसे कपूर जलाकर करें आरती करेंजय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा. माता जाकी पार्वती पिता महादेवा.. जय गणेश जय गणेश.एक दन्त दयावंत चार भुजाधारी. माथे सिन्दूर सोहे मूष की सवारी.. जय गणेश जय गणेश…अंधन को आँख देत कोढ़िन को काया. बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया.. जय गणेश जय गणेश…हार चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा. लडूवन का भोग लगे संत करे सेवा.. जय गणेश जय गणेश…दीनन की लाज राखी शम्भु सुतवारी. कामना को पूरा करो जग बलिहारी.. जय गणेश जय गणेश…
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‬: उच्च तथा नीच राशि के ग्रह— *शिव शक्ति ज्योतिषी इंदौर 9755555085*ज्योतिष में रूचि रखने वाले लोगों के मन में उच्च तथा नीच राशियों में स्थित ग्रहों को लेकर एक प्रबल धारणा बनी हुई है कि अपनी उच्च राशि में स्थित ग्रह सदा शुभ फल देता है तथा अपनी नीच राशि में स्थित ग्रह सदा नीच फल देता है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह को तुला राशि में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है तथा इसीलिए तुला राशि में स्थित शनि को उच्च का शनि कह कर संबोधित किया जाता है और अधिकतर ज्योतिषियों का यह मानना है कि तुला राशि में स्थित शनि कुंडली धारक के लिए सदा शुभ फलदायी होता है।**किंतु यह धारणा एक भ्रांति से अधिक कुछ नहीं है तथा इसका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं है और इसी भ्रांति में विश्वास करके बहुत से ज्योतिष प्रेमी जीवन भर नुकसान उठाते रहते हैं क्योंकि उनकी कुंडली में तुला राशि में स्थित शनि वास्तव में अशुभ फलदायी होता हैतथा वे इसे शुभ फलदायी मानकर अपने जीवन में आ रही समस्याओं का कारण दूसरे ग्रहों में खोजते रहते हैं तथा अपनी कुंडली में स्थित अशुभ फलदायी शनि के अशुभ फलों में कमी लाने का कोई प्रयास तक नहीं करते। इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आइए एक नज़र में ग्रहों के उच्च तथा नीच राशियों में स्थित होने की स्थिति पर विचार कर लें।नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह को किसी एक राशि विशेष में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है जिसे इस ग्रह की उच्च की राशि कहा जाता है। इसी तरह अपनी उच्च की राशि से ठीक सातवीं राशि में स्थित होने पर प्रत्येक ग्रह के बल में कमी आ जाती है तथा इस राशि को इस ग्रह की नीच की राशि कहा जाता है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह की उच्च की राशि तुला है तथा इस राशि से ठीक सातवीं राशि अर्थात मेष राशि शनि ग्रह की नीच की राशि है तथा मेष में स्थित होने से शनि ग्रह का बल क्षीण हो जाता है। इसी प्रकार हर एक ग्रह की 12 राशियों में से एक उच्च की राशि तथा एक नीच की राशि होती है।**किंतु यहां पर यह समझ लेना अति आवश्यक है कि किसी भी ग्रह के अपनी उच्च या नीच की राशि में स्थित होने का संबंध केवल उसके बलवान या बलहीन होने से होता है न कि उसके शुभ या अशुभ होने से। तुला में स्थित शनि भी कुंडली धारक को बहुत से अशुभ फल दे सकता है जबकि मेष राशि में स्थित नीच राशि का शनि भी कुंडली धारक को बहुतसे लाभ दे सकता है। इसलिए ज्योतिष में रूचि रखने वाले लोगों को यह बात भली भांति समझ लेनी चाहिए कि उच्च या नीच राशि में स्थित होने का प्रभाव केवल ग्रह के बल पर पड़ता है न कि उसके स्वभाव पर। पारम्परिक भारतीय ज्योतिष कभी यह नहीं कहती कि उच्च का ग्रह हमेशा अच्छे परिणाम देगा और नीच का ग्रह हमेशा खराब परिणाम देगा। लेकिन हेमवंता नेमासा काटवे की मानें तो उच्च ग्रह हमेशा खराब परिणाम देंगे और नीच ग्रह अच्छे परिणाम देंगे। इसके पीछे उनका मंतव्य मुझे यह नजर आता है कि जब कोई ग्रह उच्च का होता है तो वह इतनी तीव्रता से परिणाम देता है कि व्यक्ति की जिंदगी में कर्मों से अधिक प्रभावी परिणाम देने लगता है। यानि व्यक्ति कोई एक काम करना चाहे और ग्रह उसे दूसरी ओर लेकर जाएं। इस तरह व्यक्ति की जिंदगी में संघर्ष बढ़ जाता है। इसी वजह से काटवे ने उच्च के ग्रहों को खराब कहा होगा।कुछ परिस्थितियां ऐसी भी होती हैं जब नीच ग्रह उच्च का परिणाम देते हैं। यह मुख्य रूप से लग्न में बैठे नीच ग्रह के लिए कहा गया है। मैंने तुला लग्न में सूर्य और गुरू की युति अब तक चार बार देखी है।तुला लग्न में सूर्य नीच का हुआ और गुरू अकारक।अगर टर्मिनोलॉजी के अनुसार गणना की जाए तो सबसे निकृष्ट योग बनेगा। लेकिन ऐसा नहीं होता। लग्न में सूर्य उच्च का परिणाम देता है और वास्तव में देखा भी यही गया। लग्न में उच्च का सूर्य गुरू के साथ हो तो जातक अपने संस्थान में शीर्ष स्थान पर पहुंचता है॥*Shiv Shakti Jyotish 9425964795*आइए कुछ तथ्यों की सहायता से इस विचार को समझने का प्रयास करते हैं। शनि नवग्रहों में सबसेधीमी गति से भ्रमण करते हैं तथा एक राशि में लगभग अढ़ाई वर्ष तक रहते हैं अर्थात शनि अपनी उच्च की राशि तुला तथा नीच की राशि मेष में भी अढ़ाई वर्ष तक लगातार स्थित रहते हैं। यदि ग्रहों के अपनी उच्च या नीच राशियों में स्थित होने से शुभ या अशुभ होने की प्रचलित धारणा को सत्य मान लिया जाए तो इसका अर्थ यह निकलता है कि शनि के तुला में स्थित रहने के अढ़ाई वर्ष के समय काल में जन्में प्रत्येक व्यक्ति के लिए शनि शुभ फलदायी होंगे क्योंकि इन वर्षों में जन्में सभी लोगों की जन्म कुंडली में शनि अपनी उच्च की राशि तुला में ही स्थित होंगे। यह विचार व्यवहारिकता की कसौटी पर बिलकुल भी नहीं टिकता क्योंकि देश तथा काल के हिसाब से हर ग्रह अपना स्वभाव थोड़े-थोड़े समय के पश्चात ही बदलता रहता है तथा किसी भी ग्रह का स्वभाव कुछ घंटों के लिए भी एक जैसा नहीं रहता, फिर अढ़ाई वर्ष तो बहुत लंबा समय है।**इसलिए ग्रहों के उच्च या नीच की राशि में स्थित होने का मतलब केवल उनके बलवान या बलहीन होने से समझना चाहिए न कि उनके शुभ या अशुभ होने से। मैने अपने ज्योतिष अभ्यास के कार्यकाल में ऐसी बहुत सी कुंडलियां देखी हैं जिनमें अपनी उच्च की राशि में स्थित कोई ग्रह बहुत अशुभ फल दे रहा होता है।क्योंकि अपनी उच्च की राशि में स्थित होने से ग्रह बहुत बलवान हो जाता है, इसलिए उसके अशुभ होने की स्थिति में वह अपने बलवान होने के कारण सामान्य से बहुत अधिक हानि करता है।इसी तरह मेरे अनुभव में ऐसीं भी बहुत सी कुंडलियां आयीं हैं जिनमें कोई ग्रह अपनी नीच की राशि में स्थित होने पर भी स्वभाव से शुभ फल दे रहा होता है किन्तु बलहीन होने के कारण इन शुभ फलों में कुछ न कुछ कमी रह जाती है। ऐसे लोगों को अपनी कुंडली में नीच राशि में स्थित किन्तु शुभ फलदायी ग्रहों के रत्न धारण करने से बहुत लाभ होता है क्योंकि ऐसे ग्रहों के रत्न धारण करने से इन ग्रहों को अतिरिक्त बल मिलता है तथा यह ग्रह बलवान होकर अपने शुभ फलों में वृद्धि करने में सक्षम हो जाते हैं।हर ग्रह अपनी उच्च राशि में तीव्रता से परिणाम देता है और नीच राशि में मंदता के साथ। अगर वह ग्रह आपकी कुण्डली में अकारक है तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह उच्च का है या नीच का। सूर्य मेष में, चंद्र वृष में, बुध कन्या में, गुरू कर्क में, मंगल मकर में, शनि तुला में और शुक्र मीन राशि में उच्च के परिणाम देते हैं।यानि पूरी तीव्रता से परिणाम देते हैं।इसी तरह सूर्य तुला में, चंद्रमा वृश्चिक में, बुध मीन में, गुरू मकर में, मंगल कर्क में, शुक्र कन्या में और शनि मेष में नीच का परिणाम देते हैं।**अब हम ग्रह एवं राशियों के कुछ वर्गीकरण को जानेंगे जो कि फलित ज्योतिष के लिए अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हैं।पहला वर्गीकरण शुभ ग्रह और पाप ग्रह का इस प्रकार है -**शुभ ग्रह: चन्द्रमा, बुध, शुक्र, गुरू हैं॥**पापी ग्रह: सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु हैं।**साधारणत चन्द्र एवं बुध को सदैव ही शुभ नहीं गिना जाता। पूर्ण चन्द्र अर्थात पूर्णिमा के पास का चन्द्र शुभ एवं अमावस्या के पास का चन्द्र शुभ नहीं गिना जाता। इसी प्रकार बुध अगर शुभ ग्रह के साथ हो तो शुभ होता है और यदि पापी ग्रह के साथ हो तो पापी हो जाता है।यह ध्यान रखने वाली बात है कि सभी पापी ग्रह सदैव ही बुरा फल नहीं देते। न ही सभी शुभ ग्रह सदैव ही शुभ फल देते हैं। अच्छा या बुरा फल कई अन्य बातों जैसे ग्रह का स्वामित्व, ग्रह की राशि स्थिति, दृष्टियों इत्यादि पर भी निर्भर करता है।जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।जैसा कि उपर कहा गया एक ग्रह का अच्छा या बुरा फल कई अन्य बातों पर निर्भर करता है और उनमें से एक है ग्रह की राशि में स्थिति। कोई भी ग्रह सामान्यत अपनी उच्च राशि, मित्र राशि, एवं खुद की राशि में अच्छा फल देते हैं। इसके विपरीत ग्रह अपनी नीच राशि और शत्रु राशि में बुरा फल देते हैं।**ग्रहों की उच्चादि राशि स्थिति इस प्रकार है —-**ग्रह उच्च राशि नीच राशि स्वग्रह राशि**1 सूर्य, मेष तुला सिंह**2 चन्द्रमा, वृषभ वृश्चिक कर्क**3 मंगल, मकर कर्क मेष, वृश्चिक**4 बुध, कन्या मीन मिथुन, कन्या**5 गुरू, कर्क मकर धनु, मीन**6 शुक्र, मीन कन्या वृषभ, तुला**7 शनि, तुला मेष मकर, कुम्भ**8 राहु, धनु मिथुन**9 केतु मिथुन धनु**उपर की तालिका में कुछ ध्यान देने वाले बिन्दु इस प्रकार हैं -1 ग्रह की उच्च राशि और नीच राशि एक दूसरे से सप्तम होती हैं। उदाहरणार्थ सूर्य मेष में उच्च का होता है जो कि राशि चक्र की पहली राशि है और तुला में नीच होता है जो कि राशि चक्र की सातवीं राशि है।2 सूर्य और चन्द्र सिर्फ एक राशि के स्वामी हैं।**राहु एवं केतु किसी भी राशि के स्वामी नहीं हैं। अन्य ग्रह दो-दो राशियों के स्वामी हैं।3 राहु एवं केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती। राहु-केतु की उच्च एवं नीच राशियां भी सभी ज्योतिषी प्रयोग नहीं करते हैं।**सभी ग्रहों के बलाबल का राशि और अंशों के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है। एक राशि में 30ए अंश होते हैं।ग्रहों के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए ग्रह किस राशि में कितने अंश पर है यह ज्ञान होना अनिवार्य है।सभी नौ ग्रहों की स्थिति का विश्लेषणइस प्रकार है-**सूर्य- सूर्य सिंह राशि में स्वग्रही होता है। 1ए से 10ए अंश तक उच्च का माना जाता है। तुला के 10ए अंश तक नीच का होता है। 1ए से 20ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ माना जाता है। सिंह में ही 21ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री होता है।**चंद्र- कर्क राशि मेंचंद्रमा स्वग्रही अथवा स्वक्षेत्री माना जाता है, परन्तु वृष राशि में 3ए अंश तक उच्च का और वृश्चिक राशि में 3ए अंश तक नीच का होता है। वृष राशि में ही 4ए से 30ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ तथा कर्क राशि में 1ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है।**मंगल- मंगल मेष तथा वृश्चिक राशियों में स्वग्रही होता है। मकर राशि में 1ए से 28ए अंश तक उच्च का तथा कर्क राशि में 1ए से 28ए अंश तक नीच का माना जाता है। मेष राशि में 1ए से 18ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ होता है और 19ए से 20ए अंश तक स्वक्षेत्री कहा जाता है।**बुध- बुध ग्रह कन्या और मिथुन राशियों में स्वग्रही होता है परंतु कन्या राशि में 15ए अंश तक उच्च का और मीन राशि में 15ए अंश तक नीच का होता है। कन्या राशि में ही 16ए से 20ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ और इसी राशि में 21ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री कहलाता है।**गुरू- गुरू धनु और मीन राशियों में स्वग्रही या स्वक्षेत्री होता है।कर्क राशि में 5ए अंश तक उच्च का और मकर राशि में 5ए अंश तक नीच का होता है। 1ए से 10ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ तथा धनु राशि में ही 14ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है।**शुक्र- शुक्र ग्रह अपनी दो राशियों वृष और तुला में स्वग्रही होता है। मीन राशि में 27ए अंश तक उच्च का और कन्या राशि में 27ए अंश तक नीच का होता है। तुला राशि में 1ए से 10ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ और उसी राशि में 11ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री होता है।**शनि- शनि अपनी दो राशियों कुंभ और मकर में स्वग्रही होता है। तुला में 1ए से 20ए अंश तक उच्च का और मेष में 20ए अंश तक नीच का होता है। कुंभ राशि में ही शनि 1ए से 20ए अंश तक मूल त्रिकोण का होता है। उसके बाद 21ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री होता है।**राहू- कन्या राशि का स्वामी मिथुन और वृष में उच्च का होता है। धनु में नीच का कर्क में मूल त्रिकोस्थ माना जाता है।**केतु- केतु मिथुन राशि का स्वामी है। 15ए अंश तक धनु और वृश्चिक राशि में उच्च का होता है। 15ए अंश तक मिथुन राशि में नीच का, सिंह राशि में मूल त्रिकोण का और मीन में स्वक्षेत्री होता है।वृष राशि में ही यह नीच का होता है।**जन्म कुंडली का विश्लेषण अंशों के आधार पर करने पर ही ग्रहों के वास्तविक बलाबल को ज्ञात किया जाता है। उदाहरण के लिए सिंह लग्न की जन्म कुंडली में सूर्य लग्न में बैठे होने से वह स्वग्रही है। यह जातक को मान सम्मान, धनधान्य बचपन से दिला रहा है। दशम भाव में वृष का चंद्रमा होने से जातक उत्तरोत्तर उन्नति करता रहेगा। अत: यह दो ग्रह ही उसके भाग्यवर्धक होंगे।**नीच भंग राज योग —–ग्रह अगर नीच राशि में बैठा हो या शत्रु भाव में तो आम धारणा यह होती है कि जब उस ग्रह की दशा आएगी तब वह जिस घर में बैठा है उस घर से सम्बन्धित विषयों में नीच का फल देगा. लेकिन इस धारणा से अगल एक मान्यता यह है कि नीच में बैठा ग्रह भी कुछ स्थितियों में राजगयोग के समान फल देता है. इस प्रकार के योग को नीच भंग राजयोग के नाम से जाना जाता है.**नीच भंग राजयोग के लिए आवश्यक स्थितियां——ज्योतिषशास्त्र के नियमों में बताया गया है कि नवमांश कुण्डली में अगर ग्रह उच्च राशि में बैठा हो तो जन्म कुण्डली में नीच राशि में होते हुए भी वह नीच का फल नहीं देता है. इसका कारण यह है कि इस स्थिति में उनका नीच भंग हो जाता है.जिस राशि में नीच ग्रह बैठा हो उस राशि का स्वामी ग्रह उसे देख रहा हो अथवा जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठा हो उस राशि का स्वामी स्वगृही होकर साथ में बैठा हो तो स्वत: ही ग्रह का नीच भंग हो जाता है।**नीच भंग के संदर्भ में एक नियम यह भी है कि नीच राशि में बैठा ग्रह अगर अपने सामने वाले घर यानी अपने से सातवें भाव में बैठे नीच ग्रह को देख रहा है, तो दोनों नीच ग्रहों का नीच भंग हो जाता है.अगर आपकी कुण्डली में ये स्थितियां नहीं बनती हों तो इन नियमों से भी नीच भंग का आंकलन कर सकते हैं जैसे जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठे हों उस राशि के स्वामी अपनी उच्च राशि में विराजमान हों तो नीच ग्रह का दोष नहीं लगता है।**एक नियम यह भी है कि जिस राशि में ग्रह नीच का होकर बैठा है उस ग्रह का स्वामी जन्म राशि से केन्द्र में विराजमान है साथ ही जिस राशि में नीच ग्रह उच्च का होता है उस राशि का स्वामी भी केन्द्र में बैठा हो तो सर्वथा नीच भंग राज योग बनता है. अगर यह स्थिति नहीं बनती है तो लग्न भी इस का आंकलन किया जा सकता है।यानी जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठा उस राशि का स्वामी एवं जिस राशि में नीच ग्रह उच्च का होता है।उसका स्वामी लग्न से कहीं भी केन्द्र में स्थित हों तो नीच भंग राज योग का शुभ फल देता है.अगर आपकी कुण्डली में ग्रह नीच राशियों में बैठे हैं तो इन स्थितियों को देखकर आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं कि आपकी कुण्डली में नीच राशि में बैठा ग्रह नीच का फल देगा अथवा यह नीच भंग राजयोग बनकर आपको अत्यंत शुभ फल प्रदान करेगा.**नीच भंग राजयोग का फल—–नीच भंग राज योग कुण्डली में एक से अधिक होने पर भी उसी प्रकार फल देता है जैसे एक नीच भंग राज योग होने पर .आधुनिक परिवेश में ज्योतिषशास्त्री मानते है कि ऐसा नहीं है कि इस योग के होने से व्यक्ति जन्म से ही राजा बनकर पैदा लेता है. यह योग जिनकी कुण्डली में बनता है उन्हें प्रारम्भ में कुछ मुश्किल हालातों से गुजरना पड़ता है जिससे उनका ज्ञान व अनुभव बढ़ता है तथा कई ऐसे अवसर मिलते हैं जिनसे उम्र के साथ-साथ कामयाबी की राहें प्रशस्त होती जाती हैं.यह योग व्यक्ति को आमतौर पर राजनेता, चिकित्सा विज्ञान एवं धार्मिक क्षेत्रों में कामयाबी दिलाता है जिससे व्यक्ति को मान-सम्मान व प्रतिष्ठा मिलती है. वैसे इस योग के विषय में यह धारणा भी है कि जिस व्यक्ति की कुण्डली में जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठा है उस राशि का स्वामी एवं उस ग्रह की उच्च राशि का स्वामी केन्द्र स्थान या त्रिकोण में बैठा हो तो व्यक्ति महान र्धमात्मा एवं राजसी सुखों को भोगने वाला होता है.इसी प्रकार नवमांश में नीच ग्रह उच्च राशि में होने पर भी समान फल मिलता है.shiv shakti jyotish Indore‬: कुंडली में भी विशेष योग होते हैं, जिनसे यह पता चलता है कि शासकीय नॉकरी, अथवा उच्चाधिकारी बनने में सफलता मिलेगी या नहीं, *मँगल शासन करने वाला ग्रह है, दशम भाव राजसत्ता से सम्बंधित है, यदि मंगल , दशम भाव दशमेश की स्तिथी अच्छी ही तो अच्छी सर्विस प्राप्त होने के योग बनते हैं। * सूर्य बुध गुरु शनि का दशम भाव में रहना या दशम भाव से द्रष्टि सम्बन्ध , दशमेश से इन ग्रहों की मित्रता भी नोकरी का कारक हैं।। *दशम भाव में मंगल उच्च राशि का हो *दशम भाव में शनि का अपनी उच्च राशि में होना।*दशम भाव में सूर्य, या गुरु का उच्च राशि में होना।। *केंद्र में कोई भी ग्रह उच्च राशि का हो, उस पर एवं दशम भाव पर शुभ ग्रह की दृष्टि होना।। *लग्नेश की लग्न पर दृष्टि हो, तथा मंगल का दशमेश से सम्बन्ध होने पर , लग्नेश एवं दशमेश की युति होने पर उच्चाधिकार प्राप्ति का योग होता है ।। *दशमेश केंद्र या त्रिकोण में हो, किसी त्रिकोणेश का केन्द्रेश से योग हो । *तुला लग्न कुंडली मे दशम भाव में चंद्र तथा चतुर्थ भाव में शुक्र होने पर भी अच्छी नोकरी के योग होते हैं।। *मकर लग्न कुंडली में दशम भाव में शुक्र पर शनि की दृष्टि हो या शनि पर शुक्र की नजर हो।Shiv Shakti Jyotish indore ‬: विविध टोटकेे :---1. जन्मकुंडली में यदि ग्यारहवें घर में शनि हो, तो मुख्य द्वार की चौखट बनाने से पहले उसके नीचे चन्दन दबा दें, सुख-समृद्धि से घर सुशोभित रहेगा।2. भवन निर्माण से पहले भूखंड पर पांच ब्राह्मणों को भोजन करना बहुत शुभ होता है। इससे घर में धन, ऐश्वर्य व सुखों का वास होता है। बच्चे भी संस्कारी व आज्ञाकारी होते हैं।3. यदि जीवन समस्याओं व दुखों से भरा हो, तो सौ ग्राम साबुत चावल किसी तालाब में डाल दें।4. यदि घर में मां को लगातार कोई कष्ट सता रहा हो, तो 121 पेड़े लेकर बच्चों को बांट दें कष्ट दूर हो जाएगा।5. यदि जमीन जायदाद लाख कोशिशों के बावजूद अधिक दामों न बिक पा रहा हो, तो कभी-कभी चाय की पत्ती जमादार को दें। चांदी का चैकोर टुकड़ा सदैव अपने पास रखें और चांदी के गिलास में ही पानी पीएं। हमेशा सफेद टोपी पहनें। संपत्ति अधिक दामों में बिक जाएगी।6. राहु ग्रह की अशुभता दूर करनी हो, तो भगवती काली की उपासना करें । राहु अशुभ हो, तो अचानक शारीरिक कष्ट होता है। चांदी की चेन गलें में पहनें राहत मिलेगी। कुत्तों को रोटी अवश्य खिलाएं, गरीबों को सूज़ी का हलवा अपने हाथ से बांटें, कष्ट दूर होगा।7. अक्षय तृतीया पर धनदा यंत्र पीले रेशमी कपड़े पर स्थापित करें, कनकधारा स्तोत्र का पाठ धूप, दीप, नैवेद्य के साथ करें और प्रतिदिन यंत्र का दर्शन करें। घर में सुख-समृद्धि का वास होगा, दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल जाएगा । हर पाठक को इस शुभ अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए ।8. यदि व्यवसाय या रोजगार में विघ्न बहुत आ रहे हों, तो दस अंधों को भोजन कराएं और गुलाब जामुन खिलाएं। अपने माता-पिता की सेवा करें, विघ्न अपने आप दूर हो जाएंगे ।9. पढाई करते वक्त विशेष कर नींद आए और पढ़ाई में मन न लगे, रूकावटें आए तो इसके लिए पूर्व की तरफ सिरहाना करके सोएं। रोज रामायण के सुन्दरकांड के कुछ अंशों का पाठ करना चाहिए। इसके साथ-साथ सवा 5 रत्ती का एक खूबसूरत मोती और सवा 6 रत्ती का मूंगा चांदी की अंगूठी में जड़वा कर क्रमशः छोटी अंगुली और अनामिका में धारण करें । पढ़ते वक्त नींद नहीं आएगी तथा इस उपाय से विद्यार्थी परीक्षा में अव्वल आते हैं और समस्त रूकावटें दूर हो जाती हैं।10. मानसिक अशांति की समस्या किसी पूर्व पाप का परिणाम होता है। इसे दूर करने के लिए यह उपाय बहुत लाभकारी है। प्रतिदिन हनुमान जी की पूजा और उनका स्मरण करें। हनुमान चालीसा का अवश्य पाठ करें। शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से उपाय शुरू करें। सोते वक्त एक छोटा सा चाकू सिरहाने के नीचे रखें। जिस कमरे में सोते हों, कपूर का लैंप जलाएं। समस्या का सामधान हो जाता है। पूर्व जन्म के पाप नष्ट होने लगते हैं और स्थितियां अनुकूल होने लगती हैं तथा मानसिक अशांति दूर होती है।11. कर्ज से मुक्ति के लिए: कर्ज से पीड़ित व्यक्ति को चाहिए कि दोनों मुटठी में काली राई लें। चौराहे पर पूर्व दिशा की ओर मुंह रखें तथा दाहिने हाथ की राई को बाईं ओर और बाएं हाथ की राई को दाहिनी दिशा में फेंक दें। एक साथ राई को फेंकना चाहिए। राई फेंकने के पश्चात चौराहे पर सरसों का तेल डाल कर दोमुखी दीपक जला देना चाहिए। दिया मिट्टी का रखना चाहिए। यह प्रयोग शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार को संध्या के समय करें। श्रद्धा द्वारा किया गया यह उपाय अवश्य कर्ज से मुक्ति दिलवाता है। एक बार सफलता न प्राप्त हो, तो दोबारा फिर कर लेना चाहिए। जिस चौराहे पर टोटका किया जा चुका हो उस दिन उस चौराहे पर टोटका नहीं करना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि अमावस्या हो और शनिवार हो तो यह विशेष फलदायी होता है । तब यह टोटका करना जादुई चमत्कार से कम नहीं है
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*राहु का कर्क राशि में गोचर (18 अगस्त 2017)*वैदिक ज्योतिष में राहु और केतु को अन्य ग्रहों के समान ही महत्व दिया गया है हालाँकि ये दोनों ही छाया ग्रह हैं । तामसिक प्रवृति होने के कारण राहु-केतु को क्रूर ग्रह कहा जाता है। राहु-केतु को किसी भी राशि का स्वामित्व नहीं दिया गया है लेकिन ये जिस राशि में स्थित होते हैं उस राशि के स्वामी तथा इनसे संबंध रखने वाले ग्रहों के अनुसार फल देते हैं। इनके ही द्वारा सूर्य एवं चंद्र ग्रहण होता है।राहु 18 अगस्त 2017 (शुक्रवार) को रात्रि 12:37 बजे कर्क राशि में प्रवेश करेगा, जबकि 07 मार्च 2019 (गुरुवार) को रात्रि 02 बजकर 48 मिनट तक यह कर्क राशि में स्थित रहेगा। इस गोचर का प्रभाव सभी 12 राशियों पर पड़ेगा। इस लेख के माध्यम से जानते हैं कि आपकी राशि पर राहु के इस गोचर का क्या प्रभाव पड़ेगा।*यह राशिफल चंद्र राशि पर आधारित है।**मेष*राहु आपकी राशि से चौथे भाव में गोचर करेगा। इस दौरान किसी काम के चलते आप अपने घर से दूर जा सकते हैं। वहीं माता जी की सेहत कुछ कमज़ोर रह सकती है इसलिए माँ की सेहत पर अवश्य ध्यान दें। घर में अशांत वातावरण के कारण आपको मानसिक तनाव भी रह सकता है। करियर क्षेत्र में आप आगे बढ़ने के लिए शॉर्टकट का रास्ता अपना सकते हैं, जोकि आपके लिए उचित नहीं होगा। किसी के साथ विवाद भी हो सकता है। सभी के साथ मधुर व्यवहार अपनाने की कोशिश करें। आपके निवास स्थान में परिवर्तन होने की संभावना है।केतु आपकी राशि से दशम भाव में गोचर करेगा। इस दौरान कार्य क्षेत्र में आपको संभलकर क़दम बढ़ाने होंगे, क्योंकि कार्य स्थल पर आपके साथ किसी तरह का विवाद हो सकता है। इस अवधि में शायद आप अपनी वर्तमान नौकरी से संतुष्ट न दिखें। ऐसे में आप जॉब चेंज करने पर विचार कर सकते हैं। राहु के प्रभाव से घरेलू जीवन की सुख-शांति प्रभावित हो सकती है। बेवज़ह की बातों को छोड़कर अपने काम पर ध्यान दें।*वृषभ*राहु आपकी राशि से तृतीय भाव में गोचर करेगा। इस दौरान आपकी संकल्प शक्ति में वृद्धि होगी। इस अवधि में आप लघु यात्राओं पर जा सकते हैं जो आपके लिए अनुकूल साबित होगी। भाई-बहनों के विदेश जाने के योग बन रहे हैं। हालाँकि उन्हें किसी प्रकार की चुनौती का भी सामना करना पड़ सकता है परंतु जीवनसाथी के लिए गोचर शुभ संकेत दे रहा है। इस कारण जीवनसाथी की ओर से कोई ख़ुशख़बरी मिल सकती है। केतु आपकी राशि से नौवें भाव में प्रवेश करेगा। इस दौरान आप किसी तीर्थ यात्रा पर जा सकते हैं। पिता जी के स्वास्थ्य में कुछ कमज़ोरी देखी जा सकती है अथवा उनके साथ आपका मनमुटाव हो सकता है। अध्यात्म की ओर भी आपका झुकाव संभव है।*मिथुन*राहु आपकी राशि से द्वितीय भाव में गोचर करेगा। इस दौरान आपके जीवन में कई तरह के बदलाव देखने को मिलेंगे। व्यापार अथवा किसी अन्य कारण से आप घर से दूर जा सकते हैं। गोचर के दौरान आपको किसी न किसी प्रकार की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। जीवनसाथी की सेहत में कुछ कमी देखी जा सकती है, इसलिए उनके स्वास्थ्य का ख़्याल रखें। अपनी संवाद शैली के माध्यम से आप दूसरों को प्रभावित कर सकते हैं। आपकी नज़र थोड़ी कमज़ोर हो सकती है। अतः ऐसा कोई भी कार्य न करें जिससे आँखों पर ज़ोर पड़े। भोजन को लेकर भी सावधानी बरतें। अधिक तेल और मसालेदार भोजन से परहेज़ करें।केतु आपकी राशि से आठवें भाव में गोचर करेगा जिसके कारण ज्योतिष, रहस्य विज्ञान, काला जादू और अध्यात्म जैसे विषयों की ओर आपकी रुचि बढ़ सकती है। वाहन चलाते समय पूरी सावधानी बरतें। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी आपको सचेत रहने की सलाह दी जाती है। बंदूक, तलवार, चाकू तथा अन्य हथियारों से दूर रहें।*कर्क*राहु आपकी राशि में प्रवेश करेगा और यह आपके प्रथम भाव में स्थित होगा इसलिए इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव आपकी राशि पर पड़ेगा। यह गोचर आपकी निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इस दौरान आप तनाव महसूस कर सकते हैं। किसी बात को लेकर दोस्तों या क़रीबियों से भी आपका विवाद हो सकता है। इस दौरान आप दूसरों पर हावी होने का प्रयास करेंगे परंतु ऐसा करने से आपके रिश्तों में खटास पैदा हो सकती है। जीवन में प्रगति के मार्ग पर भी आप आगे बढ़ेंगे।केतु आपकी राशि से सातवें भाव में गोचर करेगा। इस दौरान आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य कुछ कमज़ोर नज़र आ सकता है। सूजन और बुखार जैसी समस्या आपको हो सकती हैं इसलिए उनकी सेहत का ध्यान रखें। गोचर के दौरान आपके स्वभाव में क्रोध की वृद्धि हो सकती है आपको इस पर नियंत्रण रखने की सलाह दी जाती है। वैवाहिक जीवन में जीवनसाथी से आपके रिश्ते थोड़े कटु हो सकते हैं कोशिश करें कि जीवनसाथी से आपका प्यार भरा रिश्ता बना रहे। करियर के लिए गोचर शुभ होने के संकेत दे रहा है।*सिंह*राहु आपकी राशि से द्वादश भाव में गोचर करेगा। इस दौरान आपके विदेश जाने के योग बन रहे हैं अथवा आप किसी लंबी दूरी की यात्रा पर भी जा सकते हैं। कोई भी ग़ैर क़ानूनी काम न करें, अन्यथा आपको इसके बुरे परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। कार्य क्षेत्र में आप अपनी क्षमता से अधिक काम करेंगे और इस मेहनत का आपको लाभ मिलेगा। आपके ख़र्चों में बढ़ोत्तरी की संभावना है, अतः पैसों की बचत पर ध्यान दें।केतु ग्रह आपकी राशि से छठे भाव में गोचर करेगा। इस दौरान आपको सफलता पाने के लिए अधिक मेहनत करनी होगी। यदि आप किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो आपके सामने किसी प्रकार की बाधा आ सकती है, हालाँकि यदि आप मेहनत करेंगे तो इस प्रकार की बाधाएँ समाप्त हो जाएंगी। ससुराल पक्ष के लोगों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। जीवनसाथी को आँखों से संबंधित रोग हो सकता है इसलिए वे ऐसा कोई भी काम न करें जिसके कारण उनकी आँखों पर ज़ोर पड़े।*कन्या*राहु आपके एकादश भाव में गोचर करेगा। इस दौरान आपको कोई बड़ी उपलब्धि हासिल हो सकती है। प्रगति के मार्ग पर आप आगे बढ़ेंगे। योजना बनाकर काम करने से आपको सफलता मिलेगी। इस दौरान आपका आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प मज़बूत होगा। अच्छे कामों से आपको सफलता मिलेगी। विरोधी पक्ष आपका सामना करने से घबराएगा। सामाजिक प्रतिष्ठा में भी वृद्धि होने के योग हैं। दोस्तों और रिश्तेदारों से आपकी मुलाक़ात हो सकती है।केतु आपकी राशि से सातवें भाव में गोचर करेगा। इस स्थिति में आपके प्रेम जीवन में कुछ कठिनाई नज़र आ रही है। किन्हीं कारणों से लव पार्टनर और आपके बीच दूरी बढ़ सकती है। अतः ऐसी कोई बात न कहें जिससे साथी आपसे नाराज़ या दुखी हो जाए। उनकी भावनाओं का पूरा ख़्याल रखें। गोचर के दौरान बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है इसलिए बच्चों की सेहत की देखभाल करें। पढ़ाई के क्षेत्र में छात्रों का आत्मविश्वास कुछ कमज़ोर नज़र आ सकता है। इस दौरान अपनी पढ़ाई में ध्यान लगाएँ। तंत्र-मंत्र की विद्या को सीखने में आप रुचि ले सकते हैं।*तुला*राहु आपकी राशि से दशम भाव में जाएगा। इस दौरान अपने काम में आपको आनंद आएगा, हालाँकि कभी-कभी यही काम आपको उबाऊ लग सकता है। कार्य स्थल पर सीनियर्स अथवा सहकर्मियों से आपका विवाद हो सकता है। इस स्थिति में आप अपनी वर्तमान नौकरी को छोड़कर किसी नई नौकरी की तलाश कर सकते हैं। आपकी दिनचर्या थोड़ी व्यस्त रहेगी जिस कारण आप अपने दोस्तों और परिवार को कम समय दे पाएंगे। अपने निजी जीवन के लिए भी समय निकालें। सफलता पाने के लिए शॉर्टकट का रास्ता न अपनाएँ बल्कि अपनी मेहनत पर ही भरोसा रखें।केतु आपकी राशि से तीसरे भाव में गोचर करेगा। इस दौरान आपके घर का वातावरण थोड़ा अशांत रह सकता है। इस स्थिति में आप घर में परिजनों के बीच सामंजस्य बिठाने का प्रयास करेंगे। माता-पिता की सेहत कुछ कमज़ोर रह सकती है। अतः उनकी सेहत पर भी अच्छी तरह से ध्यान रखें। काम के चलते जीवनसाथी से दूर जाना पड़ सकता है। आपको मानसिक तनाव रहने के भी आसार हैं। इस तनाव को अपने ऊपर हावी न होने दें।*वृश्चिक*राहु आपकी राशि से नवम भाव में गोचर करेगा। इस दौरान आप किसी लंबी दूरी की यात्रा पर जा सकते हैं और यह यात्रा आपके लिए अनुकूल रहेगी। गोचर के दौरान आपको किसी पवित्र नदी में डुबकी लगाने का शुभ अवसर प्राप्त होगा। इसके अलावा आपको कोई ऐसा शुभ समाचार मिल सकता है जिसकी शायद ही आपने कल्पना की हो। प्रेम जीवन में भी सुधार देखने को मिलेगा। आप लव पार्टनर के साथ अच्छा समय व्यतीत करेंगे।केतु आपकी राशि से तीसरे भाव में गोचर करेगा। इस दौरान आप अधिक ऊर्जावान रहेंगे और डटकर चुनौतियों का सामना करेंगे। परिजनों के साथ आपको भी स्वास्थ्य संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है अतः अपनी सेहत पर पूरा ध्यान दें। मेहनत के कारण आप काम में सफल रहेंगे। कई बार छोटी-मोटी यात्राओं पर जाना पड़ सकता है।*धनु*राहु आपकी राशि से अष्टम भाव में प्रवेश करेगा। इस स्थिति में आपको धन की हानि हो सकती है इसलिए पैसों का निवेश सोच-समझकर करें। अचानक किसी विवाद के कारण घर का माहौल अशांत रहने के संकेत हैं। आपको स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है। अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहें और इसको लेकर किसी प्रकार की लापरवाही न बरतें। वाहन चलाते समय नियमों का पालन करें। पिता जी की सेहत की देखभाल करें। ससुराल पक्ष की ओर से आपको कोई सुंदर तोहफ़ा मिल सकता है। जीवन में उतार-चढ़ाव रहने की संभावना है। इसके अलावा आपको अचानक उच्च लाभ मिलने के भी योग हैं।केतु आपकी राशि से दूसरे भाव में गोचर करेगा। इस दौरान आपके परिवार में थोड़ा अशांत वातावरण रह सकता है। परिजनों के बीच सामंजस्य बिठाने का प्रयास करें। आपकी वाणी में थोड़ी कड़वाहट नज़र आ सकती है। ध्यान रखें, इससे आपके रिश्ते बिगड़ सकते हैं अतः सभी के साथ प्रेम से बातचीत करें और वाहन चलाते समय पूरी सावधानी बरतें।*मकर*राहु ग्रह आपकी राशि से सप्तम भाव में गोचर करेगा। इस दौरान वैवाहिक जीवन में आपको कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। किसी ग़लतफ़हमी के कारण जीवनसाथी से आपके रिश्ते बिगड़ सकते हैं इसलिए बेवज़ह शक करने से बचें और बातचीत से मामले का हल निकालें। यदि आप अविवाहित हैं तो प्रेम विवाह की प्रबल संभावना है। प्रोफ़ेशनल क्षेत्र में आपको उन्नति मिलेगी और व्यवसाय में भी लाभ मिलने के योग हैं। नौकरी में प्रदोन्नति भी हो सकती है।केतु आपकी राशि में प्रवेश करेगा और यह आपके प्रथम भाव में स्थित होगा। इस दौरान आप थोड़े भ्रम की स्थिति में रहेंगे और लोगों को आपके व्यवहार को समझना ज़रा मुश्किल होगा। गोचर की अवधि में आपकी सेहत कमज़ोर रह सकती है इसलिए अपनी सेहत पर ध्यान दें। धार्मिक कार्यों में आपका मन लगेगा और दान-पुण्य करने में भी सक्रिय रहेंगे।*कुंभ*राहु आपकी राशि से षष्ठम भाव में जाएगा। इस स्थिति में आप चुनौतियों से लड़ने में सक्षम होंगे और उन चुनौतियों पर विजय प्राप्त करेंगे। आपकी ताक़त से शत्रु भयभीत होगा। इस दौरान आप सुख-सुविधाओं का पूरा आनंद लेंगे। हालाँकि इस बीच आपकी सेहत कुछ कमज़ोर रह सकती है इसलिए अपनी सेहत को बिल्कुल नज़रअंदाज़ न करें। क़ानूनी मामलों में आपको सफलता मिलने की प्रबल संभावना है। इस दौरान आप परिश्रम करने से नहीं घबराएंगे। प्रतियोगी परीक्षा में आपको सफलता मिलने की प्रबल संभावना है। करियर क्षेत्र में आप अच्छा प्रदर्शन करेंगे।केतु आपकी राशि से बारहवें भाव में प्रवेश करेगा। इस स्थिति में आपके ख़र्चों में वृद्धि की संभावना है। अध्यात्म की ओर आपकी रुचि बढ़ेगी। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह गोचर आप पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। नींद न आने की समस्या अथवा आँख से संबंधित कोई रोग आपको परेशान कर सकता है इसलिए ऐसा कोई भी काम न करें जिससे आँखों पर ज़ोर पड़ता हो। प्रेम जीवन में बाधाएँ नज़र आ रही हैं। आग से बचकर रहें और वाहन सावधानी पूर्वक चलाएँ।*मीन*राहु आपकी राशि से पंचम भाव में गोचर करेगा। इस दौरान बच्चे अधिक चंचल एवं शरारती स्वभाव के हो सकते हैं। गर्भवती महिलाओं को गोचर की अवधि में अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। सफलता पाने के लिए शॉर्टकट का रास्ता अपनाना आपके लिए शुभ नहीं होगा। आपकी आमदनी में वृद्धि होने की प्रबल संभावना है। केतु आपकी राशि से ग्यारहवें भाव में गोचर करेगा। इस दौरान अध्यात्म, रहस्य विज्ञान और किसी नई भाषा को सीखने के लिए आपकी रुचि बढ़ सकती है। बच्चों की सेहत में कुछ कमी देखी जा सकती है इसलिए उनका ख़्याल रखें। प्रेम जीवन में भी बाधाएँ नज़र आ रही हैं। ऐसा कोई भी काम न करें जिससे प्रियतम की भावनाओं को ठेस पहुँचे। कार्य क्षेत्र में भी संभलकर क़दम आगे बढ़ाने होंगे।
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👹डाकिनी मन्त्र साधना👹यह साधना अत्यंत प्राचीन है।इस साधना को करने का अधिकार तामसिक साधक को है अर्थात जो माँस मदिरा का सेवन करते हैं।सिद्ध होने पर इनके माध्यम से साधक किसी भी कार्य को सुगमता पूर्वक कर सकते है।यह क्षण मात्र में कार्य करती है।स्त्री वशीकरण, पुरुष वशीकरण, समाज के रावण, सूर्पनखाजैसे दुष्ट लोगो को दण्डित भी करती है।कार्यालयों में रुके हुए कार्य, प्रॉपर्टी के कार्य आदि को भी सुगमता से सम्पन कर देती है।।यह साधना श्मशान के किनारे, सुनसान खण्डर, कुँए अथवा बावड़ी के पास , वीराने जंगल में सिद्ध की जाती है।यह साधना मन्त्र आपको किसी भी पुस्तक से प्राप्त हो सकता है किन्तु सिद्धि विधान आपको इस पोस्ट के माध्यम से , हमारे सानिद्ध्य में अथवा किसी सिद्ध गुरु से ही प्राप्त होगा।पोस्ट में जैसी विधि कही गयी है वैसे ही करे, , तो साधक को डाकिनी सिद्ध हो जायेगी।डाकिनी का मन्त्र जाप बन्द आँखों से किया जाता है और साधना के मध्याह्म में एक बार आँख खोलकर पीली सरसों को मन्त्र से अभिमन्त्रित करके अपने चारो दिशाओ में फेंका जाता है फिर उसके बाद मन्त्र जाप किया जाता है।यह क्रिया 41 दिन करनी होती है।डाकिनी साधक के बन्द आँखों में दिखाई देती है अर्थात साधना के अंतिम दिन प्रकट होती है।कभी कभी साधक को आवाज भी देती है किन्तु डरे नही और अपने सामने रखे माँस मदिरा का भोग डाकिनी को दे, इससे वह संतुष्ट होती है और साधक को वचन देती है उसके सभी कार्य करने का और बदले में अपना भोग ग्रहण करती है।इसकी शक्ति कर्ण वैताली से ज्यादा होती है अर्थात इसमें 1000 प्रेत आत्माओ की शक्ति होती है।यह सभी भूत प्रेतों, जिन्नों, हमजादो आदि को मारकर अपने साथ ले जाती है।इसमें साधक जब भी कार्य की इच्छा करता है तुरुन्त करती है।साधक को यह बन्द आँखों में ही दिखाई देगी।1 कुशासन या बकरे या भैंसे का चर्म आसन2 बकरे की चर्बी का चिराग3 मिट्टी के वर्तन में 125 ग्राम बकरे की कलेजी अथवा माँस4 मिटटी के प्याले में सुगन्ध वाली मदिरा5 पीली सरसो 5 ग्राम रोज6 चमेली की धूप या अगरबत्ती7 निर्वस्त्र साधना करे।8 रुद्राक्ष की माला शुद्ध9 सिंदूर का तिलक अनिवार्य10 मन्त्र जाप दाहिने हाथ की ऊँगली मध्यमा और अंगूठा ।11 अमावस्या के दिन या पूर्णिमा के दिन से करे।12 दिशा उत्तर13 पवित्रीकरण, वास्तुदोष पूजन, गुरुमन्त्र, सुरक्षा मन्त्र करे।14 41 दिन की सिद्धि का संकल्प ले।15 10 माला जप करने के बाद पीली सरसों को दाहिने हाथ में रखकर 1 बार मन्त्र बोलकर फूंके और चारो दिशाओ में फ़ेंक दे फिर पुनः 11 माला मन्त्र जाप करे।16 डाकिनी जब भी साधक को आवाज दे तो साधक वचन लेकर डाकिनी सिद्ध करे।17 मन्त्र जाप बन्द आँखों से होगा।ताम्र कलश जल से भरकर रखे।18 साधना कॉल में मांस मंदिरा का सेवन एक समय करे।19 यह सिद्धि रात्रि 12 बजे से शुरू करे और सूर्यास्त से पहले पूरी 21 माला करे।20 साधक का साधना स्थल देव मन्दिरो आदि से 200 मीटर की दूरी पर हो।साधना स्थल पर किसी भी देवी देवता की मूर्ति नही होनी चाहिये।21 यह सिद्धि बाममार्गी है।22 41 वे दिन बंद आँखों में डाकिनी काली सी औरत की तरह खुले वालो वाली निर्वस्त्र दिखाई देगी तभी साधक समझ जाय की डाकिनी सिद्ध हो गयी है और भोग अर्पण करे।मांस मदिरा रोज साधना स्थल पर खुला छोड़ दे और सो जाये। 4 बजे तक साधना पूर्ण कर ले और जमीन पर माँस मदिरा डाल कर सो जाय।23 साधना काल में अनेक भयंकर आवाजे आती है यह आवाजे आत्माओ, प्रेतों, भूतो चुड़ैलों आदि इतर योनियों की होती है जो साधक इसको सिद्ध करते है उनको चाहिये की जब उनकी सभी आवश्यकताएं पूरी हो जाय तो इस सिद्धि का विसर्जन कर दे इसमें साधक को हमें अपना नाम माता , पिता का नाम फ़ोटो वर्तमान एड्रेस भेजे , तब दिव्य शक्ति प्रयोग से डाकिनी का संहार रात्रि काल में कर दिया जाता है और साधक को उस समय शरीर में एक झटका लगता है जिस समय डाकिनी का वध कर उसको डाकिनी योनि से मुक्त कर पुनर्जन्म हेतु विष्णुलोक भेज दिया जाता है।इससे साधक डाकिनी से मुक्ति पा लेता है और दूसरा डाकिनी को भी मुक्ति मिल जाती है तीसरा साधक जन भलाई करता है चौथा साधक के पास अतुल धन सम्पदा हो जाती है, जो साधक की आने वाली पीढ़ियों के लिये भी पर्याप्त होती है।( जिन साधको को कई कई साल बीत चुके है और उनको सिद्धियां प्राप्त नही हुयी है और ऐसे साधक जो गुरुओ को निरंतर बदलते रहते है, संपर्क कर सकते है, उनको प्रथम बार में सिद्धि सिद्ध करायी जा सकती है, धनलोभी साधक संपर्क न करे।)मन्त्रॐ स्यार की खवासिनी समन्दर पार धाईआव बैठी हो तो आवठाडी हो तो ठाडी आवजलती आ उछलती आन आये डाकिनी तो जालंधर पीर की आनशब्द साँचापिण्ड काँचाफुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ।
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‬: कुंडली का यह योग व्यक्ति को बना देता है राजाकुंडली में नौवें और दसवें स्थान का बड़ा महत्त्व होता है।जन्म कुंडली में नौवां स्थान भाग्य का और दसवां कर्म का स्थान होता है। कोई भी व्यक्ति इन दोनों घरों की वजह से ही सबसे ज्यादा सुख और समृधि प्राप्त करता है। कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है और अच्छा भाग्य, अच्छे कार्य व्यक्ति से करवाता है।अगर जन्म कुंडली के नौवें या दसवें घर में सही ग्रह मौजूद रहते हैं तो उन परिस्थितियों में राजयोग का निर्माण होता है। राज योग एक ऐसा योग होता है जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष राजा के समान सुख प्रदान करता है। इस योग को प्राप्त करने वाला व्यक्ति सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने वाला होता है।ज्योतिष की दुनिया में जिन व्यक्तियों की कुण्डली में राजयोग निर्मित होता है, वे उच्च स्तरीय राजनेता, मंत्री, किसी राजनीतिक दल के प्रमुखया कला और व्यवसाय में खूब मान-सम्मान प्राप्त करते हैं।राजयोग का आंकलन करने के लिए जन्म कुंडली में लग्न को आधार बनाया जाता है। कुंडली की लग्न में सही ग्रह मौजूद होते हैं तो राजयोग का निर्माण होता है।जिस व्यक्ति की कुंडली में राजयोग रहता है उस व्यक्ति को हर प्रकार की सुख-सुविधा और लाभ भी प्राप्त होते हैं। इस लेख के माघ्यम से आइए जानें कि कुण्डली में राजयोग का निर्माण कैसे होता है-मेष लग्न- मेष लग्न में मंगल और ब्रहस्पति अगर कुंडली के नौवें या दसवें भाव में विराजमान होते हैं तो यह राजयोग कारक बन जाता है।वृष लग्न- वृष लग्न में शुक्र और शनि अगर नौवें या दसवें स्थान पर विराजमान होते हैं तो यह राजयोग का निर्माण कर देते हैं।इस लग्न में शनि राजयोग के लिए अहम कारक बताया जाता है।मिथुन लग्न- मिथुन लग्न में अगर बुध या शनि कुंडली के नौवें या दसवें घर में एक साथ आ जाते हैं तो ऐसी कुंडली वाले जातक का जीवन राजाओं जैसा बन जाता है।कर्क लग्न- कर्क लग्न में अगर चंद्रमा और ब्रहस्पति भाग्य या कर्म के स्थान पर मौजूद होते हैं तो यह केंद्र त्रिकोंण राज योग बना देते हैं। इस लग्न वालों के लिए ब्रहस्पति और चन्द्रमा बेहद शुभ ग्रह भी बताये जाते हैं।सिंह लग्न- सिंह लग्न के जातकों की कुंडली में अगर सूर्य और मंगल दसमं या भाग्य स्थान में बैठ जाते हैं तो जातक के जीवन में राज योग कारक का निर्माण हो जाता है।कन्या लग्न- कन्या लग्न में बुध और शुक्र अगर भाग्य स्थान या दसमं भाव में एक साथ आ जाते हैं तो जीवन राजाओं जैसा हो जाता है।तुला लग्न- तुला लग्न वालों का भी शुक्र या बुध अगर कुंडली के नौवें या दसवें स्थान पर एक साथ विराजमान हो जाता है तो इस ग्रहों का शुभ असर जातक को राजयोग के रूप में प्राप्त होने लगता है।वृश्चिक लग्न- वृश्चिक लग्न में सूर्य और मंगल, भाग्य स्थान या कर्म स्थान (नौवें या दसवें) भाव में एक साथ आ जाते हैं तो ऐसी कुंडली वाले का जीवन राजाओं जैसा हो जाता है। यहाँ एक बात और ध्यान देने वाली है कि अगर मंगल और चंद्रमा भी भाग्य या कर्म स्थान पर आ जायें तो यह शुभ रहता है।धनु लग्न- धनु लग्न के जातकों की कुंडली में राजयोग के कारक, ब्रहस्पति और सूर्य माने जाते हैं। यह दोनों ग्रह अगरनौवें या दसवें घर में एक साथ बैठ जायें तो यह राजयोग कारक बन जाता है।मकर लग्न- मकर लग्न वाली की कुंडली में अगर शनि और बुध की युति, भाग्य या कर्म स्थान पर मौजूद होती है तो राजयोग बन जाता है।कुंभ लग्न- कुंभ लग्न वालों का अगर शुक्र और शनि नौवें या दसवें स्थान पर एक साथ आ जाते हैं तो जीवन राजाओं जैसा हो जाता है।मीन लग्न- मीन लग्न वालों का अगर ब्रहस्पति और मंगल जन्म कुंडली के नवें या दसमं स्थान पर एक साथ विराजमान हो जाते हैं तो यह राज योग बना देते हैं।.ASTROLOGY & SUN TRANSIT EFFECT ON LEO ASCENDANT PEOPLE.Sun planet will be in Moon sign from 16 July 2017 to 16 August 2017 .Rahu is already in Leo sign.Saturn is already in Scorpio sign..This period can be tough for Leo ascendant people.They can have accident, drive carefully.They can go far from birth place.Mother can have health problem.Be careful if you are doing property related transaction.Check all documents.Chances of disturbance in property matters.Chances of misunderstanding/fights in couple.Those who are engaged.Stay alert, chances of cancellation of relationship..After 15 August please give feedback That Which problem you have faced in this month.====================..================..राशी फल अर्थात ग्रह गोचर का जातक पर प्रभाव .जन्म कुण्डली में ग्रह स्थिर होते हैं .जब जातक का जन्म होता है .उस समय ग्रहों की जो स्थिति होती है उसे जन्म कुण्डली कहते हैं .गोचर में ग्रह घूमते रहते हैं .जो जातक के जीवन पर प्रभाव डालते हैं..वर्तमान समय कैसा है .यह कई तथ्यों पर निर्भर करता है .1 जन्म कुण्डली में स्थित ग्रह .2 महादशा + अन्तर्दशा , वर्ष फल.3 घर का वास्तु .4 गोचर में ग्रह स्थिति .5 जातक के कर्म .6 जातक द्वारा किये गए उपाय .और भी कई तथ्य हो सकते हैं ..अब यदि गोचर में ग्रहों की जो स्थिति है .अगर वही जन्म कुण्डली में है तो .जातक के साथ वह घटना होने की सम्भावना बन जाएगी .यदि शेष 4 तथ्य भी मिल जाते हैं तो घटना हो जाती है .अब बात करते हैं राशि फल की जो केवल ग्रह गोचर पर आधारित होता है .अब एक ही लगन के लाखों लोग होते हैं .सबके साथ वह घटना नहीं होगी .जिन जातकों की जन्म कुण्डली में अधीक तथ्य मिलेंगे .केवल उन्ही के साथ होंगी .इसलिए राशी फल पूरी तरह लागु अर्थात सही नहीं होता ..फिर भी अगर आपकी राशी फल में लिखा है कि .दुर्घटना होने की सम्भावना है तो आपको सम्भल जाना चाहीये .सही तरह से लिखा हुआ राशी फल एक " सुचना" की तरह हैं .जो ध्यान में रखनी चाहिए ..मान लीजिये सड़क पर board लगा है कि .आगे रास्ता ख़राब है .तो इसका मतलब यह नहीं कि सबका accident हो जायेगा .इसका मतलब यह है कि यदि आप लापरवाही करते हैं तो accident हो सकता है ..राशी फल अर्थात गृह गोचर का प्रभाव जातक पर कैसे पड़ेगा .लगन राशि से या चन्द्र राशि से .इसके बारे में भी सबके अलग विचार हैं .मेरे जो लेख होते हैं वह लगन राशि पर होते हैं .कुछ लोग नाम राशी से भी देखते हैं .वह तो पूरी तरह से गलत है .क्यूंकि कोई भी नाम जन्म कुण्डली के अनुसार नहीं रखता..जब भी राशी फल अर्थात ग्रह गोचर के प्रभाव की बात आती है .तो लोग कहते हैं .राम और रावण की राशि एक ही थी .आशा है अब आपका संशय(confusion) दूर हो गया होगा .यदि फिर भी कोई प्रश्न है तो आप पूछ सकते हैं.यदि आप इस लेख को WHATSAPP पर प्राप्त करना चाहते हैं .तो अपना नाम MOBILE NUMBER ARTICLE NUMBER लिख कर INBOX करें..====================== *जीवन में सुख और सफलता के उपाय*.कहते हैं कि पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ इनके पालन से जीवन में सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति निश्चित रूप से होती है।.– घर का हर व्यक्ति सूर्योदय के पहले उठे और उगते सूर्य के दर्शन करे।इसी समय जोर से गायत्री मंत्र का उच्चारण करे तो घर के वास्तु दोष भी नष्ट हो जाते है।.– सूर्य दर्शन के बाद सूर्य को जल, पुष्प और रोली-अक्षत का अर्घ्य दे, सूर्य के साथ त्राटक करे।.– बिस्तर से उठते समय दोनों पैर जमीन पर एक साथ रखे, उसी समय इष्ट का स्मरण करे और हाथों को मुख पर फेरे।.– स्नान और पूजन सुबह 7 से 8 बजे के बीच अवश्य कर ले।.– घर में तुलसी और आक का पौधा लगाए और उनकी नियमित सेवा करे।.– पक्षियों को दाना डाले।.– शनिवार और अमावस्या को सारे घर की सफाई करें, कबाड़ बाहर निकले और जूते-चप्पलों का दान कर दे।.– स्नान करने के बाद स्नानघर को कभी गंदा न छोड़े।.– जितना हो सके भांजी और भतीजी को कोई न कोई उपहार देते रहे।किसी बुधवार को बुआ को भी चाट या चटपटी वस्तु खिलाएँ।.– घर में भोजन बनते समय गाय और कुत्ते का हिस्सा अवश्य निकाले।.– बुधवार को किसी को भी उधार न दे, वापस नहीं आएगा।.– राहू काल में कोई कार्य शुरू न करें।.– श्री सूक्त का पाठ करने से धन आता रहेगा।.– वर्ष में एक या दो बार घर में किसी पाठ या मंत्रोक्त पूजन को ब्राह्मण द्वारा जरूर कराए।.– स्फटिक का श्रीयंत्र, पारद शिवलिंग, श्वेतार्क गणपति और दक्षिणावर्त शंख को घर या दुकान आदि में स्थापित कर पूजन करने से घर का भण्डार भरा-पूरा रहता है।.– घर के हर सदस्य को अपने-अपने इष्ट का जाप व पूजन अवश्य करना चाहिए।.– जहाँ तक हो सके अन्न, वस्त्र, तेल, कंबल, अध्ययन सामग्री आदि का दान करें।दान करने के बाद उसका उल्लेख न करें।.– अपने राशि या लग्न स्वामी ग्रह के रंग की कोई वस्तु अपने साथ हमेशा रखे।।
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जन्मपत्रिका के फल का प्रतिपादन किया जाए तो वह निश्चित रूप से सटीक होगा। 1) लग्न भाव का स्वामी अर्थात लग्नेश किसी भी भाव में, किसी भी राशि में हो, वह अशुभ फल नहीं देगा। लग्नेश की अशुभता होने पर मन के अनुकूल भले ही फल प्राप्त न हो किन्तु जातक के लिए हानिकारक फल नहीं होंगे। 2) छ्टे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी यदि अशुभ ग्रह हो तो जन्मपत्रिका में जिस भाव में होंगे उस भाव के फलों का नाश ही करेंगे। जबकि इन भावो के स्वामी शुभ ग्रह हो तो शुभ फलों की मात्रा में कमी होगी। 3) केंद्र और त्रिकोण के स्वामी जन्मपत्रिका में जिस भाव में बैठेंगे उसके फलों को शुभत्व प्रदान करेंगे। यही फल उनकी दृष्टि होने पर भी होगा। 4) किसी भी जन्मपत्रिका में गुरु और केतु छठे भाव में होने पर जातक के रोग और शत्रुओं का नाश करते है, जबकि शनि छठे और आठवें भाव में होने पर जातक के आयु में वृद्धि करते है। 5) किसी भी जन्मपत्रिका में पापी ग्रहो का तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में होना जातक के लिए शुभ होता है। क्योंकि तीसरे भाव में स्थित पापी ग्रह जातक को पराक्रमी बनाते है, वहीं छठे भाव में स्थित ग्रह जातक के रोग और शत्रुओ का नाश करते है, इसी प्रकार ग्यारहवें भाव में स्थित ग्रह जातक को धन प्राप्त करवाते है। 7) किसी भी भाव का स्वामी लग्न से, चन्द्र से और स्वयं अपने भाव से यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो शुभ फल प्रदान करता है। जबकि इन तीनो से ही केंद्र या त्रिकोण में न होने पर अशुभ फल प्रदान करता है। फल की मात्रा तीनो के आधार पर नहीं बल्कि भिन्न भिन्न भी जानी जा सकती है। अर्थात मात्र अपने भाव से केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह अच्छा फल प्रदान करेगा, यदि तीनो से ही केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह सर्वाधिक शुभ फल प्रदान करेगा। 8) शनि और राहू जिस भाव में होते है उस भाव के फल सदा विलम्ब से प्राप्त होते है। जैसे सातवें भाव में दोनों में से कोई ग्रह हो तो विवाह विलम्ब से होता है। इसीप्रकार पाँचवे भाव में हो तो संतान विलम्ब से होती है। इसीप्रकार अन्य भाव का फल समझना चाहिये। 9) यदि एक अशुभ स्थान का स्वामी दूसरे अशुभ स्थान में हो तो वह अशुभ फल नही देते। किन्तु ऐसा आयु में भाग्योदय के बाद ही होता है। 10) यदि कोई शुभ ग्रह वक्री होकर अशुभ स्थान में उच्च का होकर बैठ जाए तो वह शुभ ग्रह नीच स्थिति का फल देगा 11)दशम भाव में जिस भाव का स्वामी हो, जातक का भाग्य उसी भाव से सम्बंधित व्यक्ति या उस भाव के कारकत्व के कार्य को अपनाने पर चमकता है। जैसे दशम भाव में तीसरे भाव का स्वामी बैठा हो तो जातक के भाग्योदय में या तो भाई का या स्वयं के पराक्रम का योगदान होगा। तीसरा भाव जातक के भाई-बहन, पराक्रम और शारीरिक अंगो में कान व भुजा से सम्बंधित होता है, अतः इन दोनों अंगो के लिए लाभदायक पदार्थों का व्यापार करने पर जीवन में कभी भी हानि नहीं उठानी पड़ेगी। इसीप्रकार यदि पंचम भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो जातक को मनोरंजन के पदार्थों से अधिक लाभ होगा, और उसके भाग्योदय में उसकी प्रेमिका या संतान का महत्वपूर्ण योगदान होगा। इसीप्रकार अन्य भावो को भी समझना चाहिये। 12) कहने को तो उच्च ग्रह सर्वाधिक शुभ फल देते है, किन्तु उनकी दृष्टि नीच भाव पर भी होती है जिसका वे नाश करते है। अतः जीवन के लिए जितने शुभ उच्च ग्रह होते है उतने ही वे हानिकारक भी होते है। 13) जन्मपत्रिका के जिस भाव में कोई भी ग्रह न हो, या ग्रह तो हो लेकिन उस पर किसी अन्य ग्रह की कोई दृष्टि न हो तो वह भाव या ग्रह सुप्त अवस्था में माना जाता है, जिसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। 14) मिथुन, कन्या, धनु और मीन लग्न के जन्मपत्रिका में बुध और गुरु केंद्राधिपत्य दोष से दूषित होते है अतः इस स्थिति में इन दोनों ग्रहो से शुभ फल के आशा करना व्यर्थ होता है। यद्यपि लग्नेश होने पर ये अशुभ फल नहीं देते है। 15) जिस जन्मपत्रिका में जितने अधिक ग्रह उच्च, स्वराशि या मित्र राशियो में होते है जातक को उतना ही अधिक सुख देते है। इसके विपरीत जितने अधिक ग्रह नीच या शत्रु राशियों में होते है वे जातक को उतना ही अधिक संघर्षपूर्ण जीवन देते है। 16) राहु या केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती है. अतः ये जिस राशि में होते है उसके स्वामी के समान फल देते है और जिस ग्रह के साथ होते है उस ग्रह के गुणों को ग्रहण कर लेते है। 17) किसी भी प्रकार का शुभ या अशुभ ग्रह, स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में जन्मपत्रिका में किसी भी भाव में हों, वे सदा शुभ फल ही देंगे। किन्तु अपने नैसर्गिक लक्षणों के अनुरूप ही फल देंगे। जैसे कि शनि मंदगति व् मति भ्रम का कारक है। अतः अपनी स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में होने पर शुभ फल तो देगा परन्तु अत्यंत धीमी गति से जातक को मति भ्रम कर कितने ही समय तक भटकाने के बाद। इसीप्रकार अन्य ग्रहो का फल समझे।‬: 18) जब कोई ग्रह एक शुभ और एक अशुभ भाव का स्वामी हो तो उसका फल माध्यम हो जाता है। यदि उस ग्रह के साथ कोई शुभ ग्रह हो तो उसमे शुभत्व की मात्रा बढ़ जाती है। साथ ही ऐसी दशा में शुभ ग्रह, शुभ ग्रह की राशि या शुभ ग्रह के भाव में हो तो उसके शुभ फल अधिक प्राप्त होते है। इसके विपरीत अशुभ भाव या राशि में ऐसा ग्रह हो तो अशुभ फल अधिक मात्रा में प्राप्त होते है। जैसे मिथुन लग्न की जन्मपत्रिका में शनि अष्टम और नवम अर्थात एक घोर अशुभ और एक सर्वाधिक शुभ त्रिकोण का स्वामी होता है। ऐसी दशा में शनि यदि केंद्र या त्रिकोण (1, 4, 5, 7, 9, 10) भाव में हो तो जातक को शुभ फल प्राप्त होंगे अन्यथा नहीं। 19) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में लग्नेश की महादशा कभी भी अशुभ फल नहीं देती। 20) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में सूर्य ग्रह और चन्द्र ग्रह चाहे किसी भी भाव में और किसी भी राशि में बैठे हो, कभी भी वे मारक नहीं होते। 21) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में सप्तमेश यदि द्वादश भाव में बैठा हो तो जातक को वैवाहिक सुख या तो होता ही नहीं या न्यून सुख होता है।
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कार्तिक पूर्णिमा , देव दिवाली और त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जानी जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपने पूर्ण कला में होता है। इस शुभ दिन को कई कारणों से बेहद जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा: नवंबर 14, 2016, सोमवारकार्तिक पूर्णिमा को देव दिवाली अथवा त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन कार्तिक मास की पूर्णिमा को होता है। यह दिन बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है और कार्तिक पूर्णिमा से कई कथाएँ जुड़ी हुई हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरा नामक असुर पर विजय प्राप्त की थी। मुख्य रूप से इस दिन भगवान कार्तिकेय के साथ भगवान विष्णु और शिव की पूजा होती है।कार्तिक पूर्णिमा: परंपरायदि हम कार्तिक पूर्णिमा की बात करते हैं तो प्रबोधिनी एकादशी का बड़ा महत्व है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार चतुर्मास के दौरान भगवान विष्णु द्वारा लिए गए निद्रासन से प्रबोधिनी एकादशी के दिन जागृत होते हैं। प्रबोधिनी एकादशी पूरे भारत में कई त्यौहारों के प्रारंभ का प्रतीक है। प्रबोधिनी एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक देश में कई जगहों पर मेले आदि प्रारंभ हो जाते हैं।कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु पवित्र स्नान (कार्तिक स्नान) करते हैं जो कार्तिक पूर्णिमा की पूर्वसंध्या को किया जाता है। कार्तिक स्नान सूर्योदय से पहले एवं सूर्योदय के बाद यानी दो बार किया जाता है। कार्तिक स्नान की संध्या के बाद श्रद्धालु भगवान विष्णु, शिव एवं ब्रहमा जी के साथ अंगिरा ऋषि, सूर्य एवं कार्तिकेय की आराधना करते हैं। इस दिन सत्य नारायण की कथा कराने का भी बड़ा महत्व है। प्रार्थना आदि के बाद ईश्वर को पवित्र भोजन अन्नकूट का भोग लगाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन हिंसा, दाड़ी, बाल कटाना/बनाना, पेड़ काटना, फल-फूल को तोड़ना, फसल को काटना अथवा शारीरिक संबंध बनाना ठीक नहीं माना जाता है। इस दिन गाय को खिलाना, ब्राह्णणों को दान करना और व्रत धारण करना शुभ माना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्वर्ण दान करना भी पवित्र माना गया है। देव दिपावली के दिन मंदिर में रातभर दीपों को जलाना चाहिए। इस दौरान वाराणसी के सभी मंदिरों, घाट एवं धार्मिक स्थानों की साज सज्जा की जाती है। कहा जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन 360 दीपक जलाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। दरअस्ल 360 दीपक 360 दिन के प्रतीक माने गए हैं। इस दिन दीयों को साधुओं को दिया जाता हैं अथवा उनको जल में प्रवाह किया जाता है। यह दिन कार्तिक दीपरत्न के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि प्रज्जवलित दीपक का तेज एक रत्न के समान होता है। ऐसा कहा जाता है कि इन पवित्र जलते हुए दीयों को देखकर पशु-पक्षी एवं अन्य जीव जंतु इस नैतिक संसार से ख़ुद को आज़ाद महसूस करते हैं।कार्तिक पूर्णिमा: इस दिन होने वाली अन्य घटनाएँकार्तिक पूर्णिमा को मतस्य (मछली) के जन्मदिन के रूप में जानते हैं जो भगवान विष्णु जी के अवतार हैं। इस दिन भगवान विष्णु ने एक मछली के रूप में जन्म लिया था। भगवान कार्तिकेय (भगवान शिव के पुत्र) का जन्म भी मतस्य के साथ हुआ था। वहीं वंदा जो कि तुलसी का अवतार थीं का जन्म भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। श्रद्धालुओं के लिए कार्तिक पूर्णिमा का दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा को लेकर भी बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन राधा जी के साथ रासलीला रचाई थी।इन घटनाओं के अलावा कार्तिक पूर्णिमा हमारे पूर्वजों यानी पितृ पूजन के लिए भी महत्वपूर्ण है।मृत्युंजय हवनयद्यपि इस दिन महामृत्युंजय हवन किया जाता है, लेकिन वास्तव में यह कोई धार्मिक प्रक्रिया नहीं है। हवन का प्रारंभ हवनकुंड में अग्नि जलाकर किया जाता है। जैसे ही मंत्र को दोहराया जाता है वैसे ही हवनकुंड में घी डाला जाता है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।महामृत्युंजय मंत्र ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् ।उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माम्रतात् ।।मृत्युंजय हवन को समाप्त करने के बाद 108 बार ‘ॐ स्वाहा’ का जाप करें।
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