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जन्मपत्रिका के फल का प्रतिपादन किया जाए तो वह निश्चित रूप से सटीक होगा। 1) लग्न भाव का स्वामी अर्थात लग्नेश किसी भी भाव में, किसी भी राशि में हो, वह अशुभ फल नहीं देगा। लग्नेश की अशुभता होने पर मन के अनुकूल भले ही फल प्राप्त न हो किन्तु जातक के लिए हानिकारक फल नहीं होंगे। 2) छ्टे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी यदि अशुभ ग्रह हो तो जन्मपत्रिका में जिस भाव में होंगे उस भाव के फलों का नाश ही करेंगे। जबकि इन भावो के स्वामी शुभ ग्रह हो तो शुभ फलों की मात्रा में कमी होगी। 3) केंद्र और त्रिकोण के स्वामी जन्मपत्रिका में जिस भाव में बैठेंगे उसके फलों को शुभत्व प्रदान करेंगे। यही फल उनकी दृष्टि होने पर भी होगा। 4) किसी भी जन्मपत्रिका में गुरु और केतु छठे भाव में होने पर जातक के रोग और शत्रुओं का नाश करते है, जबकि शनि छठे और आठवें भाव में होने पर जातक के आयु में वृद्धि करते है। 5) किसी भी जन्मपत्रिका में पापी ग्रहो का तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में होना जातक के लिए शुभ होता है। क्योंकि तीसरे भाव में स्थित पापी ग्रह जातक को पराक्रमी बनाते है, वहीं छठे भाव में स्थित ग्रह जातक के रोग और शत्रुओ का नाश करते है, इसी प्रकार ग्यारहवें भाव में स्थित ग्रह जातक को धन प्राप्त करवाते है। 7) किसी भी भाव का स्वामी लग्न से, चन्द्र से और स्वयं अपने भाव से यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो शुभ फल प्रदान करता है। जबकि इन तीनो से ही केंद्र या त्रिकोण में न होने पर अशुभ फल प्रदान करता है। फल की मात्रा तीनो के आधार पर नहीं बल्कि भिन्न भिन्न भी जानी जा सकती है। अर्थात मात्र अपने भाव से केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह अच्छा फल प्रदान करेगा, यदि तीनो से ही केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह सर्वाधिक शुभ फल प्रदान करेगा। 8) शनि और राहू जिस भाव में होते है उस भाव के फल सदा विलम्ब से प्राप्त होते है। जैसे सातवें भाव में दोनों में से कोई ग्रह हो तो विवाह विलम्ब से होता है। इसीप्रकार पाँचवे भाव में हो तो संतान विलम्ब से होती है। इसीप्रकार अन्य भाव का फल समझना चाहिये। 9) यदि एक अशुभ स्थान का स्वामी दूसरे अशुभ स्थान में हो तो वह अशुभ फल नही देते। किन्तु ऐसा आयु में भाग्योदय के बाद ही होता है। 10) यदि कोई शुभ ग्रह वक्री होकर अशुभ स्थान में उच्च का होकर बैठ जाए तो वह शुभ ग्रह नीच स्थिति का फल देगा 11)दशम भाव में जिस भाव का स्वामी हो, जातक का भाग्य उसी भाव से सम्बंधित व्यक्ति या उस भाव के कारकत्व के कार्य को अपनाने पर चमकता है। जैसे दशम भाव में तीसरे भाव का स्वामी बैठा हो तो जातक के भाग्योदय में या तो भाई का या स्वयं के पराक्रम का योगदान होगा। तीसरा भाव जातक के भाई-बहन, पराक्रम और शारीरिक अंगो में कान व भुजा से सम्बंधित होता है, अतः इन दोनों अंगो के लिए लाभदायक पदार्थों का व्यापार करने पर जीवन में कभी भी हानि नहीं उठानी पड़ेगी। इसीप्रकार यदि पंचम भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो जातक को मनोरंजन के पदार्थों से अधिक लाभ होगा, और उसके भाग्योदय में उसकी प्रेमिका या संतान का महत्वपूर्ण योगदान होगा। इसीप्रकार अन्य भावो को भी समझना चाहिये। 12) कहने को तो उच्च ग्रह सर्वाधिक शुभ फल देते है, किन्तु उनकी दृष्टि नीच भाव पर भी होती है जिसका वे नाश करते है। अतः जीवन के लिए जितने शुभ उच्च ग्रह होते है उतने ही वे हानिकारक भी होते है। 13) जन्मपत्रिका के जिस भाव में कोई भी ग्रह न हो, या ग्रह तो हो लेकिन उस पर किसी अन्य ग्रह की कोई दृष्टि न हो तो वह भाव या ग्रह सुप्त अवस्था में माना जाता है, जिसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। 14) मिथुन, कन्या, धनु और मीन लग्न के जन्मपत्रिका में बुध और गुरु केंद्राधिपत्य दोष से दूषित होते है अतः इस स्थिति में इन दोनों ग्रहो से शुभ फल के आशा करना व्यर्थ होता है। यद्यपि लग्नेश होने पर ये अशुभ फल नहीं देते है। 15) जिस जन्मपत्रिका में जितने अधिक ग्रह उच्च, स्वराशि या मित्र राशियो में होते है जातक को उतना ही अधिक सुख देते है। इसके विपरीत जितने अधिक ग्रह नीच या शत्रु राशियों में होते है वे जातक को उतना ही अधिक संघर्षपूर्ण जीवन देते है। 16) राहु या केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती है. अतः ये जिस राशि में होते है उसके स्वामी के समान फल देते है और जिस ग्रह के साथ होते है उस ग्रह के गुणों को ग्रहण कर लेते है। 17) किसी भी प्रकार का शुभ या अशुभ ग्रह, स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में जन्मपत्रिका में किसी भी भाव में हों, वे सदा शुभ फल ही देंगे। किन्तु अपने नैसर्गिक लक्षणों के अनुरूप ही फल देंगे। जैसे कि शनि मंदगति व् मति भ्रम का कारक है। अतः अपनी स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में होने पर शुभ फल तो देगा परन्तु अत्यंत धीमी गति से जातक को मति भ्रम कर कितने ही समय तक भटकाने के बाद। इसीप्रकार अन्य ग्रहो का फल समझे।‬: 18) जब कोई ग्रह एक शुभ और एक अशुभ भाव का स्वामी हो तो उसका फल माध्यम हो जाता है। यदि उस ग्रह के साथ कोई शुभ ग्रह हो तो उसमे शुभत्व की मात्रा बढ़ जाती है। साथ ही ऐसी दशा में शुभ ग्रह, शुभ ग्रह की राशि या शुभ ग्रह के भाव में हो तो उसके शुभ फल अधिक प्राप्त होते है। इसके विपरीत अशुभ भाव या राशि में ऐसा ग्रह हो तो अशुभ फल अधिक मात्रा में प्राप्त होते है। जैसे मिथुन लग्न की जन्मपत्रिका में शनि अष्टम और नवम अर्थात एक घोर अशुभ और एक सर्वाधिक शुभ त्रिकोण का स्वामी होता है। ऐसी दशा में शनि यदि केंद्र या त्रिकोण (1, 4, 5, 7, 9, 10) भाव में हो तो जातक को शुभ फल प्राप्त होंगे अन्यथा नहीं। 19) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में लग्नेश की महादशा कभी भी अशुभ फल नहीं देती। 20) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में सूर्य ग्रह और चन्द्र ग्रह चाहे किसी भी भाव में और किसी भी राशि में बैठे हो, कभी भी वे मारक नहीं होते। 21) किसी भी जातक की जन्मपत्रिका में सप्तमेश यदि द्वादश भाव में बैठा हो तो जातक को वैवाहिक सुख या तो होता ही नहीं या न्यून सुख होता है।
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कार्तिक पूर्णिमा , देव दिवाली और त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जानी जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपने पूर्ण कला में होता है। इस शुभ दिन को कई कारणों से बेहद जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा: नवंबर 14, 2016, सोमवारकार्तिक पूर्णिमा को देव दिवाली अथवा त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन कार्तिक मास की पूर्णिमा को होता है। यह दिन बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है और कार्तिक पूर्णिमा से कई कथाएँ जुड़ी हुई हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरा नामक असुर पर विजय प्राप्त की थी। मुख्य रूप से इस दिन भगवान कार्तिकेय के साथ भगवान विष्णु और शिव की पूजा होती है।कार्तिक पूर्णिमा: परंपरायदि हम कार्तिक पूर्णिमा की बात करते हैं तो प्रबोधिनी एकादशी का बड़ा महत्व है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार चतुर्मास के दौरान भगवान विष्णु द्वारा लिए गए निद्रासन से प्रबोधिनी एकादशी के दिन जागृत होते हैं। प्रबोधिनी एकादशी पूरे भारत में कई त्यौहारों के प्रारंभ का प्रतीक है। प्रबोधिनी एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक देश में कई जगहों पर मेले आदि प्रारंभ हो जाते हैं।कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु पवित्र स्नान (कार्तिक स्नान) करते हैं जो कार्तिक पूर्णिमा की पूर्वसंध्या को किया जाता है। कार्तिक स्नान सूर्योदय से पहले एवं सूर्योदय के बाद यानी दो बार किया जाता है। कार्तिक स्नान की संध्या के बाद श्रद्धालु भगवान विष्णु, शिव एवं ब्रहमा जी के साथ अंगिरा ऋषि, सूर्य एवं कार्तिकेय की आराधना करते हैं। इस दिन सत्य नारायण की कथा कराने का भी बड़ा महत्व है। प्रार्थना आदि के बाद ईश्वर को पवित्र भोजन अन्नकूट का भोग लगाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन हिंसा, दाड़ी, बाल कटाना/बनाना, पेड़ काटना, फल-फूल को तोड़ना, फसल को काटना अथवा शारीरिक संबंध बनाना ठीक नहीं माना जाता है। इस दिन गाय को खिलाना, ब्राह्णणों को दान करना और व्रत धारण करना शुभ माना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्वर्ण दान करना भी पवित्र माना गया है। देव दिपावली के दिन मंदिर में रातभर दीपों को जलाना चाहिए। इस दौरान वाराणसी के सभी मंदिरों, घाट एवं धार्मिक स्थानों की साज सज्जा की जाती है। कहा जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन 360 दीपक जलाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। दरअस्ल 360 दीपक 360 दिन के प्रतीक माने गए हैं। इस दिन दीयों को साधुओं को दिया जाता हैं अथवा उनको जल में प्रवाह किया जाता है। यह दिन कार्तिक दीपरत्न के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि प्रज्जवलित दीपक का तेज एक रत्न के समान होता है। ऐसा कहा जाता है कि इन पवित्र जलते हुए दीयों को देखकर पशु-पक्षी एवं अन्य जीव जंतु इस नैतिक संसार से ख़ुद को आज़ाद महसूस करते हैं।कार्तिक पूर्णिमा: इस दिन होने वाली अन्य घटनाएँकार्तिक पूर्णिमा को मतस्य (मछली) के जन्मदिन के रूप में जानते हैं जो भगवान विष्णु जी के अवतार हैं। इस दिन भगवान विष्णु ने एक मछली के रूप में जन्म लिया था। भगवान कार्तिकेय (भगवान शिव के पुत्र) का जन्म भी मतस्य के साथ हुआ था। वहीं वंदा जो कि तुलसी का अवतार थीं का जन्म भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। श्रद्धालुओं के लिए कार्तिक पूर्णिमा का दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा को लेकर भी बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन राधा जी के साथ रासलीला रचाई थी।इन घटनाओं के अलावा कार्तिक पूर्णिमा हमारे पूर्वजों यानी पितृ पूजन के लिए भी महत्वपूर्ण है।मृत्युंजय हवनयद्यपि इस दिन महामृत्युंजय हवन किया जाता है, लेकिन वास्तव में यह कोई धार्मिक प्रक्रिया नहीं है। हवन का प्रारंभ हवनकुंड में अग्नि जलाकर किया जाता है। जैसे ही मंत्र को दोहराया जाता है वैसे ही हवनकुंड में घी डाला जाता है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।महामृत्युंजय मंत्र ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् ।उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माम्रतात् ।।मृत्युंजय हवन को समाप्त करने के बाद 108 बार ‘ॐ स्वाहा’ का जाप करें।
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👹डाकिनी मन्त्र साधना👹यह साधना अत्यंत प्राचीन है।इस साधना को करने का अधिकार तामसिक साधक को है अर्थात जो माँस मदिरा का सेवन करते हैं।सिद्ध होने पर इनके माध्यम से साधक किसी भी कार्य को सुगमता पूर्वक कर सकते है।यह क्षण मात्र में कार्य करती है।स्त्री वशीकरण, पुरुष वशीकरण, समाज के रावण, सूर्पनखाजैसे दुष्ट लोगो को दण्डित भी करती है।कार्यालयों में रुके हुए कार्य, प्रॉपर्टी के कार्य आदि को भी सुगमता से सम्पन कर देती है।।यह साधना श्मशान के किनारे, सुनसान खण्डर, कुँए अथवा बावड़ी के पास , वीराने जंगल में सिद्ध की जाती है।यह साधना मन्त्र आपको किसी भी पुस्तक से प्राप्त हो सकता है किन्तु सिद्धि विधान आपको इस पोस्ट के माध्यम से , हमारे सानिद्ध्य में अथवा किसी सिद्ध गुरु से ही प्राप्त होगा।पोस्ट में जैसी विधि कही गयी है वैसे ही करे, , तो साधक को डाकिनी सिद्ध हो जायेगी।डाकिनी का मन्त्र जाप बन्द आँखों से किया जाता है और साधना के मध्याह्म में एक बार आँख खोलकर पीली सरसों को मन्त्र से अभिमन्त्रित करके अपने चारो दिशाओ में फेंका जाता है फिर उसके बाद मन्त्र जाप किया जाता है।यह क्रिया 41 दिन करनी होती है।डाकिनी साधक के बन्द आँखों में दिखाई देती है अर्थात साधना के अंतिम दिन प्रकट होती है।कभी कभी साधक को आवाज भी देती है किन्तु डरे नही और अपने सामने रखे माँस मदिरा का भोग डाकिनी को दे, इससे वह संतुष्ट होती है और साधक को वचन देती है उसके सभी कार्य करने का और बदले में अपना भोग ग्रहण करती है।इसकी शक्ति कर्ण वैताली से ज्यादा होती है अर्थात इसमें 1000 प्रेत आत्माओ की शक्ति होती है।यह सभी भूत प्रेतों, जिन्नों, हमजादो आदि को मारकर अपने साथ ले जाती है।इसमें साधक जब भी कार्य की इच्छा करता है तुरुन्त करती है।साधक को यह बन्द आँखों में ही दिखाई देगी।1 कुशासन या बकरे या भैंसे का चर्म आसन2 बकरे की चर्बी का चिराग3 मिट्टी के वर्तन में 125 ग्राम बकरे की कलेजी अथवा माँस4 मिटटी के प्याले में सुगन्ध वाली मदिरा5 पीली सरसो 5 ग्राम रोज6 चमेली की धूप या अगरबत्ती7 निर्वस्त्र साधना करे।8 रुद्राक्ष की माला शुद्ध9 सिंदूर का तिलक अनिवार्य10 मन्त्र जाप दाहिने हाथ की ऊँगली मध्यमा और अंगूठा ।11 अमावस्या के दिन या पूर्णिमा के दिन से करे।12 दिशा उत्तर13 पवित्रीकरण, वास्तुदोष पूजन, गुरुमन्त्र, सुरक्षा मन्त्र करे।14 41 दिन की सिद्धि का संकल्प ले।15 10 माला जप करने के बाद पीली सरसों को दाहिने हाथ में रखकर 1 बार मन्त्र बोलकर फूंके और चारो दिशाओ में फ़ेंक दे फिर पुनः 11 माला मन्त्र जाप करे।16 डाकिनी जब भी साधक को आवाज दे तो साधक वचन लेकर डाकिनी सिद्ध करे।17 मन्त्र जाप बन्द आँखों से होगा।ताम्र कलश जल से भरकर रखे।18 साधना कॉल में मांस मंदिरा का सेवन एक समय करे।19 यह सिद्धि रात्रि 12 बजे से शुरू करे और सूर्यास्त से पहले पूरी 21 माला करे।20 साधक का साधना स्थल देव मन्दिरो आदि से 200 मीटर की दूरी पर हो।साधना स्थल पर किसी भी देवी देवता की मूर्ति नही होनी चाहिये।21 यह सिद्धि बाममार्गी है।22 41 वे दिन बंद आँखों में डाकिनी काली सी औरत की तरह खुले वालो वाली निर्वस्त्र दिखाई देगी तभी साधक समझ जाय की डाकिनी सिद्ध हो गयी है और भोग अर्पण करे।मांस मदिरा रोज साधना स्थल पर खुला छोड़ दे और सो जाये। 4 बजे तक साधना पूर्ण कर ले और जमीन पर माँस मदिरा डाल कर सो जाय।23 साधना काल में अनेक भयंकर आवाजे आती है यह आवाजे आत्माओ, प्रेतों, भूतो चुड़ैलों आदि इतर योनियों की होती है जो साधक इसको सिद्ध करते है उनको चाहिये की जब उनकी सभी आवश्यकताएं पूरी हो जाय तो इस सिद्धि का विसर्जन कर दे इसमें साधक को हमें अपना नाम माता , पिता का नाम फ़ोटो वर्तमान एड्रेस भेजे , तब दिव्य शक्ति प्रयोग से डाकिनी का संहार रात्रि काल में कर दिया जाता है और साधक को उस समय शरीर में एक झटका लगता है जिस समय डाकिनी का वध कर उसको डाकिनी योनि से मुक्त कर पुनर्जन्म हेतु विष्णुलोक भेज दिया जाता है।इससे साधक डाकिनी से मुक्ति पा लेता है और दूसरा डाकिनी को भी मुक्ति मिल जाती है तीसरा साधक जन भलाई करता है चौथा साधक के पास अतुल धन सम्पदा हो जाती है, जो साधक की आने वाली पीढ़ियों के लिये भी पर्याप्त होती है।( जिन साधको को कई कई साल बीत चुके है और उनको सिद्धियां प्राप्त नही हुयी है और ऐसे साधक जो गुरुओ को निरंतर बदलते रहते है, संपर्क कर सकते है, उनको प्रथम बार में सिद्धि सिद्ध करायी जा सकती है, धनलोभी साधक संपर्क न करे।)मन्त्रॐ स्यार की खवासिनी समन्दर पार धाईआव बैठी हो तो आवठाडी हो तो ठाडी आवजलती आ उछलती आन आये डाकिनी तो जालंधर पीर की आनशब्द साँचापिण्ड काँचाफुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ।
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तीन साल में 66 वर्ष का युवा 8000 किमी के हाइवे बनवाकर50 लाख मकान बनवाकरकरोडो शौचालय बनवाकर6 नए एम्स बनवाकर3 नयी पनडुब्बियां बनवाकरतेजस विमान हिन्दुस्तान में बनवाकरधनुष तोप दिलाकरOrop देकरसर्जिकल स्ट्राइक करकेतीनो सेना को मजबूत बना कर65 देशों से व्यापारिक रिश्ते बनाकरचीन को पीछे छोड़करविकास दर 7.5के ऊपर ले जाकरमहगाई 5 से नीचे लाकरफसल बीमा देकर12 रु में 2 लाख का बीमा देकरनोटबंदी करके नक्सलियों पाकिस्तानियो को दुखी करकेराफेल विमान का सौदा करकेसऊदी अरब में शेख से मंदिर बनवा केबुरहान वानी को ऊपर पहुचा केअलगाववादी कश्मीरियों को औकात में लाके। बस सब की गालियाँ खाता है। जो काम करता है, वो कभी ये नहीं कहता कि*काम बोलता है*क्योंकि *काम दिखता है।**"मोदी जी"* आप को "शर्म" आनी चाहिए कि आपने "अपने परिवार" और अपने भाइयों को अपनी "कैबिनेट" में या "राजनीति" में लाने का ज़रा भी "प्रयास नहीं किया" आप को इस बात के लिए भी "शर्म" आनी चाहिए कि आप के "भाई" साधारण नागरिक का जीवन जी रहे हैं और आप की "भतीजी गरीबी" में "मर गई" !! *"मोदी जी"* आप को "शासन चलाने" की कला *"मुलायम सिंह"* से "सीखनी" चाहिए जहाँ "सैफई" के उनके परिवार के करीब "36 सदस्य" आज *"उत्तर प्रदेश"* में "ब्लाक प्रमुख" के पदों पर सुशोभित हैं वही *"मुलायम सिंह"* जिन्हें "दो वक़्त की रोटी" भी मुश्किल से नसीब होती थी आज *"करोडपति"* ही नहीं *"अरबपति"* हैं !! "30 वर्ष" पहले *"बहन मायावती"* का "पूरा परिवार" दिल्ली में "एक कमरे" में रहा करता था, आज *"मायावती के भाई"* का "बंगला" सुन्दरता में *"ताज महल"* को भी "मात" दे रहा है !! *"देवगोडा"* अपने "पोते" को *"100 करोड़" की "बहु भाषाई फिल्म"* में बतौर *"सुपर हीरो"* उतार रहे हैं, "कर्नाटक" के "हासन जिले" में "आधी से ज्यादा" खेती की ज़मीन *"देवगोडा परिवार"* की है !! *"कर्नाटक" के मुख्यमंत्री "सिद्धारमैया"* का "बेटा" जो "सरकारी अस्पताल" में *"मुख्य चिकित्सक"* है और *"छोटा पुत्र" जिसका अभी हाल में "निधन" हुआ है, उसका "ब्रुसेल्स" में बड़ा कारोबार है, और उसके बच्चे "जर्मनी" में "पढ़" रहे हैं* *"सोनिया का दामाद"* जो कि "मुरादाबाद" में "पुराने पीतल" के आइटम "बेचा" करता था, आज *"पांच सितारा होटल" का "मालिक"* है, उसका *"शिमला" में एक "महल" है और "लक्ज़री कारों" का "मालिक" है* !!जबकि *"आप की माँ" आज भी "ऑटोरिक्शा" में चलती है और आप के "भाई ब्लू कालर जॉब" यानि मेंहनत "मजदूरी" कर रहे हैं और आप की एक "भतीजी" शिक्षामित्र है (आप उसे टीचर की नौकरी भी नहीं दिलवा पाए ) जो कि दूसरो के "कपडे सिलती" है तथा "ट्यूशन पढ़ा" कर अपनी "जीविका" चला रही है* !! *"मोदी जी"* देश बहुत "शर्मिंदा" है कि आप "प्रधानमंत्री" होते हुए भी अपने "भाइयों" को "MLA या MP" का "टिकट नहीं दिलवा पाए" आप "चाहते" तो अपनी "बहनों" को "राज्य सभा" में "MP" बनवा सकते थे और आप के *"जीजा", * "जिला स्तर" के "चुनाव लड़" कर "ब्लाक प्रमुख" तो बन ही सकते थे, *आप "सीखने" में बहुत "सुस्त" हैं* "15 वर्ष" तक "गुजरात" में और *"प्रधानमंत्री"* का "आधा कार्यकाल", *"दिल्ली"* में बिताने के बाद भी आप *"लालू, मुलायम, सोनिया गाँधी, बहन मायावती"* से कुछ भी "नहीं सीखे" और अपनी "रसोई का खर्च" भी "खुद वहन" कर रहे हैं !! ------------------------------------- उपरोक्त बातो से हमे *"शर्मिंदा"* तो होना पड़ा लेकिन उतना ही *"गर्व"* भी है कि हमने अपने जीवन का *"पहला वोट" , "2014" में एक बहुत ही "ईमानदार और देशभक्त इंसान" को वोट दिया "हम सभी गर्व" करते है की हमे अपने जीवन में आप जैसे देशभक्त का मार्गदर्शन मिला सच में "ईमानदारी और कर्तब्यनिष्ठा" की "पराकाष्ठा" है* ------------------------------------मेरे भाइयों ! इस मैसेज को ब्लास्ट कर ही दीजिए ! देशहित के लिए जरूरी है !! -------------------------------------
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✡ज्योतिष वास्तु संस्कार✡ ग्रुप की सादर भेंटShiv Shakti jyotish 9425964795🕉🕉🕎🕉🕉indoreक्या होता हैं तांत्रिक प्रयोग आज का विषय क्या होता हैं उच्चाटन➰〰➰〰➰〰➰दोस्तो, नमस्कार , मैं हंस जैन खण्डवा मध्प्रदेश से आज आपके लिये तंत्र विद्या की एक और जानकारी लाया हूं । वैसे मैं कोई तांत्रिक नही हूं, न ही तान्त्रिक क्रिया करता हूं । पर समस्या आने पर उसका उपचार जरूरी होता हैं इसलिये हर विषय की जानकारी जीवन मैं आबश्यक होती है, इसलिये अवगत करा रहा हूं। जिंदगी मैं कई प्रकार की समस्या होती है, कुछ समस्याओं के हल हम आसपास , दोस्तो आदि की सलाह से प्राप्त कर लेते । पर कई समस्या ऐसी भी होती है जिनका हल हर मुश्किल मैं नही निकल पाता । कई इंसान इस तरह के होते हैं जो सबके लिये कुछ न कुछ सेवा करते रहते हैं, सबके लिये समर्पित रहते हैं । पर जब उनका समय आता हैं तो कोई उनका साथ नही देता । खैर तन्त्र विद्या ईश्वर ने हमे हमारी बुराई और अपने और अपनों के जीवन मे आने वाली बाधाओं को दूर करने हेतु बनाई या मार्गदर्शित की है।लेकिन हम आप या कुछ अज्ञानी तांत्रिक इनका प्रयोग गलत रूप मैं करते हैं । दरअसल तन्त्र एक ऐसी विधा है जिसके सही प्रयोग और सही मार्गदर्शन से हम कम समय मैं अधिक उपलब्धि हासिल कर सकते हैं। पर उसके लिये उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता जरूरी है । जैसे आपको कोई समस्या आती है, या आपके जीवन मैं कोई ग्रहदशा खराब आई है तो सामान्य रूप से एक ज्योतिष आपको कुछ वस्तु दान देने हेतु निर्देशित करता है, लेकिन उसने शायद ये नही बताया कि किस वस्तु का दान कब करना, और किसको दान करना, किस समय दान करना। वैसे दान का कोई समय नही होता , पर किसी विशेष ग्रह की शांति हेतु विशेष समय होता हैं । जैसे आपको सूर्य देव को जल से अर्घ्य देना तो शाम 4 बजे थोड़े ही दोगे । एक समय सुबह का निर्धारित है । चलिये उच्चाटन के बारे में समझाता हूं । पहले सकारात्मक पहलू की बात करता हूं । उच्चाटन का मतलब किसी इंसान को उस जगह से उच्चाटीत करना या हटाना जो उसकी नही हो या उस जगह वो जबरन कब्जा किया बैठा हो, या उसकी आसक्ति उस जगह हो गयी हो। कोई ऐसे सम्बन्ध का इच्छुक हो जिससे पारिवारिक मान-मर्यादा , सस्कार का उल्लंघन हो रहा हो , , कोई किसी पर अनावश्यक आसक्त हो , कोई किसी को अकारण परेशान कर रहा हो , किसी से किसी की दुरी बनाने की आवश्यकता हो , किसी का मन किसी के प्रति उचाटना हो , , किसी पर किसी बाहरी हवा आदि का प्रभाव हो उसे उचाटना हो , बुरे ग्रहों के प्रभाव का उच्चाटन करना हो , ग्रह प्रतिकूलता का उच्चाटन करना हो , दरिद्रता -अशांति-कलह का उच्चाटन करना हो , हटाना हो , , किसी ने किसी की संपत्ति पर कब्जा कर रखा हो और न हट रहा हो , उसका मन उस संपत्ति से उच्चाटित करना हो , आदि आदि समस्याए हो तो उच्चाटन का प्रयोग बेहद लाभदायक हो सकता है | अब इसका जो नकारात्मक पहलू ये हैं कि कभी आपने ये देखा होगा कि एक व्यापारी की दुकान बहूत अच्छी चल रही, दिन रात मेहनत करके जीवन की ऊँचाई हासिल की , कोई उसकी तरक्की से जल रहा या उस दुकान को खरीदना चाहता व्यापारी नही बेचना चाहता। अचानक कुछ दिनों से उस व्यापारी का मन दुकान जाने का नही करे, या जब भी वो दुकान पर जाए, तो अजीब सा महसूस करे, थकान सी आये, घबराहट सी होने लगे, मन बैचेन होने लगे, और परिणाम कुछ दिनों बाद दुकान बंद करना पड़े । आमभाषा मैं हम ये समझेंगे की तबीयत खराब होने की वजह से ये समस्या आ रही है, लेकिन किसी तांत्रिक ने दुकान के बाहर उच्चाटन प्रयोग कर आपकी दुकान से आपको बेदखल करने की पूरी तैयारी कर ली है। इस प्रयोग के बाद आपसे आपकी करोडो की दुकान चंद लाख रूपयो मैं कोई खरीद लेता है । एक और उदाहरण आपका एक मौके की जगह प्लाट हैं, हर कोई मुँहमाँगा कीमत पर खरीदने हेतु तैयार हैं, पर आपने उस जगह मकान बना लिया, परिवार सहित शिफ्ट हो गए। लेकिन कुछ समय बाद उस घर मे रहने पर सभी विचलित हो गए, अजीब से ख्याल, मन नही लगता, रात को सो नही पा रहे, घर आते ही भाग जाने या बाहर जाने का मन होता । जब तक आप बाहर रहते खुश रहते पर घर मैं प्रवेश करते ही चिड़चिड़े हो जाते । आखिर उस मकान को प्लाट की कीमत से भी कम कीमत मैं बेच कर चले जाते । कई लोग इस विद्या के शिकार हुए हैं । इस विद्या मैं भी आपके घर मैं अभिमंत्रित करके कोई ऐसी वस्तु फेंक दी जाती है जिसके बाद घर से आपका उच्चाटन या यूं कहिये की मोह भंग हो जाता हैं । क्या करे जब ऐसी स्थिति हो? क्या उच्चाटन से बचा जा सकता । कल जानते हैं । आज का उपाय🔯🔯✡🔯🔯✡🔯 जब आपको घर मैं नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश लगे, या घर मैं आते ही घर के सदस्य चिड़चिड़ापन करे तो ऐसी स्थिति मे घर से नेगेटिव शक्ति को हटाने के लिये नल के आम पानी मैं 2 बून्द किसी पवित्र नदी का जल , 2 बून्द गौ मित्र मिलाकर एक कटोरी मे भर लें और इसे 3 से 4 घंटे तक इससे सूरज की रोशनी में पड़ा रहने दें तब भी ये पानी चार्ज होकर शुद्धिकरण के लिए तैयार है कटोरी को हाथ में लेकर ईश्वर से प्रार्थना करते हुये घर की नकारात्मक वायु का अंत हो ऐसा सोचे तथा शुद्धिकरण के लिए ताज़ा आम या अशोक पत्तियों से आप सारे घर में इस जल के छींटे दे। इस प्रयोग को लगातार 1 सप्तहा तक करे , फिर सप्तहा मैं एक बार और खास तौर पर हर माह की संक्राति पर जो प्रतिमाह 14 से 16 तारीख़ के बीच आती है अवश्य करें ।
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5 सोमवार का संयोग:--सावन का पूरा महीना ही जहां अराधना के लिए विशेष है तो वहीं 5 दिन सावन सोमवार के भी भक्तों के लिए व्रत रखने को मिलेंगे। प्रथम सावन सोमवार 10 जुलाई को, दूसरा 17 जुलाई को, तीसरा 24 जुलाई, चौथा सोमवार 31 जुलाई और 5वां सोमवार 7 अगस्त को होगा। इस दिन भाई बहन के पवित्र बंधन का त्यौहार रक्षाबंधन भी मनेगा।इस मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर कुछ विशेष वास्तु अर्पित की जाती है जिसे शिवामुट्ठी कहते है।1. प्रथम सोमवार को कच्चे चावल एक मुट्ठी, 2. दूसरे सोमवार को सफेद तिल् एक मुट्ठी, 3. तीसरे सोमवार को खड़े मूँग एक मुट्ठी, 4. चौथे सोमवार को जौ एक मुट्ठी और5. यदि जिस मॉस में पांच सोमवार हो तो पांचवें सोमवार को सतुआ चढ़ाने जाते हैं। यदि पांच सोमवार न हो तो आखरी सोमवार को दो मुट्ठी भोग अर्पित करते है।माना जाता है कि श्रावण मास में शिव की पूजा करने से सारे कष्ट खत्म हो जाते हैं। महादेव शिव सर्व समर्थ हैं। वे मनुष्य के समस्त पापों का क्षय करके मुक्ति दिलाते हैं। इनकी पूजा से ग्रह बाधा भी दूर होती है।1. *सूर्य* से संबंधित बाधा है, तो विधिवत या पंचोपचार के बाद लाल आक के पुष्प एवं पत्तों से शिव की पूजा करनी चाहिए।2. *चंद्रमा* से परेशान हैं, तो प्रत्येक सोमवार शिवलिंग पर गाय का दूध अर्पित करें। साथ ही सोमवार का व्रत भी करें।3. *मंगल* से संबंधित बाधाओं के निवारण के लिए गिलोय की जड़ी-बूटी के रस से शिव का अभिषेक करना लाभप्रद रहेगा।4. *बुध* से संबंधित परेशानी दूर करने के लिए विधारा की जड़ी के रस से शिव का अभिषेक करना ठीक रहेगा।5. *बृहस्पति* से संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए प्रत्येक बृहस्पतिवार को हल्दी मिश्रित दूध शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए।6. *शुक्र* ग्रह को अनुकूल बनाना चाहते हैं, तो पंचामृत एवं घृत से शिवलिंग का अभिषेक करें।7. *शनि* से संबंधित बाधाओं के निवारण के लिए गन्ने के रस एवं छाछ से शिवलिंग का अभिषेक करें।8-9. *राहु-केतु* से मुक्ति के लिए कुश और दूर्वा को जल में मिलाकर शिव का अभिषेक करने से लाभ होगा।शास्त्रों में मनोरथ पूर्ति व संकट मुक्ति के लिए अलग-अलग तरह की धारा से शिव का अभिषेक करना शुभ बताया गया है। अलग-अलग धाराओं से शिव अभिषेक का फल- जब किसी का मन बेचैन हो, निराशा से भरा हो, परिवार में कलह हो रहा हो, अनचाहे दु:ख और कष्ट मिल रहे हो तब शिव लिंग पर दूध की धारा चढ़ाना सबसे अच्छा उपाय है। इसमें भी शिव मंत्रों का उच्चारण करते रहना चाहिए।1. *वंश की वृद्धि के लिए* शिवलिंग पर शिव सहस्त्रनाम बोलकर घी की धारा अर्पित करें।2. शिव पर जलधारा से अभिषेक *मन की शांति के लिए* श्रेष्ठ मानी गई है।3. *भौतिक सुखों को पाने के लिए* इत्र की धारा से शिवलिंग का अभिषेक करें।4. *बीमारियों से छुटकारे के लिए* शहद की धारा से शिव पूजा करें।5. गन्ने के रस की धारा से अभिषेक करने पर हर *सुख और आनंद मिलता है*।6. सभी धाराओं से श्रेष्ठ है गंगाजल की धारा। शिव को गंगाधर कहा जाता है। शिव को गंगा की धार बहुत प्रिय है। गंगा जल से शिव अभिषेक करने पर *चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है।* इससे अभिषेक करते समय महामृत्युंजय मन्त्र जरुर बोलना चाहिए।कार्य सिद्धि के लिए:--1. हर ‍इच्छा पूर्ति के लिए हैं अलग शिवलिंगपार्थिव शिवलिंग हर कार्य सिद्धि के लिए।2. गुड़ के शिवलिंग प्रेम पाने के लिए।3. भस्म से बने शिवलिंग सर्वसुख की प्राप्ति के लिए।4. जौ या चावल या आटे के शिवलिंग दाम्पत्य सुख, संतान प्राप्ति के लिए।5. दही से बने शिवलिंग ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए।6. पीतल, कांसी के शिवलिंग मोक्ष प्राप्ति के लिए।7. सीसा इत्यादि के शिवलिंग शत्रु संहार के लिए।8. पारे के शिवलिंग अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के लिए।पूजन में रखे इन बातों का ध्यान:--1. सावन के महीने में शिवलिंग की करें पूजा शिवलिंग जहां स्थापित हो पूरव् दिशा की ओर मुख करके नहीं बैठें।2. शिवलिंग के दक्षिण दिशा में ही बैठकर पूजन करें।ये होता है अभिषेक का फल:--1. दूध से अभिषेक करने पर परिवार में कलह, मानसिक पीड़ा में शांति मिलती है।2. घी से अभिषेक करने पर वंशवृद्धि होती है।3. इत्र से अभिषेक करने पर भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है।4. जलधारा से अभिषेक करने पर मानसिक शान्ति मिलती है।5. शहद से अभिषेक करने पर परिवार में बीमारियों का अधिक प्रकोप नहीं रहता।6. गन्ने के रस की धारा डालते हुये अभिषेक करने से आर्थिक समृद्धि व परिवार में सुखद माहौल बना रहता है।7. गंगा जल से अभिषेक करने पर चारो पुरूषार्थ की प्राप्ति होती है। 8. अभिषेक करते समय महामृत्युंजय का जाप करने से फल की प्राप्ति कई गुना अधिक हो जाती है। 9. सरसों के तेल से अभिषेक करने से शत्रुओं का शमन होता।ये भी मिलते हैं फल:--9. बिल्वपत्र चढ़ाने से जन्मान्तर के पापों व रोग से मुक्ति मिलती है।10. कमल पुष्प चढ़ाने से शान्ति व धन की प्राप्ति होती है।11. कुशा चढ़ाने से मुक्ति की प्राप्ति होती है।12. दूर्वा चढ़ाने से आयु में वृद्धि होती है।13. धतूरा अर्पित करने से पुत्र रत्न की प्राप्ति व पुत्र का सुख मिलता है।14. कनेर का पुष्प चढ़ाने से परिवार में कलह व रोग से निवृत्ति मिलती हैं।15. शमी पत्र चढ़ाने से पापों का नाश होता, शत्रुओं का शमन व भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है।*🙌🙌हर-हर🙏महादेव🙌🙌*
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निर्बल या अस्त ग्रह की पहचान करते समय ग्रह का सूर्य से अंतर भी देखा जाता । कुछ अंतर में सूर्य से नज़दीक के ग्रह अस्त के माने जाते हो निर्बल हो जाते हैं या अपना पूरा प्रभाव नहीं दे पाते । कौन से ग्रह सूर्य से कितने अंतर पर अस्त का माना जाता ये हम आप को बताने जा रहे हैं ।कोई भी ग्रह जब सूर्य से एक निश्चित दूरी के अंदर आ जाता है तो सूर्य के तेज से वह ग्रह अपनी आभा तथा शक्ति ख देता है । ग्रह सूर्य से जितना नज़दीक उतना उसका बल काम माना जाता है और उस ग्रह को अस्त का ग्रह मन जाता है । प्रत्येक ग्रह की अंशात्मक अस्त ता सूर्य से दूरी कितने अंश इस बात से सुनिश्चित किया जाता है ।प्रत्येक ग्रह सूर्य से निम्नलिखितदूरी के अंतर पर अस्त हो जाता है :चन्द्रमा सूर्य के दोनों ओर 12° डिग्री या इससेअधिक समीप आने पर अस्त माना जाता हैं।मंगल सूर्य से 7° या उस से कम अंतर पर अस्त का माना जाता है ।बुध सूर्य के दोनों ओर 14° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं। किन्तु वक्री बुध सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माना जाएगा ।गुरू सूर्य के दोनों ओर 11° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं।शुक्र सूर्य के दोनों ओर 10° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं। यदि शुक्र वक्री चल रहा हो तो सूर्य के दोनों ओर 8 डिग्री या इससेअधिक समीप आने पर अस्त माना जाता हैं।शनि सूर्य के दोनों ओर 15° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं। राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण अस्त वाला सिद्धांत उन्हें लागू नही होता ।
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निर्बल या अस्त ग्रह की पहचान करते समय ग्रह का सूर्य से अंतर भी देखा जाता । कुछ अंतर में सूर्य से नज़दीक के ग्रह अस्त के माने जाते हो निर्बल हो जाते हैं या अपना पूरा प्रभाव नहीं दे पाते । कौन से ग्रह सूर्य से कितने अंतर पर अस्त का माना जाता ये हम आप को बताने जा रहे हैं ।कोई भी ग्रह जब सूर्य से एक निश्चित दूरी के अंदर आ जाता है तो सूर्य के तेज से वह ग्रह अपनी आभा तथा शक्ति ख देता है । ग्रह सूर्य से जितना नज़दीक उतना उसका बल काम माना जाता है और उस ग्रह को अस्त का ग्रह मन जाता है । प्रत्येक ग्रह की अंशात्मक अस्त ता सूर्य से दूरी कितने अंश इस बात से सुनिश्चित किया जाता है ।प्रत्येक ग्रह सूर्य से निम्नलिखितदूरी के अंतर पर अस्त हो जाता है :चन्द्रमा सूर्य के दोनों ओर 12° डिग्री या इससेअधिक समीप आने पर अस्त माना जाता हैं।मंगल सूर्य से 7° या उस से कम अंतर पर अस्त का माना जाता है ।बुध सूर्य के दोनों ओर 14° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं। किन्तु वक्री बुध सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माना जाएगा ।गुरू सूर्य के दोनों ओर 11° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं।शुक्र सूर्य के दोनों ओर 10° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं। यदि शुक्र वक्री चल रहा हो तो सूर्य के दोनों ओर 8 डिग्री या इससेअधिक समीप आने पर अस्त माना जाता हैं।शनि सूर्य के दोनों ओर 15° डिग्री या इससे अधिकसमीप आने पर अस्त माना जाता हैं। राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण अस्त वाला सिद्धांत उन्हें लागू नही होता ।
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