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कार्तिक पूर्णिमा , देव दिवाली और त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जानी जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपने पूर्ण कला में होता है। इस शुभ दिन को कई कारणों से बेहद जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा: नवंबर 14, 2016, सोमवारकार्तिक पूर्णिमा को देव दिवाली अथवा त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन कार्तिक मास की पूर्णिमा को होता है। यह दिन बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है और कार्तिक पूर्णिमा से कई कथाएँ जुड़ी हुई हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरा नामक असुर पर विजय प्राप्त की थी। मुख्य रूप से इस दिन भगवान कार्तिकेय के साथ भगवान विष्णु और शिव की पूजा होती है।कार्तिक पूर्णिमा: परंपरायदि हम कार्तिक पूर्णिमा की बात करते हैं तो प्रबोधिनी एकादशी का बड़ा महत्व है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार चतुर्मास के दौरान भगवान विष्णु द्वारा लिए गए निद्रासन से प्रबोधिनी एकादशी के दिन जागृत होते हैं। प्रबोधिनी एकादशी पूरे भारत में कई त्यौहारों के प्रारंभ का प्रतीक है। प्रबोधिनी एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक देश में कई जगहों पर मेले आदि प्रारंभ हो जाते हैं।कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु पवित्र स्नान (कार्तिक स्नान) करते हैं जो कार्तिक पूर्णिमा की पूर्वसंध्या को किया जाता है। कार्तिक स्नान सूर्योदय से पहले एवं सूर्योदय के बाद यानी दो बार किया जाता है। कार्तिक स्नान की संध्या के बाद श्रद्धालु भगवान विष्णु, शिव एवं ब्रहमा जी के साथ अंगिरा ऋषि, सूर्य एवं कार्तिकेय की आराधना करते हैं। इस दिन सत्य नारायण की कथा कराने का भी बड़ा महत्व है। प्रार्थना आदि के बाद ईश्वर को पवित्र भोजन अन्नकूट का भोग लगाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन हिंसा, दाड़ी, बाल कटाना/बनाना, पेड़ काटना, फल-फूल को तोड़ना, फसल को काटना अथवा शारीरिक संबंध बनाना ठीक नहीं माना जाता है। इस दिन गाय को खिलाना, ब्राह्णणों को दान करना और व्रत धारण करना शुभ माना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्वर्ण दान करना भी पवित्र माना गया है। देव दिपावली के दिन मंदिर में रातभर दीपों को जलाना चाहिए। इस दौरान वाराणसी के सभी मंदिरों, घाट एवं धार्मिक स्थानों की साज सज्जा की जाती है। कहा जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन 360 दीपक जलाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। दरअस्ल 360 दीपक 360 दिन के प्रतीक माने गए हैं। इस दिन दीयों को साधुओं को दिया जाता हैं अथवा उनको जल में प्रवाह किया जाता है। यह दिन कार्तिक दीपरत्न के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि प्रज्जवलित दीपक का तेज एक रत्न के समान होता है। ऐसा कहा जाता है कि इन पवित्र जलते हुए दीयों को देखकर पशु-पक्षी एवं अन्य जीव जंतु इस नैतिक संसार से ख़ुद को आज़ाद महसूस करते हैं।कार्तिक पूर्णिमा: इस दिन होने वाली अन्य घटनाएँकार्तिक पूर्णिमा को मतस्य (मछली) के जन्मदिन के रूप में जानते हैं जो भगवान विष्णु जी के अवतार हैं। इस दिन भगवान विष्णु ने एक मछली के रूप में जन्म लिया था। भगवान कार्तिकेय (भगवान शिव के पुत्र) का जन्म भी मतस्य के साथ हुआ था। वहीं वंदा जो कि तुलसी का अवतार थीं का जन्म भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। श्रद्धालुओं के लिए कार्तिक पूर्णिमा का दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा को लेकर भी बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन राधा जी के साथ रासलीला रचाई थी।इन घटनाओं के अलावा कार्तिक पूर्णिमा हमारे पूर्वजों यानी पितृ पूजन के लिए भी महत्वपूर्ण है।मृत्युंजय हवनयद्यपि इस दिन महामृत्युंजय हवन किया जाता है, लेकिन वास्तव में यह कोई धार्मिक प्रक्रिया नहीं है। हवन का प्रारंभ हवनकुंड में अग्नि जलाकर किया जाता है। जैसे ही मंत्र को दोहराया जाता है वैसे ही हवनकुंड में घी डाला जाता है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।महामृत्युंजय मंत्र ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् ।उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माम्रतात् ।।मृत्युंजय हवन को समाप्त करने के बाद 108 बार ‘ॐ स्वाहा’ का जाप करें।
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जन्मपत्रिका के फल का प्रतिपादन किया जाए तो वह निश्चित रूप से सटीक होगा। 1) लग्न भाव का स्वामी अर्थात लग्नेश किसी भी भाव में, किसी भी राशि में हो, वह अशुभ फल नहीं देगा। लग्नेश की अशुभता होने पर मन के अनुकूल भले ही फल प्राप्त न हो किन्तु जातक के लिए हानिकारक फल नहीं होंगे। 2) छ्टे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी यदि अशुभ ग्रह हो तो जन्मपत्रिका में जिस भाव में होंगे उस भाव के फलों का नाश ही करेंगे। जबकि इन भावो के स्वामी शुभ ग्रह हो तो शुभ फलों की मात्रा में कमी होगी। 3) केंद्र और त्रिकोण के स्वामी जन्मपत्रिका में जिस भाव में बैठेंगे उसके फलों को शुभत्व प्रदान करेंगे। यही फल उनकी दृष्टि होने पर भी होगा। 4) किसी भी जन्मपत्रिका में गुरु और केतु छठे भाव में होने पर जातक के रोग और शत्रुओं का नाश करते है, जबकि शनि छठे और आठवें भाव में होने पर जातक के आयु में वृद्धि करते है। 5) किसी भी जन्मपत्रिका में पापी ग्रहो का तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में होना जातक के लिए शुभ होता है। क्योंकि तीसरे भाव में स्थित पापी ग्रह जातक को पराक्रमी बनाते है, वहीं छठे भाव में स्थित ग्रह जातक के रोग और शत्रुओ का नाश करते है, इसी प्रकार ग्यारहवें भाव में स्थित ग्रह जातक को धन प्राप्त करवाते है। 7) किसी भी भाव का स्वामी लग्न से, चन्द्र से और स्वयं अपने भाव से यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो शुभ फल प्रदान करता है। जबकि इन तीनो से ही केंद्र या त्रिकोण में न होने पर अशुभ फल प्रदान करता है। फल की मात्रा तीनो के आधार पर नहीं बल्कि भिन्न भिन्न भी जानी जा सकती है। अर्थात मात्र अपने भाव से केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह अच्छा फल प्रदान करेगा, यदि तीनो से ही केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह सर्वाधिक शुभ फल प्रदान करेगा। 8) शनि और राहू जिस भाव में होते है उस भाव के फल सदा विलम्ब से प्राप्त होते है। जैसे सातवें भाव में दोनों में से कोई ग्रह हो तो विवाह विलम्ब से होता है। इसीप्रकार पाँचवे भाव में हो तो संतान विलम्ब से होती है। इसीप्रकार अन्य भाव का फल समझना चाहिये। 9) यदि एक अशुभ स्थान का स्वामी दूसरे अशुभ स्थान में हो तो वह अशुभ फल नही देते। किन्तु ऐसा आयु में भाग्योदय के बाद ही होता है। 10) यदि कोई शुभ ग्रह वक्री होकर अशुभ स्थान में उच्च का होकर बैठ जाए तो वह शुभ ग्रह नीच स्थिति का फल देगा 11)दशम भाव में जिस भाव का स्वामी हो, जातक का भाग्य उसी भाव से सम्बंधित व्यक्ति या उस भाव के कारकत्व के कार्य को अपनाने पर चमकता है। जैसे दशम भाव में तीसरे भाव का स्वामी बैठा हो तो जातक के भाग्योदय में या तो भाई का या स्वयं के पराक्रम का योगदान होगा। तीसरा भाव जातक के भाई-बहन, पराक्रम और शारीरिक अंगो में कान व भुजा से सम्बंधित होता है, अतः इन दोनों अंगो के लिए लाभदायक पदार्थों का व्यापार करने पर जीवन में कभी भी हानि नहीं उठानी पड़ेगी। इसीप्रकार यदि पंचम भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो जातक को मनोरंजन के पदार्थों से अधिक लाभ होगा, और उसके भाग्योदय में उसकी प्रेमिका या संतान का महत्वपूर्ण योगदान होगा। इसीप्रकार अन्य भावो को भी समझना चाहिये। 12) कहने को तो उच्च ग्रह सर्वाधिक शुभ फल देते है, किन्तु उनकी दृष्टि नीच भाव पर भी होती है जिसका वे नाश करते है। अतः जीवन के लिए जितने शुभ उच्च ग्रह होते है उतने ही वे हानिकारक भी होते है। 13) जन्मपत्रिका के जिस भाव में कोई भी ग्रह न हो, या ग्रह तो हो लेकिन उस पर किसी अन्य ग्रह की कोई दृष्टि न हो तो वह भाव या ग्रह सुप्त अवस्था में माना जाता है, जिसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। 14) मिथुन, कन्या, धनु और मीन लग्न के जन्मपत्रिका में बुध और गुरु केंद्राधिपत्य दोष से दूषित होते है अतः इस स्थिति में इन दोनों ग्रहो से शुभ फल के आशा करना व्यर्थ होता है। यद्यपि लग्नेश होने पर ये अशुभ फल नहीं देते है। 15) जिस जन्मपत्रिका में जितने अधिक ग्रह उच्च, स्वराशि या मित्र राशियो में होते है जातक को उतना ही अधिक सुख देते है। इसके विपरीत जितने अधिक ग्रह नीच या शत्रु राशियों में होते है वे जातक को उतना ही अधिक संघर्षपूर्ण जीवन देते है। 16) राहु या केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती है. अतः ये जिस राशि में होते है उसके स्वामी के समान फल देते है और जिस ग्रह के साथ होते है उस ग्रह के गुणों को ग्रहण कर लेते है। 17) किसी भी प्रकार का शुभ या अशुभ ग्रह, स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में जन्मपत्रिका में किसी भी भाव में हों, वे सदा शुभ फल ही देंगे। किन्तु अपने नैसर्गिक लक्षणों के अनुरूप ही फल देंगे। जैसे कि शनि मंदगति व् मति भ्रम का कारक है। अतः अपनी स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में होने पर शुभ फल तो देगा परन्तु अत्यंत धीमी गति से जातक को मति भ्रम कर कितने ही समय तक भटकाने के बाद। इसीप्रकार अन्य ग्रहो का फल समझे।‬: 18) जब कोई ग्रह एक शुभ और एक अशुभ भाव का स्वामी हो तो उसका फल माध्यम हो जाता है। यदि उस ग्रह के साथ कोई शुभ ग्रह हो तो उसमे शुभत्व की मात्रा बढ़ जाती है। साथ ही ऐसी दशा में शुभ ग्रह, शुभ ग्रह की राशि या शुभ ग्रह के भाव में हो तो उसके शुभ फल अधिक प्राप्त होते है। इसके विपरीत अशुभ भाव या राशि में ऐसा ग्रह हो तो अशुभ फल अधिक मात्रा में प्राप्त होते है। जैसे मिथुन लग्न की जन्मपत्रिका में शनि अष्टम और नवम अर्थात एक घोर अशुभ और एक सर्वाधिक शुभ त्रिकोण का स्वामी होता है। ऐसी दशा में शनि यदि केंद्र या त्रिकोण (1, 4, 5, 7, 9, 10) भाव में हो तो जातक को शुभ फल प्राप्त होंगे अन्यथा नहीं। 19) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में लग्नेश की महादशा कभी भी अशुभ फल नहीं देती। 20) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में सूर्य ग्रह और चन्द्र ग्रह चाहे किसी भी भाव में और किसी भी राशि में बैठे हो, कभी भी वे मारक नहीं होते। 21) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में सप्तमेश यदि द्वादश भाव में बैठा हो तो जातक को वैवाहिक सुख या तो होता ही नहीं या न्यून सुख होता है।
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👹डाकिनी मन्त्र साधना👹यह साधना अत्यंत प्राचीन है।इस साधना को करने का अधिकार तामसिक साधक को है अर्थात जो माँस मदिरा का सेवन करते हैं।सिद्ध होने पर इनके माध्यम से साधक किसी भी कार्य को सुगमता पूर्वक कर सकते है।यह क्षण मात्र में कार्य करती है।स्त्री वशीकरण, पुरुष वशीकरण, समाज के रावण, सूर्पनखाजैसे दुष्ट लोगो को दण्डित भी करती है।कार्यालयों में रुके हुए कार्य, प्रॉपर्टी के कार्य आदि को भी सुगमता से सम्पन कर देती है।।यह साधना श्मशान के किनारे, सुनसान खण्डर, कुँए अथवा बावड़ी के पास , वीराने जंगल में सिद्ध की जाती है।यह साधना मन्त्र आपको किसी भी पुस्तक से प्राप्त हो सकता है किन्तु सिद्धि विधान आपको इस पोस्ट के माध्यम से , हमारे सानिद्ध्य में अथवा किसी सिद्ध गुरु से ही प्राप्त होगा।पोस्ट में जैसी विधि कही गयी है वैसे ही करे, , तो साधक को डाकिनी सिद्ध हो जायेगी।डाकिनी का मन्त्र जाप बन्द आँखों से किया जाता है और साधना के मध्याह्म में एक बार आँख खोलकर पीली सरसों को मन्त्र से अभिमन्त्रित करके अपने चारो दिशाओ में फेंका जाता है फिर उसके बाद मन्त्र जाप किया जाता है।यह क्रिया 41 दिन करनी होती है।डाकिनी साधक के बन्द आँखों में दिखाई देती है अर्थात साधना के अंतिम दिन प्रकट होती है।कभी कभी साधक को आवाज भी देती है किन्तु डरे नही और अपने सामने रखे माँस मदिरा का भोग डाकिनी को दे, इससे वह संतुष्ट होती है और साधक को वचन देती है उसके सभी कार्य करने का और बदले में अपना भोग ग्रहण करती है।इसकी शक्ति कर्ण वैताली से ज्यादा होती है अर्थात इसमें 1000 प्रेत आत्माओ की शक्ति होती है।यह सभी भूत प्रेतों, जिन्नों, हमजादो आदि को मारकर अपने साथ ले जाती है।इसमें साधक जब भी कार्य की इच्छा करता है तुरुन्त करती है।साधक को यह बन्द आँखों में ही दिखाई देगी।1 कुशासन या बकरे या भैंसे का चर्म आसन2 बकरे की चर्बी का चिराग3 मिट्टी के वर्तन में 125 ग्राम बकरे की कलेजी अथवा माँस4 मिटटी के प्याले में सुगन्ध वाली मदिरा5 पीली सरसो 5 ग्राम रोज6 चमेली की धूप या अगरबत्ती7 निर्वस्त्र साधना करे।8 रुद्राक्ष की माला शुद्ध9 सिंदूर का तिलक अनिवार्य10 मन्त्र जाप दाहिने हाथ की ऊँगली मध्यमा और अंगूठा ।11 अमावस्या के दिन या पूर्णिमा के दिन से करे।12 दिशा उत्तर13 पवित्रीकरण, वास्तुदोष पूजन, गुरुमन्त्र, सुरक्षा मन्त्र करे।14 41 दिन की सिद्धि का संकल्प ले।15 10 माला जप करने के बाद पीली सरसों को दाहिने हाथ में रखकर 1 बार मन्त्र बोलकर फूंके और चारो दिशाओ में फ़ेंक दे फिर पुनः 11 माला मन्त्र जाप करे।16 डाकिनी जब भी साधक को आवाज दे तो साधक वचन लेकर डाकिनी सिद्ध करे।17 मन्त्र जाप बन्द आँखों से होगा।ताम्र कलश जल से भरकर रखे।18 साधना कॉल में मांस मंदिरा का सेवन एक समय करे।19 यह सिद्धि रात्रि 12 बजे से शुरू करे और सूर्यास्त से पहले पूरी 21 माला करे।20 साधक का साधना स्थल देव मन्दिरो आदि से 200 मीटर की दूरी पर हो।साधना स्थल पर किसी भी देवी देवता की मूर्ति नही होनी चाहिये।21 यह सिद्धि बाममार्गी है।22 41 वे दिन बंद आँखों में डाकिनी काली सी औरत की तरह खुले वालो वाली निर्वस्त्र दिखाई देगी तभी साधक समझ जाय की डाकिनी सिद्ध हो गयी है और भोग अर्पण करे।मांस मदिरा रोज साधना स्थल पर खुला छोड़ दे और सो जाये। 4 बजे तक साधना पूर्ण कर ले और जमीन पर माँस मदिरा डाल कर सो जाय।23 साधना काल में अनेक भयंकर आवाजे आती है यह आवाजे आत्माओ, प्रेतों, भूतो चुड़ैलों आदि इतर योनियों की होती है जो साधक इसको सिद्ध करते है उनको चाहिये की जब उनकी सभी आवश्यकताएं पूरी हो जाय तो इस सिद्धि का विसर्जन कर दे इसमें साधक को हमें अपना नाम माता , पिता का नाम फ़ोटो वर्तमान एड्रेस भेजे , तब दिव्य शक्ति प्रयोग से डाकिनी का संहार रात्रि काल में कर दिया जाता है और साधक को उस समय शरीर में एक झटका लगता है जिस समय डाकिनी का वध कर उसको डाकिनी योनि से मुक्त कर पुनर्जन्म हेतु विष्णुलोक भेज दिया जाता है।इससे साधक डाकिनी से मुक्ति पा लेता है और दूसरा डाकिनी को भी मुक्ति मिल जाती है तीसरा साधक जन भलाई करता है चौथा साधक के पास अतुल धन सम्पदा हो जाती है, जो साधक की आने वाली पीढ़ियों के लिये भी पर्याप्त होती है।( जिन साधको को कई कई साल बीत चुके है और उनको सिद्धियां प्राप्त नही हुयी है और ऐसे साधक जो गुरुओ को निरंतर बदलते रहते है, संपर्क कर सकते है, उनको प्रथम बार में सिद्धि सिद्ध करायी जा सकती है, धनलोभी साधक संपर्क न करे।)मन्त्रॐ स्यार की खवासिनी समन्दर पार धाईआव बैठी हो तो आवठाडी हो तो ठाडी आवजलती आ उछलती आन आये डाकिनी तो जालंधर पीर की आनशब्द साँचापिण्ड काँचाफुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ।
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✡ज्योतिष वास्तु संस्कार✡ ग्रुप की सादर भेंटShiv Shakti jyotish 9425964795🕉🕉🕎🕉🕉indoreक्या होता हैं तांत्रिक प्रयोग आज का विषय क्या होता हैं उच्चाटन➰〰➰〰➰〰➰दोस्तो, नमस्कार , मैं हंस जैन खण्डवा मध्प्रदेश से आज आपके लिये तंत्र विद्या की एक और जानकारी लाया हूं । वैसे मैं कोई तांत्रिक नही हूं, न ही तान्त्रिक क्रिया करता हूं । पर समस्या आने पर उसका उपचार जरूरी होता हैं इसलिये हर विषय की जानकारी जीवन मैं आबश्यक होती है, इसलिये अवगत करा रहा हूं। जिंदगी मैं कई प्रकार की समस्या होती है, कुछ समस्याओं के हल हम आसपास , दोस्तो आदि की सलाह से प्राप्त कर लेते । पर कई समस्या ऐसी भी होती है जिनका हल हर मुश्किल मैं नही निकल पाता । कई इंसान इस तरह के होते हैं जो सबके लिये कुछ न कुछ सेवा करते रहते हैं, सबके लिये समर्पित रहते हैं । पर जब उनका समय आता हैं तो कोई उनका साथ नही देता । खैर तन्त्र विद्या ईश्वर ने हमे हमारी बुराई और अपने और अपनों के जीवन मे आने वाली बाधाओं को दूर करने हेतु बनाई या मार्गदर्शित की है।लेकिन हम आप या कुछ अज्ञानी तांत्रिक इनका प्रयोग गलत रूप मैं करते हैं । दरअसल तन्त्र एक ऐसी विधा है जिसके सही प्रयोग और सही मार्गदर्शन से हम कम समय मैं अधिक उपलब्धि हासिल कर सकते हैं। पर उसके लिये उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता जरूरी है । जैसे आपको कोई समस्या आती है, या आपके जीवन मैं कोई ग्रहदशा खराब आई है तो सामान्य रूप से एक ज्योतिष आपको कुछ वस्तु दान देने हेतु निर्देशित करता है, लेकिन उसने शायद ये नही बताया कि किस वस्तु का दान कब करना, और किसको दान करना, किस समय दान करना। वैसे दान का कोई समय नही होता , पर किसी विशेष ग्रह की शांति हेतु विशेष समय होता हैं । जैसे आपको सूर्य देव को जल से अर्घ्य देना तो शाम 4 बजे थोड़े ही दोगे । एक समय सुबह का निर्धारित है । चलिये उच्चाटन के बारे में समझाता हूं । पहले सकारात्मक पहलू की बात करता हूं । उच्चाटन का मतलब किसी इंसान को उस जगह से उच्चाटीत करना या हटाना जो उसकी नही हो या उस जगह वो जबरन कब्जा किया बैठा हो, या उसकी आसक्ति उस जगह हो गयी हो। कोई ऐसे सम्बन्ध का इच्छुक हो जिससे पारिवारिक मान-मर्यादा , सस्कार का उल्लंघन हो रहा हो , , कोई किसी पर अनावश्यक आसक्त हो , कोई किसी को अकारण परेशान कर रहा हो , किसी से किसी की दुरी बनाने की आवश्यकता हो , किसी का मन किसी के प्रति उचाटना हो , , किसी पर किसी बाहरी हवा आदि का प्रभाव हो उसे उचाटना हो , बुरे ग्रहों के प्रभाव का उच्चाटन करना हो , ग्रह प्रतिकूलता का उच्चाटन करना हो , दरिद्रता -अशांति-कलह का उच्चाटन करना हो , हटाना हो , , किसी ने किसी की संपत्ति पर कब्जा कर रखा हो और न हट रहा हो , उसका मन उस संपत्ति से उच्चाटित करना हो , आदि आदि समस्याए हो तो उच्चाटन का प्रयोग बेहद लाभदायक हो सकता है | अब इसका जो नकारात्मक पहलू ये हैं कि कभी आपने ये देखा होगा कि एक व्यापारी की दुकान बहूत अच्छी चल रही, दिन रात मेहनत करके जीवन की ऊँचाई हासिल की , कोई उसकी तरक्की से जल रहा या उस दुकान को खरीदना चाहता व्यापारी नही बेचना चाहता। अचानक कुछ दिनों से उस व्यापारी का मन दुकान जाने का नही करे, या जब भी वो दुकान पर जाए, तो अजीब सा महसूस करे, थकान सी आये, घबराहट सी होने लगे, मन बैचेन होने लगे, और परिणाम कुछ दिनों बाद दुकान बंद करना पड़े । आमभाषा मैं हम ये समझेंगे की तबीयत खराब होने की वजह से ये समस्या आ रही है, लेकिन किसी तांत्रिक ने दुकान के बाहर उच्चाटन प्रयोग कर आपकी दुकान से आपको बेदखल करने की पूरी तैयारी कर ली है। इस प्रयोग के बाद आपसे आपकी करोडो की दुकान चंद लाख रूपयो मैं कोई खरीद लेता है । एक और उदाहरण आपका एक मौके की जगह प्लाट हैं, हर कोई मुँहमाँगा कीमत पर खरीदने हेतु तैयार हैं, पर आपने उस जगह मकान बना लिया, परिवार सहित शिफ्ट हो गए। लेकिन कुछ समय बाद उस घर मे रहने पर सभी विचलित हो गए, अजीब से ख्याल, मन नही लगता, रात को सो नही पा रहे, घर आते ही भाग जाने या बाहर जाने का मन होता । जब तक आप बाहर रहते खुश रहते पर घर मैं प्रवेश करते ही चिड़चिड़े हो जाते । आखिर उस मकान को प्लाट की कीमत से भी कम कीमत मैं बेच कर चले जाते । कई लोग इस विद्या के शिकार हुए हैं । इस विद्या मैं भी आपके घर मैं अभिमंत्रित करके कोई ऐसी वस्तु फेंक दी जाती है जिसके बाद घर से आपका उच्चाटन या यूं कहिये की मोह भंग हो जाता हैं । क्या करे जब ऐसी स्थिति हो? क्या उच्चाटन से बचा जा सकता । कल जानते हैं । आज का उपाय🔯🔯✡🔯🔯✡🔯 जब आपको घर मैं नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश लगे, या घर मैं आते ही घर के सदस्य चिड़चिड़ापन करे तो ऐसी स्थिति मे घर से नेगेटिव शक्ति को हटाने के लिये नल के आम पानी मैं 2 बून्द किसी पवित्र नदी का जल , 2 बून्द गौ मित्र मिलाकर एक कटोरी मे भर लें और इसे 3 से 4 घंटे तक इससे सूरज की रोशनी में पड़ा रहने दें तब भी ये पानी चार्ज होकर शुद्धिकरण के लिए तैयार है कटोरी को हाथ में लेकर ईश्वर से प्रार्थना करते हुये घर की नकारात्मक वायु का अंत हो ऐसा सोचे तथा शुद्धिकरण के लिए ताज़ा आम या अशोक पत्तियों से आप सारे घर में इस जल के छींटे दे। इस प्रयोग को लगातार 1 सप्तहा तक करे , फिर सप्तहा मैं एक बार और खास तौर पर हर माह की संक्राति पर जो प्रतिमाह 14 से 16 तारीख़ के बीच आती है अवश्य करें ।
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श्री यन्त्र की महिमा श्री यन्त्र को यंत्र शिरोमणि श्रीयंत्र, श्रीचक्र व त्रैलोक्यमोहन चक्र भी कहते हैं । धन त्रयोदशी और दीपावली को यंत्रराज श्रीयंत्र की पूजा का अति विशिष्ट महत्व है । श्री यंत्र या श्री चक्र सारे जगत को वैदिक सनातन धर्म, अध्यात्म की एक अनुपम और सर्वश्रेष्ठ देन है। इसकी उपासना से जीवन के हर स्तर पर लाभ का अर्जन किया जा सकता है, इसके नव आवरण पूजन के मंत्रों से यही तथ्य उजागर होता है।मूल रूप में श्रीयन्त्र नौ यन्त्रों से मिलकर एक बना है , इन नौ यन्त्रों को ही हम श्रीयन्त्र के नव आवरण के रूप में जानते हैं, श्री चक्र के नव आवरण निम्नलिखित हैं:-1:- त्रैलोक्य मोहन चक्र- तीनों लोकों को मोहित करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।2:- सर्वाशापूरक चक्र- सभी आशाओं, कामनाओं की पूर्ति करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।3:- सर्व संक्षोभण चक्र- अखिल विश्व को संक्षोभित करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।4:- सर्व सौभाग्यदायक चक्र- सौभाग्य की प्राप्ति, वृद्धि करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।5:- सर्वार्थ सिद्धिप्रद चक्र- सभी प्रकार की अर्थाभिलाषाओं की पूर्ति करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।6:- सर्वरक्षाकर चक्र- सभी प्रकार की बाधाओं से रक्षा करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।7:- सर्वरोगहर चक्र- सभी व्याधियों, रोगों से रक्षा करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।8:- सर्वसिद्धिप्रद चक्र- सभी सिद्धियों की प्राप्ति करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।9:- सर्व आनंदमय चक्र- परमानंद या मोक्ष की प्राप्ति करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।इसके अतिरिक्त श्रीयन्त्र का एक रहस्य ओर है कि श्रीयन्त्र वेदों, कौलाचार व अगमशास्त्रों में उल्लेखित स्वयंसिद्ध भैरवी चक्र या संहार चक्र का ही विस्तृत स्वरूप है , श्रीयन्त्र के क्रमशः 7, 8 व 9 वें (बिंदु, त्रिकोण और अष्टकोण) चक्र ही संयुक्त होकर मूल स्वयंसिद्ध भैरवी चक्र है , व बाहर के अन्य 1 से 6 तक के चक्र उसका सृष्टि व   स्थिति क्रम में विस्तार मात्र है, इसीलिए श्रीचक्र या श्रीयन्त्र का समयाचार, दक्षिणाचार, व कौलाचार सहित अन्य सभी पद्धतियों से पूजन अर्चन किया जाता है !श्रीयंत्र के ये नवचक्र सृष्टि, स्थिति और संहार चक्र के द्योतक हैं । अष्टदल, षोडशदल और भूपुर इन तीन चक्रों को सृष्टि चक्र कहते हैं। अंतर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार स्थिति चक्र कहलाते हैं। बिंदु, त्रिकोण और अष्टकोण को संहार चक्र कहते हैं। श्री श्री ललिता महात्रिपुर सुंदरी श्री लक्ष्मी जी के यंत्रराज श्रीयंत्र के पिंडात्मक और ब्रह्मांडात्मक होने की बात को जो साधक जानता है वह योगीन्द्र होता है । श्रीयंत्र ब्रह्मांड सदृश्य एक अद्भुत यंत्र है जो मानव शरीर स्थित समस्त शक्ति चक्रों का भी यंत्र है। श्रीयंत्र सर्वशक्तिमान होता है। इसकी रचना दैवीय है। अखिल ब्रह्मांड की रचना का यंत्र होने से इसमें संपूर्ण शक्तियां और सिद्धियां विराजमान रहती हैं। स्व शरीर को एवं अखिल ब्रह्मांड को श्रीयंत्र स्वरूप जानना बड़े भारी तप का फल है। इन तीनों की एकता की भावना से शिवत्व की प्राप्ति होती है तथा साधक अपने मूल आत्मस्वरूप को प्राप्त कर लेता है ।श्री यंत्र का आध्यात्मिक स्वरूप पूर्ण विधान से श्री यंत्र का पूजन जो एक बार भी कर ले, वह दिव्य देहधारी हो जाता है। दत्तात्रेय ऋषि एवं दुर्वासा ऋषि ने भी श्री यंत्र को मोक्षदाता माना है। इसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य शरीर की भांति, श्री यंत्र में भी 9 चक्र होते हैं। * पहला चक्र मनुष्य शरीर में मूलाधार चक्र होता है। शरीर में यह रीढ़ की हड्डी के सबसे नीचे के भाग में, गुदा और लिंग के मध्य में है। श्री यंत्र में यह अष्ट दल होता है। यह रक्त वर्ण पृथ्वी तत्व का द्योतक है। इसके देव ब्रह्मा हैं * दुसरा चक्र  स्वाधिष्ठान चक्र  यह लिंग स्थान के सामने है।  श्री यंत्र में इसकी स्थिति चतुर्दशार चक्र में बनी होती है। यह जल तत्व का द्योतक है। इसके देव विष्णु भगवान हैं। * तीसरा चक्र मणीपुर चक्र यह नाभी के पीछे मेरु दंड के अंदर होता है। यह दश दल का होता है। श्री यंत्र में यह त्रिकोण है और अग्नि तत्व का द्योतक होता है। यंत्र के देव बुद्ध रुद्र माने गये हैं।* चौथा चक्रअनाहत चक्र होता है। मनुष्य शरीर में यह हृदय के सामने होता है। यह द्वादश दल का है। श्री यंत्र में यह अंतर्दशार चक्र कहा जाता है। यह वायु तत्व का द्योतक माना जाता है। इसके देव ईशान रुद्र माने गये हैं। * पांचवां चक्र विशुद्ध चक्र होता है। मनुष्य शरीर में यह कंठ में होता है। यह 16 दल का है। श्री यंत्र में यह अष्टकोण होता है। यह आकाश तत्व का द्योतक माना गया है। इसके देव भगवान शिव माने जाते हैं। .* छठा चक्र आज्ञा चक्र होताहै। मनुष्य शरीर में यह मेरुदंड  लँबिका स्थान ( दोनो भौओ के मध्य ) में माना गया है। यह 2 दलों का है।
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