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🕉🙏💎💎💎🙏🕉*💑 नाडी दोष देख मिलाकर करें विवाह, वरना 36 गुण मिलने पर भी होगा तलाक. शिव शक्ति ज्योतिष 97555555085 *🗣मेरे मतानुसार यदि नाडी दोष पर ध्यान नही दिया जाय तो यह जरुर ध्यान दे अपने होने वाले भावी वर व वधु की सफल जीवन यात्रा के लिय वरना बहुत ही कष्टमय नारकीय जीवन हो सकता है बिताना पढे|**🗣विवाह मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है। इस संस्कार मे बंधने से पूर्व वर एवं कन्या के जन्म नामानुसार...**💑विवाह मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है।**🗣इस संस्कार मे बंधने से पूर्व वर एवं कन्या के जन्म नामानुसार गुण मिलान करके की परिपाटी है।* *गुण मिलान नहीं होने पर सर्वगुण सम्पन्न कन्या भी अच्छी जीवनसाथी सिद्ध नहीं होगी। गुण मिलाने हेतू मुख्य रूप से अष्टकूटों का मिलान किया जाता है। ये अष्टकूट है, वर्ण, वश्य, तारा, योनी, ग्रहमैत्री, गण, राशि, नाड़ी।**विवाह के लिए भावी वर-वधू की जन्म-कुंडली मिलान करते नक्षत्र मेलापक के अष्टकूटों (जिन्हे गुण मिलान भी कहा जाता है) में नाडी को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।**नाड़ी जो कि व्यक्ति के मन एवं मानसिक ऊर्जा की सूचक होती है। व्यक्ति के निजी सम्बंध उसके मन एवं उसकी भावना से नियंत्रित होते हैं, जिन दो व्यक्तियों में भावनात्मक समानता, या प्रतिद्वंदिता होती है, उनके संबंधों में ट्कराव पाया जाता ह जैसे शरीर के वात, पित्त एवं कफ इन तीन प्रकार के दोषों की जानकारी कलाई पर चलने वाली नाड़ियों से प्राप्त की जाती है, उसी प्रकार अपरिचित व्यक्तियों के भावनात्मक लगाव की जानकारी आदि, मध्य एवं अंत्य नाम की इन तीन प्रकार की नाड़ियों के द्वारा मिलती है।**वैदिक ज्योतिष अनुसार आदि, मध्य तथा अंत्य- ये तीन नाड़ियां यथाक्रमेण आवेग, उद्वेग एवं संवेग की सूचक हैं, जिनसे कि संकल्प, विकल्प एवं प्रतिक्रिया जन्म लेती है। मानवीय मन भी कुल मिलाकर संकल्प, विकल्प या प्रतिक्रिया ही करता है और व्यक्ति की मनोदशा का मूल्यांकन उसके आवेग, उद्वेग या संवेग के द्वारा होता है।**इस प्रकार मेलापक में नाड़ी के माध्यम से भावी दम्पती की मानसिकता, मनोदशा का मूल्यांकन किया जाता है।* *वैदिक ज्योतिष के मेलापक प्रकरण में गणदोष, भकूटदोष एवं नाड़ी दोष- इन तीनों को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है।* *यह *इस बात से भी स्पष्ट है कि ये तीनों कुल 36 गुणों में से (6+7+8=21) कुल 21* *गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं और शेष पांचों कूट (वर्ण, वश्य, तारा, योनि एवं ग्रह मैत्री) कुल मिलाकर* *(1+2+3+4+5=15) 15 गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अकेली नाड़ी के 8 गुण होते हैं, जो वर्ण, वश्य आदि 8 कूटों की तुलना में सर्वाधिक हैं, इसलिए मेलापक में नाड़ी दोष एक महादोष माना गया है।**👉🏿नाड़ी दोष :- 👇🏿**👆🏿👆🏿👇🏿👇🏿🙏**👉🏿नाड़ी दोष होने पर यदि अधिक गुण प्राप्त हो रहें हो तो भी गुण मिलान को सही माना जा सकता, अन्यथा उनमें व्यभिचार का दोष पैदा होने की सभांवना रहती है। मध्य नाड़ी को पित स्वभाव की मानी गई है। इस लिए मध्य नाड़ी के वर का विवाह मध्य नाड़ी की कन्या से हो जाए तो उनमे परस्पर अंह के कारण सम्बंन्ध अच्छे नहीं बन पाते। उनमें विकर्षण कि सभांवना बनती है। परस्पर लड़ाई -झगड़े होकर तलाक की नौबत आ जाती है। विवाह के पश्चात् संतान सुख कम मिलता है। गर्भपात की समस्या ज्यादा बनती है।**अन्त्य नाड़ी को कफ स्वभाव की मानी इस प्रकार की स्थिति मे प्रबल नाड़ी दोष होने के कारण विवाह करते समय अवश्य ध्यान रखें, जिस प्रकार वात प्रकृ्ति के व्यक्ति के लिए वात नाड़ी चलने पर, वात गुण वाले पदार्थों का सेवन एवं वातावरण वर्जित होता है, अथवा कफ प्रकृ्ति के व्यक्ति के लिए कफ नाड़ी के चलने पर कफ प्रधान पदार्थों का सेवन एवं ठंडा वातावरण हानिकारक होता है, ठीक उसी प्रकार मेलापक में वर-वधू की एक समान नाड़ी का होना, उनके मानसिक और* *भावनात्मकताल-मेल में हानिकारक होने के कारण वर्जित किया जाता है।**तात्पर्य यह है कि लड़का- लड़की की एक समान नाड़ियां हों तो उनका विवाह नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनकी मानसिकता के कारण, उनमें आपसी सामंजस्य होने की संभावना न्यूनतम और टकराव की संभावना अधिकतम पाई जाती है, इसलिए मेलापक में आदि नाड़ी के साथ आदि नाड़ी का, मध्य नाड़ी के साथ मध्य का और अंत्य नाड़ी के साथ अंत्य का मेलापक वर्जित होता है।* *जब कि ल़ड़का-लड़की की भिन्न-भिन्न नाड़ी होना उनके दाम्पत्य संबंधों में शुभता का द्योतक है।* *यदि वर एवं कन्या कि नाड़ी अलग-अलग हो तो नाड़ी शुद्धि मानी जाती है। यदि वर एवं कन्या दोनों का जन्म यदि एक ही नाड़ी मे हो तो नाड़ी दोष माना जाता है। सामान्य नाड़ी दोष होने पर ये उपाय दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने का प्रयास कर सकते हैं।**👉🏿1- आदि नाड़ी- अश्विनी, आर्द्रा पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्ता, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पुर्वाभाद्रपद**👉🏿2- मध्य नाड़ी- भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पुर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पुर्वाषाढा, धनिष्ठा, उत्तरासभाद्रपद।**👉🏿3-अन्त्य नाड़ी- कृतिका, रोहिणी, अश्लेशा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढा, श्रवण, रेवती आदि मध्य व अन्त्य नाड़ी का यह विचार सर्वत्र प्रचलित है, लेकिन कुछ स्थानों पर चर्तुनाड़ी एवं पंचनाड़ी चक्रभी प्रचलित है, लेकिन व्यावहारिक रुप से त्रिनाड़ी चक्र ही सर्वथा उपयुक्त जान पड़ता है।**नाड़ी दोष को इतना अधिक महत्व क्यों दिया गया है, इसके बारे मे जानकारी हेतू त्रिनाड़ी स्वभाव की जानकारी होनी आवश्यकत है।आदि नाड़ी वात् स्वभाव की मानी गई है, मध्य नाड़ी पित स्वभाव की मानी गई है, जबकि मध्य नाड़ी पित् प्रति एवं अन्त्य नाड़ी कफ स्वभाव की।* *यदि वर एवं कन्या की नाड़ी एक ही हो तो नाड़ी दोष माना जाता है।* *इसका प्रमुख कारण यही है कि वात् स्वभाव के वर का विवाह यदि वात् स्वभाव की कन्या से हो तो उनमे चंचलता की अधिकता के कारण समर्पण व आकर्षण की भावना विकसित नहीं होती है* *विवाह के पश्चात् उत्पन्न संतान मे भी वात सम्भावना रहती है। इसी आधार पर आद्य नाड़ी वाले वर का विवाह आद्य नाड़ी की कन्या से वर्जित माना गया है, * *अन्यथा उनमें व्याभिचार का दोष पैदा होने की संभावना रहती है।* *मध्य नाड़ी को पित् स्वभाव की मानी गई है, इसलिए मध्य नाड़ी के वर का विवाह मध्य नाड़ी की कन्या से हो जाए तो उनमें परस्पर अहं के कारण सम्बंन्ध अच्छे नहीं बन पाते, उनमें विकर्षण की* *सम्भावना बनती है। परस्पर लड़ाई-झगड़े होकर तलाक की नौबत आ जाती है|**विवाह के पश्चात् संतान सुख कम मिलता है। गर्भपात की समस्या ज्यादा बनती है अन्त्य नाड़ी को कफ स्वभाव की मानी गई है, इसलिए अन्त्य नाड़ी के वर का विवाह यदि अन्त्य नाड़ी की महिला से हो तो उनमें कामभाव की कमी पैदा होने लगती है। शान्त स्वभाव के कारण उनमे परस्पर सामंजस्य का अभाव रहता है। दांपत्य मे गलतफहमी होना भी स्वभाविक होती है। नाड़ी होने पर विवाह न करना ही उचित माना जाता है। लेकिन नाड़ी दोष परिहार की स्थिति में यदि कुण्डली मिलान उत्तम बना रहा है, तो विवाह किया जा सकता है।**👉🏿नाड़ी दोष परिहार :-*👇🏿👇🏿👇🏿☝🏿👆🏿*👉🏿 वर कन्या की एक राशि हो, लेकिन जन्म नक्षत्र अलग-अलग हों या जन्म नक्षत्र एक ही हों परन्तु राशियां अलग हो तो नाड़ी नहीं होता है, यदि जन्म नक्षत्र एक ही हो, लेकिन चरण भेद हो तो अति आवश्यकता अर्थात् सगाई हो गई हो, एक दूसरे को पंसद करते हों तब इस स्थिति मे विवाह किया जा सकता है।**👉🏿 विशाखा, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवति, हस्त, स्वाति, आद्र्रा, पूर्वाभद्रपद इन 8 नक्षत्रों में से किसी नक्षत्र मे वर कन्या का जन्म हो तो नाड़ी दोष नहीं रहता है**👉🏿 उत्तराभाद्रपद, रेवती, रोहिणी, विषाख, आद्र्रा, श्रवण, पुष्य, मघा, इन नक्षत्र में भी वर कन्या का जन्म नक्षत्र पड़े तो नाड़ी दोष नही रहता है। उपरोक्त मत कालिदास का है|**👉🏿 वर एवं कन्या के राशिपति यदि बुध, गुरू, एवं शुक्र में से कोई एक अथवा दोनों के राशिपति एक ही हो तो नाड़ी दोष नहीं रहता है।* *ज्योतिष के अनुसार-नाड़ी दोष विप्र वर्ण पर प्रभावी माना जाता है।* *यदि वर एवं कन्या दोनो जन्म से विप्र हो तो उनमें नाड़ी दोष प्रबल माना जाता है।* *अन्य वर्णो पर नाड़ी पूर्ण प्रभावी नहीं रहता।* *यदि विप्र वर्ण पर नाड़ी दोष प्रभावी माने तो नियम का हनन होता हैं।* *क्योंकि बृहस्पति एवं शुक्र को विप्र वर्ण का माना गया हैं।* *यदि वर कन्या के राशिपति विप्र वर्ण ग्रह हों, तो इसके अनुसार नाड़ी दोष नहीं रहता। विप्र वर्ण की राशियों में भी बुध व शुक्र राशिपति बनते हैं।**👉🏿 सप्तमेश स्वगृही होकर शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तो एवं वर कन्या के जन्म नक्षत्र चरण में भिन्नता हो तो नाड़ी दोष नही रहता है। इन परिहार वचनों के अलावा कुछ प्रबल नाड़ी दोष के योग भी बनते हैं, जिनके होने पर विवाह न करना ही उचित हैं।**यदि वर एवं कन्या की नाड़ी एक हो एवं निम्न में से कोई युग्म वर कन्या का जन्म नक्षत्र हो तो विवाह न करे.**👉🏿 आदि नाड़ी- अश्विनी-ज्येष्ठा, हस्त- शतभिषा, उ.फा.-पू.भा. अर्थात् यदि वर का नक्षत्र अश्विनी हो तो कन्या नक्षत्र ज्येष्ठा होने पर प्रबल नाड़ी दोष होगा। इसी प्रकार कन्या नक्षत्र अश्विनी हो तो वर का नक्षत्र ज्येष्ठा होने पर भी प्रबल नाड़ी दोष होगा। इसी प्रकार आगे के युग्मों से भी अभिप्राय समझें।**👉🏿मध्य नाड़ी - भरणी-* *अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी-**उतराफाल्गुनी, पुष्य-* *पूर्वाषाढा, मृगशिरा-चित्रा, **चित्रा-धनिष्ठा, मृगशिरा-धनिष्ठा।**👉🏿 अन्त्य नाड़ी - कृतिका-विशाखा, रोहिणी-स्वाति, मघा-रेवती; इस प्रकार की स्थिति में प्रबल नाड़ी दोष होने के कारण विवाह करते समय अवश्य ध्यान रखें।**सामान्य नाड़ी दोष होने पर किस प्रकार के उपाय दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने का प्रयासकर सकते है**👉🏿आइए जाने-नाड़ी दोष उपाय*👇🏿👇🏿👇🏿*👉🏿1- वर एवं कन्या दोनों मध्य नाड़ी मे उत्पन्न हो तो पुरुष को प्राण भय रहता है। इसी स्थिति मे पुरुष को महामृत्यंजय जाप करना यदि अतिआवश्यक है। यदि वर एवं कन्या दोनो की नाड़ी आदि या अन्त्य हो तो स्त्री को प्राणभय की सम्भावना रहती है, इसलिए इस स्थिति मे कन्या महामृत्युजय अवश्य करे।**👉🏿2- नाड़ी दोष होने पर संकल्प लेकर किसी ब्राह्यण को गोदान या स्वर्णदान करना चाहिए|* *👉🏿3- अपनी सालगिराह पर अपने वजन के बराबर अन्न दान करें, एवं साथ मे ब्राह्मण भोजन कराकर वस्त्र दान क|**👉🏿4- नाड़ी दोष के प्रभाव को दूर करने के लिए अनुकूल आहार दान करें। अर्थात् आयुर्वेद के मतानुसार जिस दोष की अधिकतम बने उस दोष को दूर करने वाले आहार का सेवन करें**👉🏿5- वर एवं कन्या मे से जिसे मारकेश की दशा चल रही हो उसको दशानाथ का उपाय दशाकाल तक अवश्य करना चाहिए|*
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जन्मपत्रिका के फल का प्रतिपादन किया जाए तो वह निश्चित रूप से सटीक होगा। 1) लग्न भाव का स्वामी अर्थात लग्नेश किसी भी भाव में, किसी भी राशि में हो, वह अशुभ फल नहीं देगा। लग्नेश की अशुभता होने पर मन के अनुकूल भले ही फल प्राप्त न हो किन्तु जातक के लिए हानिकारक फल नहीं होंगे। 2) छ्टे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी यदि अशुभ ग्रह हो तो जन्मपत्रिका में जिस भाव में होंगे उस भाव के फलों का नाश ही करेंगे। जबकि इन भावो के स्वामी शुभ ग्रह हो तो शुभ फलों की मात्रा में कमी होगी। 3) केंद्र और त्रिकोण के स्वामी जन्मपत्रिका में जिस भाव में बैठेंगे उसके फलों को शुभत्व प्रदान करेंगे। यही फल उनकी दृष्टि होने पर भी होगा। 4) किसी भी जन्मपत्रिका में गुरु और केतु छठे भाव में होने पर जातक के रोग और शत्रुओं का नाश करते है, जबकि शनि छठे और आठवें भाव में होने पर जातक के आयु में वृद्धि करते है। 5) किसी भी जन्मपत्रिका में पापी ग्रहो का तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में होना जातक के लिए शुभ होता है। क्योंकि तीसरे भाव में स्थित पापी ग्रह जातक को पराक्रमी बनाते है, वहीं छठे भाव में स्थित ग्रह जातक के रोग और शत्रुओ का नाश करते है, इसी प्रकार ग्यारहवें भाव में स्थित ग्रह जातक को धन प्राप्त करवाते है। 7) किसी भी भाव का स्वामी लग्न से, चन्द्र से और स्वयं अपने भाव से यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो शुभ फल प्रदान करता है। जबकि इन तीनो से ही केंद्र या त्रिकोण में न होने पर अशुभ फल प्रदान करता है। फल की मात्रा तीनो के आधार पर नहीं बल्कि भिन्न भिन्न भी जानी जा सकती है। अर्थात मात्र अपने भाव से केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह अच्छा फल प्रदान करेगा, यदि तीनो से ही केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह सर्वाधिक शुभ फल प्रदान करेगा। 8) शनि और राहू जिस भाव में होते है उस भाव के फल सदा विलम्ब से प्राप्त होते है। जैसे सातवें भाव में दोनों में से कोई ग्रह हो तो विवाह विलम्ब से होता है। इसीप्रकार पाँचवे भाव में हो तो संतान विलम्ब से होती है। इसीप्रकार अन्य भाव का फल समझना चाहिये। 9) यदि एक अशुभ स्थान का स्वामी दूसरे अशुभ स्थान में हो तो वह अशुभ फल नही देते। किन्तु ऐसा आयु में भाग्योदय के बाद ही होता है। 10) यदि कोई शुभ ग्रह वक्री होकर अशुभ स्थान में उच्च का होकर बैठ जाए तो वह शुभ ग्रह नीच स्थिति का फल देगा 11)दशम भाव में जिस भाव का स्वामी हो, जातक का भाग्य उसी भाव से सम्बंधित व्यक्ति या उस भाव के कारकत्व के कार्य को अपनाने पर चमकता है। जैसे दशम भाव में तीसरे भाव का स्वामी बैठा हो तो जातक के भाग्योदय में या तो भाई का या स्वयं के पराक्रम का योगदान होगा। तीसरा भाव जातक के भाई-बहन, पराक्रम और शारीरिक अंगो में कान व भुजा से सम्बंधित होता है, अतः इन दोनों अंगो के लिए लाभदायक पदार्थों का व्यापार करने पर जीवन में कभी भी हानि नहीं उठानी पड़ेगी। इसीप्रकार यदि पंचम भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो जातक को मनोरंजन के पदार्थों से अधिक लाभ होगा, और उसके भाग्योदय में उसकी प्रेमिका या संतान का महत्वपूर्ण योगदान होगा। इसीप्रकार अन्य भावो को भी समझना चाहिये। 12) कहने को तो उच्च ग्रह सर्वाधिक शुभ फल देते है, किन्तु उनकी दृष्टि नीच भाव पर भी होती है जिसका वे नाश करते है। अतः जीवन के लिए जितने शुभ उच्च ग्रह होते है उतने ही वे हानिकारक भी होते है। 13) जन्मपत्रिका के जिस भाव में कोई भी ग्रह न हो, या ग्रह तो हो लेकिन उस पर किसी अन्य ग्रह की कोई दृष्टि न हो तो वह भाव या ग्रह सुप्त अवस्था में माना जाता है, जिसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। 14) मिथुन, कन्या, धनु और मीन लग्न के जन्मपत्रिका में बुध और गुरु केंद्राधिपत्य दोष से दूषित होते है अतः इस स्थिति में इन दोनों ग्रहो से शुभ फल के आशा करना व्यर्थ होता है। यद्यपि लग्नेश होने पर ये अशुभ फल नहीं देते है। 15) जिस जन्मपत्रिका में जितने अधिक ग्रह उच्च, स्वराशि या मित्र राशियो में होते है जातक को उतना ही अधिक सुख देते है। इसके विपरीत जितने अधिक ग्रह नीच या शत्रु राशियों में होते है वे जातक को उतना ही अधिक संघर्षपूर्ण जीवन देते है। 16) राहु या केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती है. अतः ये जिस राशि में होते है उसके स्वामी के समान फल देते है और जिस ग्रह के साथ होते है उस ग्रह के गुणों को ग्रहण कर लेते है। 17) किसी भी प्रकार का शुभ या अशुभ ग्रह, स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में जन्मपत्रिका में किसी भी भाव में हों, वे सदा शुभ फल ही देंगे। किन्तु अपने नैसर्गिक लक्षणों के अनुरूप ही फल देंगे। जैसे कि शनि मंदगति व् मति भ्रम का कारक है। अतः अपनी स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में होने पर शुभ फल तो देगा परन्तु अत्यंत धीमी गति से जातक को मति भ्रम कर कितने ही समय तक भटकाने के बाद। इसीप्रकार अन्य ग्रहो का फल समझे।‬: 18) जब कोई ग्रह एक शुभ और एक अशुभ भाव का स्वामी हो तो उसका फल माध्यम हो जाता है। यदि उस ग्रह के साथ कोई शुभ ग्रह हो तो उसमे शुभत्व की मात्रा बढ़ जाती है। साथ ही ऐसी दशा में शुभ ग्रह, शुभ ग्रह की राशि या शुभ ग्रह के भाव में हो तो उसके शुभ फल अधिक प्राप्त होते है। इसके विपरीत अशुभ भाव या राशि में ऐसा ग्रह हो तो अशुभ फल अधिक मात्रा में प्राप्त होते है। जैसे मिथुन लग्न की जन्मपत्रिका में शनि अष्टम और नवम अर्थात एक घोर अशुभ और एक सर्वाधिक शुभ त्रिकोण का स्वामी होता है। ऐसी दशा में शनि यदि केंद्र या त्रिकोण (1, 4, 5, 7, 9, 10) भाव में हो तो जातक को शुभ फल प्राप्त होंगे अन्यथा नहीं। 19) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में लग्नेश की महादशा कभी भी अशुभ फल नहीं देती। 20) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में सूर्य ग्रह और चन्द्र ग्रह चाहे किसी भी भाव में और किसी भी राशि में बैठे हो, कभी भी वे मारक नहीं होते। 21) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में सप्तमेश यदि द्वादश भाव में बैठा हो तो जातक को वैवाहिक सुख या तो होता ही नहीं या न्यून सुख होता है।
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👹डाकिनी मन्त्र साधना👹यह साधना अत्यंत प्राचीन है।इस साधना को करने का अधिकार तामसिक साधक को है अर्थात जो माँस मदिरा का सेवन करते हैं।सिद्ध होने पर इनके माध्यम से साधक किसी भी कार्य को सुगमता पूर्वक कर सकते है।यह क्षण मात्र में कार्य करती है।स्त्री वशीकरण, पुरुष वशीकरण, समाज के रावण, सूर्पनखाजैसे दुष्ट लोगो को दण्डित भी करती है।कार्यालयों में रुके हुए कार्य, प्रॉपर्टी के कार्य आदि को भी सुगमता से सम्पन कर देती है।।यह साधना श्मशान के किनारे, सुनसान खण्डर, कुँए अथवा बावड़ी के पास , वीराने जंगल में सिद्ध की जाती है।यह साधना मन्त्र आपको किसी भी पुस्तक से प्राप्त हो सकता है किन्तु सिद्धि विधान आपको इस पोस्ट के माध्यम से , हमारे सानिद्ध्य में अथवा किसी सिद्ध गुरु से ही प्राप्त होगा।पोस्ट में जैसी विधि कही गयी है वैसे ही करे, , तो साधक को डाकिनी सिद्ध हो जायेगी।डाकिनी का मन्त्र जाप बन्द आँखों से किया जाता है और साधना के मध्याह्म में एक बार आँख खोलकर पीली सरसों को मन्त्र से अभिमन्त्रित करके अपने चारो दिशाओ में फेंका जाता है फिर उसके बाद मन्त्र जाप किया जाता है।यह क्रिया 41 दिन करनी होती है।डाकिनी साधक के बन्द आँखों में दिखाई देती है अर्थात साधना के अंतिम दिन प्रकट होती है।कभी कभी साधक को आवाज भी देती है किन्तु डरे नही और अपने सामने रखे माँस मदिरा का भोग डाकिनी को दे, इससे वह संतुष्ट होती है और साधक को वचन देती है उसके सभी कार्य करने का और बदले में अपना भोग ग्रहण करती है।इसकी शक्ति कर्ण वैताली से ज्यादा होती है अर्थात इसमें 1000 प्रेत आत्माओ की शक्ति होती है।यह सभी भूत प्रेतों, जिन्नों, हमजादो आदि को मारकर अपने साथ ले जाती है।इसमें साधक जब भी कार्य की इच्छा करता है तुरुन्त करती है।साधक को यह बन्द आँखों में ही दिखाई देगी।1 कुशासन या बकरे या भैंसे का चर्म आसन2 बकरे की चर्बी का चिराग3 मिट्टी के वर्तन में 125 ग्राम बकरे की कलेजी अथवा माँस4 मिटटी के प्याले में सुगन्ध वाली मदिरा5 पीली सरसो 5 ग्राम रोज6 चमेली की धूप या अगरबत्ती7 निर्वस्त्र साधना करे।8 रुद्राक्ष की माला शुद्ध9 सिंदूर का तिलक अनिवार्य10 मन्त्र जाप दाहिने हाथ की ऊँगली मध्यमा और अंगूठा ।11 अमावस्या के दिन या पूर्णिमा के दिन से करे।12 दिशा उत्तर13 पवित्रीकरण, वास्तुदोष पूजन, गुरुमन्त्र, सुरक्षा मन्त्र करे।14 41 दिन की सिद्धि का संकल्प ले।15 10 माला जप करने के बाद पीली सरसों को दाहिने हाथ में रखकर 1 बार मन्त्र बोलकर फूंके और चारो दिशाओ में फ़ेंक दे फिर पुनः 11 माला मन्त्र जाप करे।16 डाकिनी जब भी साधक को आवाज दे तो साधक वचन लेकर डाकिनी सिद्ध करे।17 मन्त्र जाप बन्द आँखों से होगा।ताम्र कलश जल से भरकर रखे।18 साधना कॉल में मांस मंदिरा का सेवन एक समय करे।19 यह सिद्धि रात्रि 12 बजे से शुरू करे और सूर्यास्त से पहले पूरी 21 माला करे।20 साधक का साधना स्थल देव मन्दिरो आदि से 200 मीटर की दूरी पर हो।साधना स्थल पर किसी भी देवी देवता की मूर्ति नही होनी चाहिये।21 यह सिद्धि बाममार्गी है।22 41 वे दिन बंद आँखों में डाकिनी काली सी औरत की तरह खुले वालो वाली निर्वस्त्र दिखाई देगी तभी साधक समझ जाय की डाकिनी सिद्ध हो गयी है और भोग अर्पण करे।मांस मदिरा रोज साधना स्थल पर खुला छोड़ दे और सो जाये। 4 बजे तक साधना पूर्ण कर ले और जमीन पर माँस मदिरा डाल कर सो जाय।23 साधना काल में अनेक भयंकर आवाजे आती है यह आवाजे आत्माओ, प्रेतों, भूतो चुड़ैलों आदि इतर योनियों की होती है जो साधक इसको सिद्ध करते है उनको चाहिये की जब उनकी सभी आवश्यकताएं पूरी हो जाय तो इस सिद्धि का विसर्जन कर दे इसमें साधक को हमें अपना नाम माता , पिता का नाम फ़ोटो वर्तमान एड्रेस भेजे , तब दिव्य शक्ति प्रयोग से डाकिनी का संहार रात्रि काल में कर दिया जाता है और साधक को उस समय शरीर में एक झटका लगता है जिस समय डाकिनी का वध कर उसको डाकिनी योनि से मुक्त कर पुनर्जन्म हेतु विष्णुलोक भेज दिया जाता है।इससे साधक डाकिनी से मुक्ति पा लेता है और दूसरा डाकिनी को भी मुक्ति मिल जाती है तीसरा साधक जन भलाई करता है चौथा साधक के पास अतुल धन सम्पदा हो जाती है, जो साधक की आने वाली पीढ़ियों के लिये भी पर्याप्त होती है।( जिन साधको को कई कई साल बीत चुके है और उनको सिद्धियां प्राप्त नही हुयी है और ऐसे साधक जो गुरुओ को निरंतर बदलते रहते है, संपर्क कर सकते है, उनको प्रथम बार में सिद्धि सिद्ध करायी जा सकती है, धनलोभी साधक संपर्क न करे।)मन्त्रॐ स्यार की खवासिनी समन्दर पार धाईआव बैठी हो तो आवठाडी हो तो ठाडी आवजलती आ उछलती आन आये डाकिनी तो जालंधर पीर की आनशब्द साँचापिण्ड काँचाफुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ।
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तीन साल में 66 वर्ष का युवा 8000 किमी के हाइवे बनवाकर50 लाख मकान बनवाकरकरोडो शौचालय बनवाकर6 नए एम्स बनवाकर3 नयी पनडुब्बियां बनवाकरतेजस विमान हिन्दुस्तान में बनवाकरधनुष तोप दिलाकरOrop देकरसर्जिकल स्ट्राइक करकेतीनो सेना को मजबूत बना कर65 देशों से व्यापारिक रिश्ते बनाकरचीन को पीछे छोड़करविकास दर 7.5के ऊपर ले जाकरमहगाई 5 से नीचे लाकरफसल बीमा देकर12 रु में 2 लाख का बीमा देकरनोटबंदी करके नक्सलियों पाकिस्तानियो को दुखी करकेराफेल विमान का सौदा करकेसऊदी अरब में शेख से मंदिर बनवा केबुरहान वानी को ऊपर पहुचा केअलगाववादी कश्मीरियों को औकात में लाके। बस सब की गालियाँ खाता है। जो काम करता है, वो कभी ये नहीं कहता कि*काम बोलता है*क्योंकि *काम दिखता है।**"मोदी जी"* आप को "शर्म" आनी चाहिए कि आपने "अपने परिवार" और अपने भाइयों को अपनी "कैबिनेट" में या "राजनीति" में लाने का ज़रा भी "प्रयास नहीं किया" आप को इस बात के लिए भी "शर्म" आनी चाहिए कि आप के "भाई" साधारण नागरिक का जीवन जी रहे हैं और आप की "भतीजी गरीबी" में "मर गई" !! *"मोदी जी"* आप को "शासन चलाने" की कला *"मुलायम सिंह"* से "सीखनी" चाहिए जहाँ "सैफई" के उनके परिवार के करीब "36 सदस्य" आज *"उत्तर प्रदेश"* में "ब्लाक प्रमुख" के पदों पर सुशोभित हैं वही *"मुलायम सिंह"* जिन्हें "दो वक़्त की रोटी" भी मुश्किल से नसीब होती थी आज *"करोडपति"* ही नहीं *"अरबपति"* हैं !! "30 वर्ष" पहले *"बहन मायावती"* का "पूरा परिवार" दिल्ली में "एक कमरे" में रहा करता था, आज *"मायावती के भाई"* का "बंगला" सुन्दरता में *"ताज महल"* को भी "मात" दे रहा है !! *"देवगोडा"* अपने "पोते" को *"100 करोड़" की "बहु भाषाई फिल्म"* में बतौर *"सुपर हीरो"* उतार रहे हैं, "कर्नाटक" के "हासन जिले" में "आधी से ज्यादा" खेती की ज़मीन *"देवगोडा परिवार"* की है !! *"कर्नाटक" के मुख्यमंत्री "सिद्धारमैया"* का "बेटा" जो "सरकारी अस्पताल" में *"मुख्य चिकित्सक"* है और *"छोटा पुत्र" जिसका अभी हाल में "निधन" हुआ है, उसका "ब्रुसेल्स" में बड़ा कारोबार है, और उसके बच्चे "जर्मनी" में "पढ़" रहे हैं* *"सोनिया का दामाद"* जो कि "मुरादाबाद" में "पुराने पीतल" के आइटम "बेचा" करता था, आज *"पांच सितारा होटल" का "मालिक"* है, उसका *"शिमला" में एक "महल" है और "लक्ज़री कारों" का "मालिक" है* !!जबकि *"आप की माँ" आज भी "ऑटोरिक्शा" में चलती है और आप के "भाई ब्लू कालर जॉब" यानि मेंहनत "मजदूरी" कर रहे हैं और आप की एक "भतीजी" शिक्षामित्र है (आप उसे टीचर की नौकरी भी नहीं दिलवा पाए ) जो कि दूसरो के "कपडे सिलती" है तथा "ट्यूशन पढ़ा" कर अपनी "जीविका" चला रही है* !! *"मोदी जी"* देश बहुत "शर्मिंदा" है कि आप "प्रधानमंत्री" होते हुए भी अपने "भाइयों" को "MLA या MP" का "टिकट नहीं दिलवा पाए" आप "चाहते" तो अपनी "बहनों" को "राज्य सभा" में "MP" बनवा सकते थे और आप के *"जीजा", * "जिला स्तर" के "चुनाव लड़" कर "ब्लाक प्रमुख" तो बन ही सकते थे, *आप "सीखने" में बहुत "सुस्त" हैं* "15 वर्ष" तक "गुजरात" में और *"प्रधानमंत्री"* का "आधा कार्यकाल", *"दिल्ली"* में बिताने के बाद भी आप *"लालू, मुलायम, सोनिया गाँधी, बहन मायावती"* से कुछ भी "नहीं सीखे" और अपनी "रसोई का खर्च" भी "खुद वहन" कर रहे हैं !! ------------------------------------- उपरोक्त बातो से हमे *"शर्मिंदा"* तो होना पड़ा लेकिन उतना ही *"गर्व"* भी है कि हमने अपने जीवन का *"पहला वोट" , "2014" में एक बहुत ही "ईमानदार और देशभक्त इंसान" को वोट दिया "हम सभी गर्व" करते है की हमे अपने जीवन में आप जैसे देशभक्त का मार्गदर्शन मिला सच में "ईमानदारी और कर्तब्यनिष्ठा" की "पराकाष्ठा" है* ------------------------------------मेरे भाइयों ! इस मैसेज को ब्लास्ट कर ही दीजिए ! देशहित के लिए जरूरी है !! -------------------------------------
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5 सोमवार का संयोग:--सावन का पूरा महीना ही जहां अराधना के लिए विशेष है तो वहीं 5 दिन सावन सोमवार के भी भक्तों के लिए व्रत रखने को मिलेंगे। प्रथम सावन सोमवार 10 जुलाई को, दूसरा 17 जुलाई को, तीसरा 24 जुलाई, चौथा सोमवार 31 जुलाई और 5वां सोमवार 7 अगस्त को होगा। इस दिन भाई बहन के पवित्र बंधन का त्यौहार रक्षाबंधन भी मनेगा।इस मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर कुछ विशेष वास्तु अर्पित की जाती है जिसे शिवामुट्ठी कहते है।1. प्रथम सोमवार को कच्चे चावल एक मुट्ठी, 2. दूसरे सोमवार को सफेद तिल् एक मुट्ठी, 3. तीसरे सोमवार को खड़े मूँग एक मुट्ठी, 4. चौथे सोमवार को जौ एक मुट्ठी और5. यदि जिस मॉस में पांच सोमवार हो तो पांचवें सोमवार को सतुआ चढ़ाने जाते हैं। यदि पांच सोमवार न हो तो आखरी सोमवार को दो मुट्ठी भोग अर्पित करते है।माना जाता है कि श्रावण मास में शिव की पूजा करने से सारे कष्ट खत्म हो जाते हैं। महादेव शिव सर्व समर्थ हैं। वे मनुष्य के समस्त पापों का क्षय करके मुक्ति दिलाते हैं। इनकी पूजा से ग्रह बाधा भी दूर होती है।1. *सूर्य* से संबंधित बाधा है, तो विधिवत या पंचोपचार के बाद लाल आक के पुष्प एवं पत्तों से शिव की पूजा करनी चाहिए।2. *चंद्रमा* से परेशान हैं, तो प्रत्येक सोमवार शिवलिंग पर गाय का दूध अर्पित करें। साथ ही सोमवार का व्रत भी करें।3. *मंगल* से संबंधित बाधाओं के निवारण के लिए गिलोय की जड़ी-बूटी के रस से शिव का अभिषेक करना लाभप्रद रहेगा।4. *बुध* से संबंधित परेशानी दूर करने के लिए विधारा की जड़ी के रस से शिव का अभिषेक करना ठीक रहेगा।5. *बृहस्पति* से संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए प्रत्येक बृहस्पतिवार को हल्दी मिश्रित दूध शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए।6. *शुक्र* ग्रह को अनुकूल बनाना चाहते हैं, तो पंचामृत एवं घृत से शिवलिंग का अभिषेक करें।7. *शनि* से संबंधित बाधाओं के निवारण के लिए गन्ने के रस एवं छाछ से शिवलिंग का अभिषेक करें।8-9. *राहु-केतु* से मुक्ति के लिए कुश और दूर्वा को जल में मिलाकर शिव का अभिषेक करने से लाभ होगा।शास्त्रों में मनोरथ पूर्ति व संकट मुक्ति के लिए अलग-अलग तरह की धारा से शिव का अभिषेक करना शुभ बताया गया है। अलग-अलग धाराओं से शिव अभिषेक का फल- जब किसी का मन बेचैन हो, निराशा से भरा हो, परिवार में कलह हो रहा हो, अनचाहे दु:ख और कष्ट मिल रहे हो तब शिव लिंग पर दूध की धारा चढ़ाना सबसे अच्छा उपाय है। इसमें भी शिव मंत्रों का उच्चारण करते रहना चाहिए।1. *वंश की वृद्धि के लिए* शिवलिंग पर शिव सहस्त्रनाम बोलकर घी की धारा अर्पित करें।2. शिव पर जलधारा से अभिषेक *मन की शांति के लिए* श्रेष्ठ मानी गई है।3. *भौतिक सुखों को पाने के लिए* इत्र की धारा से शिवलिंग का अभिषेक करें।4. *बीमारियों से छुटकारे के लिए* शहद की धारा से शिव पूजा करें।5. गन्ने के रस की धारा से अभिषेक करने पर हर *सुख और आनंद मिलता है*।6. सभी धाराओं से श्रेष्ठ है गंगाजल की धारा। शिव को गंगाधर कहा जाता है। शिव को गंगा की धार बहुत प्रिय है। गंगा जल से शिव अभिषेक करने पर *चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है।* इससे अभिषेक करते समय महामृत्युंजय मन्त्र जरुर बोलना चाहिए।कार्य सिद्धि के लिए:--1. हर ‍इच्छा पूर्ति के लिए हैं अलग शिवलिंगपार्थिव शिवलिंग हर कार्य सिद्धि के लिए।2. गुड़ के शिवलिंग प्रेम पाने के लिए।3. भस्म से बने शिवलिंग सर्वसुख की प्राप्ति के लिए।4. जौ या चावल या आटे के शिवलिंग दाम्पत्य सुख, संतान प्राप्ति के लिए।5. दही से बने शिवलिंग ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए।6. पीतल, कांसी के शिवलिंग मोक्ष प्राप्ति के लिए।7. सीसा इत्यादि के शिवलिंग शत्रु संहार के लिए।8. पारे के शिवलिंग अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के लिए।पूजन में रखे इन बातों का ध्यान:--1. सावन के महीने में शिवलिंग की करें पूजा शिवलिंग जहां स्थापित हो पूरव् दिशा की ओर मुख करके नहीं बैठें।2. शिवलिंग के दक्षिण दिशा में ही बैठकर पूजन करें।ये होता है अभिषेक का फल:--1. दूध से अभिषेक करने पर परिवार में कलह, मानसिक पीड़ा में शांति मिलती है।2. घी से अभिषेक करने पर वंशवृद्धि होती है।3. इत्र से अभिषेक करने पर भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है।4. जलधारा से अभिषेक करने पर मानसिक शान्ति मिलती है।5. शहद से अभिषेक करने पर परिवार में बीमारियों का अधिक प्रकोप नहीं रहता।6. गन्ने के रस की धारा डालते हुये अभिषेक करने से आर्थिक समृद्धि व परिवार में सुखद माहौल बना रहता है।7. गंगा जल से अभिषेक करने पर चारो पुरूषार्थ की प्राप्ति होती है। 8. अभिषेक करते समय महामृत्युंजय का जाप करने से फल की प्राप्ति कई गुना अधिक हो जाती है। 9. सरसों के तेल से अभिषेक करने से शत्रुओं का शमन होता।ये भी मिलते हैं फल:--9. बिल्वपत्र चढ़ाने से जन्मान्तर के पापों व रोग से मुक्ति मिलती है।10. कमल पुष्प चढ़ाने से शान्ति व धन की प्राप्ति होती है।11. कुशा चढ़ाने से मुक्ति की प्राप्ति होती है।12. दूर्वा चढ़ाने से आयु में वृद्धि होती है।13. धतूरा अर्पित करने से पुत्र रत्न की प्राप्ति व पुत्र का सुख मिलता है।14. कनेर का पुष्प चढ़ाने से परिवार में कलह व रोग से निवृत्ति मिलती हैं।15. शमी पत्र चढ़ाने से पापों का नाश होता, शत्रुओं का शमन व भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है।*🙌🙌हर-हर🙏महादेव🙌🙌*
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निर्बल या अस्त ग्रह की पहचान करते समय ग्रह का सूर्य से अंतर भी देखा जाता । कुछ अंतर में सूर्य से नज़दीक के ग्रह अस्त के माने जाते हो निर्बल हो जाते हैं या अपना पूरा प्रभाव नहीं दे पाते । कौन से ग्रह सूर्य से कितने अंतर पर अस्त का माना जाता ये हम आप को बताने जा रहे हैं ।कोई भी ग्रह जब सूर्य से एक निश्चित दूरी के अंदर आ जाता है तो सूर्य के तेज से वह ग्रह अपनी आभा तथा शक्ति ख देता है । ग्रह सूर्य से जितना नज़दीक उतना उसका बल काम माना जाता है और उस ग्रह को अस्त का ग्रह मन जाता है । प्रत्येक ग्रह की अंशात्मक अस्त ता सूर्य से दूरी कितने अंश इस बात से सुनिश्चित किया जाता है ।प्रत्येक ग्रह सूर्य से निम्नलिखितदूरी के अंतर पर अस्त हो जाता है :चन्द्रमा सूर्य के दोनों ओर 12° डिग्री या इससेअधिक समीप आने पर अस्त माना जाता हैं।मंगल सूर्य से 7° या उस से कम अंतर पर अस्त का माना जाता है ।बुध सूर्य के दोनों ओर 14° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं। किन्तु वक्री बुध सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माना जाएगा ।गुरू सूर्य के दोनों ओर 11° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं।शुक्र सूर्य के दोनों ओर 10° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं। यदि शुक्र वक्री चल रहा हो तो सूर्य के दोनों ओर 8 डिग्री या इससेअधिक समीप आने पर अस्त माना जाता हैं।शनि सूर्य के दोनों ओर 15° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं। राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण अस्त वाला सिद्धांत उन्हें लागू नही होता ।
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निर्बल या अस्त ग्रह की पहचान करते समय ग्रह का सूर्य से अंतर भी देखा जाता । कुछ अंतर में सूर्य से नज़दीक के ग्रह अस्त के माने जाते हो निर्बल हो जाते हैं या अपना पूरा प्रभाव नहीं दे पाते । कौन से ग्रह सूर्य से कितने अंतर पर अस्त का माना जाता ये हम आप को बताने जा रहे हैं ।कोई भी ग्रह जब सूर्य से एक निश्चित दूरी के अंदर आ जाता है तो सूर्य के तेज से वह ग्रह अपनी आभा तथा शक्ति ख देता है । ग्रह सूर्य से जितना नज़दीक उतना उसका बल काम माना जाता है और उस ग्रह को अस्त का ग्रह मन जाता है । प्रत्येक ग्रह की अंशात्मक अस्त ता सूर्य से दूरी कितने अंश इस बात से सुनिश्चित किया जाता है ।प्रत्येक ग्रह सूर्य से निम्नलिखितदूरी के अंतर पर अस्त हो जाता है :चन्द्रमा सूर्य के दोनों ओर 12° डिग्री या इससेअधिक समीप आने पर अस्त माना जाता हैं।मंगल सूर्य से 7° या उस से कम अंतर पर अस्त का माना जाता है ।बुध सूर्य के दोनों ओर 14° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं। किन्तु वक्री बुध सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माना जाएगा ।गुरू सूर्य के दोनों ओर 11° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं।शुक्र सूर्य के दोनों ओर 10° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं। यदि शुक्र वक्री चल रहा हो तो सूर्य के दोनों ओर 8 डिग्री या इससेअधिक समीप आने पर अस्त माना जाता हैं।शनि सूर्य के दोनों ओर 15° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं। राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण अस्त वाला सिद्धांत उन्हें लागू नही होता ।
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‬: कुंडली का यह योग व्यक्ति को बना देता है राजाकुंडली में नौवें और दसवें स्थान का बड़ा महत्त्व होता है।जन्म कुंडली में नौवां स्थान भाग्य का और दसवां कर्म का स्थान होता है। कोई भी व्यक्ति इन दोनों घरों की वजह से ही सबसे ज्यादा सुख और समृधि प्राप्त करता है। कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है और अच्छा भाग्य, अच्छे कार्य व्यक्ति से करवाता है।अगर जन्म कुंडली के नौवें या दसवें घर में सही ग्रह मौजूद रहते हैं तो उन परिस्थितियों में राजयोग का निर्माण होता है। राज योग एक ऐसा योग होता है जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष राजा के समान सुख प्रदान करता है। इस योग को प्राप्त करने वाला व्यक्ति सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने वाला होता है।ज्योतिष की दुनिया में जिन व्यक्तियों की कुण्डली में राजयोग निर्मित होता है, वे उच्च स्तरीय राजनेता, मंत्री, किसी राजनीतिक दल के प्रमुखया कला और व्यवसाय में खूब मान-सम्मान प्राप्त करते हैं।राजयोग का आंकलन करने के लिए जन्म कुंडली में लग्न को आधार बनाया जाता है। कुंडली की लग्न में सही ग्रह मौजूद होते हैं तो राजयोग का निर्माण होता है।जिस व्यक्ति की कुंडली में राजयोग रहता है उस व्यक्ति को हर प्रकार की सुख-सुविधा और लाभ भी प्राप्त होते हैं। इस लेख के माघ्यम से आइए जानें कि कुण्डली में राजयोग का निर्माण कैसे होता है-मेष लग्न- मेष लग्न में मंगल और ब्रहस्पति अगर कुंडली के नौवें या दसवें भाव में विराजमान होते हैं तो यह राजयोग कारक बन जाता है।वृष लग्न- वृष लग्न में शुक्र और शनि अगर नौवें या दसवें स्थान पर विराजमान होते हैं तो यह राजयोग का निर्माण कर देते हैं।इस लग्न में शनि राजयोग के लिए अहम कारक बताया जाता है।मिथुन लग्न- मिथुन लग्न में अगर बुध या शनि कुंडली के नौवें या दसवें घर में एक साथ आ जाते हैं तो ऐसी कुंडली वाले जातक का जीवन राजाओं जैसा बन जाता है।कर्क लग्न- कर्क लग्न में अगर चंद्रमा और ब्रहस्पति भाग्य या कर्म के स्थान पर मौजूद होते हैं तो यह केंद्र त्रिकोंण राज योग बना देते हैं। इस लग्न वालों के लिए ब्रहस्पति और चन्द्रमा बेहद शुभ ग्रह भी बताये जाते हैं।सिंह लग्न- सिंह लग्न के जातकों की कुंडली में अगर सूर्य और मंगल दसमं या भाग्य स्थान में बैठ जाते हैं तो जातक के जीवन में राज योग कारक का निर्माण हो जाता है।कन्या लग्न- कन्या लग्न में बुध और शुक्र अगर भाग्य स्थान या दसमं भाव में एक साथ आ जाते हैं तो जीवन राजाओं जैसा हो जाता है।तुला लग्न- तुला लग्न वालों का भी शुक्र या बुध अगर कुंडली के नौवें या दसवें स्थान पर एक साथ विराजमान हो जाता है तो इस ग्रहों का शुभ असर जातक को राजयोग के रूप में प्राप्त होने लगता है।वृश्चिक लग्न- वृश्चिक लग्न में सूर्य और मंगल, भाग्य स्थान या कर्म स्थान (नौवें या दसवें) भाव में एक साथ आ जाते हैं तो ऐसी कुंडली वाले का जीवन राजाओं जैसा हो जाता है। यहाँ एक बात और ध्यान देने वाली है कि अगर मंगल और चंद्रमा भी भाग्य या कर्म स्थान पर आ जायें तो यह शुभ रहता है।धनु लग्न- धनु लग्न के जातकों की कुंडली में राजयोग के कारक, ब्रहस्पति और सूर्य माने जाते हैं। यह दोनों ग्रह अगरनौवें या दसवें घर में एक साथ बैठ जायें तो यह राजयोग कारक बन जाता है।मकर लग्न- मकर लग्न वाली की कुंडली में अगर शनि और बुध की युति, भाग्य या कर्म स्थान पर मौजूद होती है तो राजयोग बन जाता है।कुंभ लग्न- कुंभ लग्न वालों का अगर शुक्र और शनि नौवें या दसवें स्थान पर एक साथ आ जाते हैं तो जीवन राजाओं जैसा हो जाता है।मीन लग्न- मीन लग्न वालों का अगर ब्रहस्पति और मंगल जन्म कुंडली के नवें या दसमं स्थान पर एक साथ विराजमान हो जाते हैं तो यह राज योग बना देते हैं।.ASTROLOGY & SUN TRANSIT EFFECT ON LEO ASCENDANT PEOPLE.Sun planet will be in Moon sign from 16 July 2017 to 16 August 2017 .Rahu is already in Leo sign.Saturn is already in Scorpio sign..This period can be tough for Leo ascendant people.They can have accident, drive carefully.They can go far from birth place.Mother can have health problem.Be careful if you are doing property related transaction.Check all documents.Chances of disturbance in property matters.Chances of misunderstanding/fights in couple.Those who are engaged.Stay alert, chances of cancellation of relationship..After 15 August please give feedback That Which problem you have faced in this month.====================..================..राशी फल अर्थात ग्रह गोचर का जातक पर प्रभाव .जन्म कुण्डली में ग्रह स्थिर होते हैं .जब जातक का जन्म होता है .उस समय ग्रहों की जो स्थिति होती है उसे जन्म कुण्डली कहते हैं .गोचर में ग्रह घूमते रहते हैं .जो जातक के जीवन पर प्रभाव डालते हैं..वर्तमान समय कैसा है .यह कई तथ्यों पर निर्भर करता है .1 जन्म कुण्डली में स्थित ग्रह .2 महादशा + अन्तर्दशा , वर्ष फल.3 घर का वास्तु .4 गोचर में ग्रह स्थिति .5 जातक के कर्म .6 जातक द्वारा किये गए उपाय .और भी कई तथ्य हो सकते हैं ..अब यदि गोचर में ग्रहों की जो स्थिति है .अगर वही जन्म कुण्डली में है तो .जातक के साथ वह घटना होने की सम्भावना बन जाएगी .यदि शेष 4 तथ्य भी मिल जाते हैं तो घटना हो जाती है .अब बात करते हैं राशि फल की जो केवल ग्रह गोचर पर आधारित होता है .अब एक ही लगन के लाखों लोग होते हैं .सबके साथ वह घटना नहीं होगी .जिन जातकों की जन्म कुण्डली में अधीक तथ्य मिलेंगे .केवल उन्ही के साथ होंगी .इसलिए राशी फल पूरी तरह लागु अर्थात सही नहीं होता ..फिर भी अगर आपकी राशी फल में लिखा है कि .दुर्घटना होने की सम्भावना है तो आपको सम्भल जाना चाहीये .सही तरह से लिखा हुआ राशी फल एक " सुचना" की तरह हैं .जो ध्यान में रखनी चाहिए ..मान लीजिये सड़क पर board लगा है कि .आगे रास्ता ख़राब है .तो इसका मतलब यह नहीं कि सबका accident हो जायेगा .इसका मतलब यह है कि यदि आप लापरवाही करते हैं तो accident हो सकता है ..राशी फल अर्थात गृह गोचर का प्रभाव जातक पर कैसे पड़ेगा .लगन राशि से या चन्द्र राशि से .इसके बारे में भी सबके अलग विचार हैं .मेरे जो लेख होते हैं वह लगन राशि पर होते हैं .कुछ लोग नाम राशी से भी देखते हैं .वह तो पूरी तरह से गलत है .क्यूंकि कोई भी नाम जन्म कुण्डली के अनुसार नहीं रखता..जब भी राशी फल अर्थात ग्रह गोचर के प्रभाव की बात आती है .तो लोग कहते हैं .राम और रावण की राशि एक ही थी .आशा है अब आपका संशय(confusion) दूर हो गया होगा .यदि फिर भी कोई प्रश्न है तो आप पूछ सकते हैं.यदि आप इस लेख को WHATSAPP पर प्राप्त करना चाहते हैं .तो अपना नाम MOBILE NUMBER ARTICLE NUMBER लिख कर INBOX करें..====================== *जीवन में सुख और सफलता के उपाय*.कहते हैं कि पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ इनके पालन से जीवन में सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति निश्चित रूप से होती है।.– घर का हर व्यक्ति सूर्योदय के पहले उठे और उगते सूर्य के दर्शन करे।इसी समय जोर से गायत्री मंत्र का उच्चारण करे तो घर के वास्तु दोष भी नष्ट हो जाते है।.– सूर्य दर्शन के बाद सूर्य को जल, पुष्प और रोली-अक्षत का अर्घ्य दे, सूर्य के साथ त्राटक करे।.– बिस्तर से उठते समय दोनों पैर जमीन पर एक साथ रखे, उसी समय इष्ट का स्मरण करे और हाथों को मुख पर फेरे।.– स्नान और पूजन सुबह 7 से 8 बजे के बीच अवश्य कर ले।.– घर में तुलसी और आक का पौधा लगाए और उनकी नियमित सेवा करे।.– पक्षियों को दाना डाले।.– शनिवार और अमावस्या को सारे घर की सफाई करें, कबाड़ बाहर निकले और जूते-चप्पलों का दान कर दे।.– स्नान करने के बाद स्नानघर को कभी गंदा न छोड़े।.– जितना हो सके भांजी और भतीजी को कोई न कोई उपहार देते रहे।किसी बुधवार को बुआ को भी चाट या चटपटी वस्तु खिलाएँ।.– घर में भोजन बनते समय गाय और कुत्ते का हिस्सा अवश्य निकाले।.– बुधवार को किसी को भी उधार न दे, वापस नहीं आएगा।.– राहू काल में कोई कार्य शुरू न करें।.– श्री सूक्त का पाठ करने से धन आता रहेगा।.– वर्ष में एक या दो बार घर में किसी पाठ या मंत्रोक्त पूजन को ब्राह्मण द्वारा जरूर कराए।.– स्फटिक का श्रीयंत्र, पारद शिवलिंग, श्वेतार्क गणपति और दक्षिणावर्त शंख को घर या दुकान आदि में स्थापित कर पूजन करने से घर का भण्डार भरा-पूरा रहता है।.– घर के हर सदस्य को अपने-अपने इष्ट का जाप व पूजन अवश्य करना चाहिए।.– जहाँ तक हो सके अन्न, वस्त्र, तेल, कंबल, अध्ययन सामग्री आदि का दान करें।दान करने के बाद उसका उल्लेख न करें।.– अपने राशि या लग्न स्वामी ग्रह के रंग की कोई वस्तु अपने साथ हमेशा रखे।।
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