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वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में क्यों लगानी चाहिए दौड़ते हुए घोड़ों की तस्वीर ❓ जीवन में सफलता हासिल करने के लिए सबसे जरूरी होता है इंसान को ऊर्जावान होना. स्वस्थ होना. अगर आप ऊर्जा से भरपूर हैं और आपमें कार्य करने की क्षमता प्रबल है तो सफलता आपके कदम चूमेगी, इसमें कोई दो राय नहीं. आज हम आपको घोड़े की तस्वीर से रिलेटेड उपाय के बारे में बताएंगे, जो आपकी किस्मत को चमकाने में काफी सहायक होंगे. वास्तु शास्त्र के अनुसार अगर आप अपने घर या दफ्तर में दौड़ते हुए घोड़े की तस्वीर लगाते हैं, तो यह आपके कार्य में गति प्रदान करता है. दौड़ते हुए घोड़े सफलता, प्रगति और ताकत के प्रतीक होते हैं. खासकर 7 दौड़ते हुए घोड़े व्यवसाय की प्रगति का सूचक माने गए हैं, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार 7 अंक सार्वभौमिक है, प्राकृतिक है. ध्यान देने वाली बात है कि इंद्रधनुष के रंग 7 होते हैं, सप्त ऋषि, शादी में सात फेरे, सात जन्म इत्यादि इसलिए 7 नंबर को प्रकृतिक और सार्वभौमिक माना गया है. इसलिए सात घोड़ों की तस्वीर को सर्वोतम माना गया है. व्यापार में प्रगति के लिए अपने ऑफिस की केबिन में 7 दौड़ते हुए घोड़ों की तस्वीर लगाएं. इन तस्वीरों को लगाते हुए इस बात का ध्यान रखें कि घोड़ों का मुंह ऑफिस के अंदर की ओर आते हुए होना चाहिए और दक्षिण दीवार पर तस्वीर लगानी चाहिए. दोस्तों दौड़ते हुए घोड़े प्रगति के प्रतीक होते हैं. ये कार्य में गति प्रदान करते हैं और जो व्यक्ति बार – बार इन घोड़ों को देखता है, इसका सीधा असर व्यक्ति की कार्यप्रणाली पर पड़ता है. अतः ये घोड़े आपके कार्य में गति प्रदान कर सफलता दिलाने में मददगार साबित होंगे. 7 घोड़ों की तस्वीर घर में लगाने से जीवन में धन संबंधी ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को नहीं मिलते. स्थाई रूप से घर में लक्ष्मी का निवास होता है. इसके लिए घर के मुख्य हॉल के दक्षिणी दीवार पर, घर के अंदर आते हुए मुख वाले घोड़े की तस्वीर लगाना चाहिए. घोड़े की तस्वीर खरीदते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि घोड़े का चेहरा प्रसन्नचित मुद्रा में हो, ना कि आक्रोशित हो. दोस्तों ध्यान रखें की घोड़े शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक हैं और खासकर सफेद घोड़े सकारात्मक ऊर्जा के प्रतीक होते हैं. इसलिए घर और ऑफिस की नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा को लाने के लिए सफेद 7 घोड़े की तस्वीर लगानी चाहिए. अगर आप कर्ज से परेशान हैं तो घर या दफ्तर के उत्तर – पश्चिमी दिशा में आर्टिफिशियल घोड़े का जोड़ा रखें. विशेष ध्यान रखने वाली बात यह है कि कभी भी टूटी फूटी तस्वीर घर में ना रखें. या धुंधली तस्वीर भी ना रखें. जिस तस्वीर में अलग-अलग दिशा में घोड़े दौड़ते नजर आए वह तस्वीर ना लगाएं. तो दोस्तों यह हैं कुछ दौड़ते घोड़ों की तस्वीर के नुस्खे. जिसे अपने घरों या दफ्तरों में लगाकर आप सफलता की सीढ़ी आसानी से तय कर सकते हैं. इससे घर में सुख समृद्धि और लक्ष्मी का वास होता है. कुछ ध्यान रखने वाली बातें भी हमने आपको बताइ हैं.
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*वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के बाहर अपना नेम प्लेट ऐसी जगह लगनी चाहिए जिससे लोगों की नजर पड़े"* > अगर आपने नेम प्लेट को अंदर की ओर लगाया है जो की दिख नही रहा है तो आप दुनिया की नजरों से ओझल हो जाओगे > आपका नेम प्लेट साफ सुथरा होना चाहिए > अगर आपकी कोई दुकान , आफिस या व्यवसायिक संस्थान है तो आपका बोर्ड दूर से ही नजर आना चाहिए > नेम प्लेट या बोर्ड साफ शब्दों में होना चाहिए > नेम प्लेट या बोर्ड आकर्षक होना चाहिए > नेम प्लेट या बोर्ड के रंगो का चयन करते समय अपने कुंडली के लाभदायक ग्रहों का सहारा लेना चाहिए > अगर आपके घर का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है तो नेम प्लेट को इशान की ओर लगायें > अगर आपके घर का मुख्य प्रवेश द्वार पश्चिम की ओर है तो नेम प्लेट को वायव्य की ओर लगायें > अगर आपके घर का मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर की ओर है तो नेम प्लेट को इशान की ओर लगायें > अगर आपके घर का मुख्य प्रवेश द्वार दक्षिण की ओर है तो नेम प्लेट को आग्नेय की ओर लगायें
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*ॐ मकर सक्रान्ति पर दुर्लभ संयोग :--* -------------------------------------------------- पुण्यकाल 15 तारीख को अमृत सिद्धि योग में भगवान सूर्य देव 14 जनवरी सोमवार को रात्रि 7.52 बजे उतराषाढ़ा नक्षत्र के दूसरे चरण मकर राशि में प्रवेश करेगें। उस समय चन्द्र देव अश्विनी नक्षत्र मेष राशि में विचरण करेगें। इस अवधि में सिद्धि योग व बवकरण रहेगा। संक्रांति का वाहन सिंह (शेर) उप वाहन हाथी है। वार नाम व नक्षत्र नाम ध्वांक्षी है। जो उद्योगपतियों, व्यापारियों, आयात- निर्यात करने वालो, शेयर कारोबारियों के लिये सुख फलदायक है। संक्रांति का उत्तर दिशा की और गमन एवं ईशान कोण पर दृष्टि है। जिसके प्रभाव से देश के उत्तरी प्रांतों एवं उत्तरी क्षैत्रों के लिए कष्टकारक योग बनेगें। देवजाति की यह संक्रांति शरीर पर कस्तूरी का लेप लगाकर सफेद वस्त्र पहने, फिरोज के आभूषण धारण कर पुनांग का पुष्प एवं माला पहने, हाथों में शस्त्र भाला लेकर, सोने का पात्र लिये हुये अन्न का भोजन कर वैश्य के घर में प्रवेश कर रही है, जो 30 मुहूर्त वाली है। जिससे सभी धान्य पदार्थो के भाव स्थिर रहेगें। चावल, फल-फूल, सब्जी, सुगन्धित पदार्थ, सुत, कपास, वस्त्र, धातु, सोना-चांदी, सफेद वस्तुओं के भाव तेज होगें। शेयर बाजार में तेजी आयेगी। संक्रान्ति रात्रि एक याम व्यापिनी होने से आतंकवादियों, हिसंक प्रवृत्ति वालों, देश द्रोहियों के लिये कष्ट कारक रहेगी। शिव शक्ति ज्योतिष, ज्योतिष संस्थान प के निदेशक ज्योतिषाचार्य पंडित चेतन कुमार जोशी ने बताया कि वेदों में सूर्य उपासना को सर्वोपरि माना गया है। जो आत्मा, जीव, सृष्टि का कारक एक मात्र देवता है। जिनके हम साक्षात रूप से दर्शन करते है। सूर्य देव कर्क से धनु राशि में 6 माह भ्रमण कर दक्षिणयान होते है, जो देवताओं की एक रात्रि होती है। सूर्य देव मकर से मिथुन राशि में 6 माह भ्रमण कर उत्तरायण होते है, जो एक दिन होता है। जिस में सिद्धि साधना पुण्यकाल के साथ- साथ मांगलिक कार्य-- विवाह, गृह प्रवेश, जनेउ इत्यादि संस्कार, देव प्राण- प्रतिष्ठा, मुंडन कार्य आदि सम्पन्न होते है। सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते है। अतः इस संक्रमण को मकर संक्रांति कहा जाता है, जिस में स्वर्ग के द्वार खुलते है। 'मुहुर्त चिंतामणी' के अनुसार सूर्य संक्रांति समय से 16 घटी पहले एवं 16 घटी बाद तक का पुण्य काल होता है। 'निर्णय सिन्धु' के अनुसार मकर संक्रांति का पुण्यकाल संक्रांति से 20 घटी बाद तक होता है। किन्तु सूर्यास्त के बाद मकर संक्रांति प्रदोष काल- रात्रि काल में हो तो पुण्यकाल दूसरे दिन माना जाता है। इस वर्ष संक्रांति का शुभारंभ 14 सोमवार की रात्रि को 7.52 बजे होने से पंचागों की गणना अनुसार पुण्यकाल दिन में 1.28 बजे से होगा। किन्तु संक्रांति रात्रि एक याम व्यापिनी होने से ग्रन्थों के अनुसार संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी मंगलवार को सूर्योदय 7.21 बजे से दिन में 11.52 बजे तक रहेगा। जिस में अमृत सिद्धि योग दोपहर 1.56 बजे तक एवं उपरांत रवि योग का अदभुत संयोग होगा। इस पुण्यकाल समय अर्थात अमृत सिद्धि योग, रवि योग में दान- पुण्य- स्नान आदि समस्त कार्य करने से हजार गुना फल मिलेगा। पद्मपुराण के अनुसार इस संक्रांति में ऋतुओं के अनुकूल वस्तुओं, पदार्थो, तिल, गुड़, खिचड़ी, मिष्ठान्न, बर्तन, कपास, ऊनी वस्त्र आदि वस्तुओं के दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। भगवान सूर्य देव को लाल वस्त्र, गैंहू, गुड, मसूर की दाल, तांबा, सोना, सुपारी, लाल फल, लाल पुष्प, नारियल, आदि दक्षिणा के साथ दान करने से सामान्य दिन की अपेक्षा हजार गुना फल मिलता है। संक्रांति का राशि अनुसार फल मिलेगा। *जैसे मेष, मिथुन, वृश्चिक राशि वालों को सोने के पाये में होने से शुभ फलदायक है।* *सिंह, धनु, मीन राशि वालों को चांदी के पाये होने से शुभाशुभ मिश्रित फलदायक है।* *कर्क, तुला, कुंभ राशि वालों को तांबे के पाये होने से मध्यम फलदायक है।* *वृष, कन्या, मकर राशि वालों को लोहे के पाये होने से न्यूनतम फलदायक है।*
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*सूर्य देव को जल देने की सही विधि क्या है और सूर्य को अर्ध्य देते समय भूलकर भी ये गलतियाँ नही करें?* हिन्दू धर्म में सनातनकाल से ही सूर्य देव की पूजा करने की परंपरा चली आ रही है। सूर्य देव की पूजा में सूर्य को जल देना जिसे हम सूर्य को अर्ध्य देना भी कहते है सबसे महत्वपूर्ण है। सम्पूर्ण सृष्टि में उर्जा के एकमात्र स्त्रोत सूर्यदेव ही है। इस सृष्टि के सृजन में भी सूर्यदेव का बहुत महत्व है। इसलिए सूर्य देव की पूजा हमको स्पष्ट रूप से फल प्रदान करने वाली है। विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में विशेषरूप से अंकित की गई है। सूर्यदेव के उदय होते ही संपूर्ण विश्व का अंधकार दूर हो जाता है और चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश फैल जाता है। सृष्टि के महत्वपूर्ण आधार सूर्य देव ही हैं। सूर्य की किरणों को आत्मसात करने से शरीर और मन स्फूर्तिवान होता है। स्वास्थ्य संबधी समस्याएं होने पर या जीवन में किसी भी प्रकार की अन्य समस्या होने होने पर सूर्य पूजा से अवश्य ही लाभ प्राप्त होता है। शरीर से रोगों को दूर करने में सूर्य देव की आराधना करना सर्वोतम होता है। यदि आप नियमित रूप से सूर्य देव को जल देते है तो आप में नेतृत्व करने की क्षमता का विकास होता है। शरीर बलवान, निरोग, हष्ट-पुष्ट, सकारात्मक सोच, तेज पराक्रम और उत्साह की वृद्धि होती है। सूर्य देव को पिता, स्वास्थ्य, राज्य और औषधि का कारक माना गया है। इसलिये पिता की सेवा करने से पिता का आदर सम्मान करने से सूर्य देव स्वतः ही प्रसन्न होने लगते है। यदि आप सूर्य देव की आराधना द्वारा सूर्य देव को प्रसन्न करते है तो आपके जीवन से हर बाधा नष्ट होने लगती है व जीवन में प्रसन्नता का संचार होने लगता है। आइये जानते है किन-किन जातकों को सूर्य देव को जल देना चाहिए या उनकी उपासना करनी चाहिए : – जिस किसी जातक की कुंडली में सूर्य कमजोर हो। जिस किसी जातक में आत्मविश्वास की कमी हो उन्हें सूर्य को जल अवश्य देना चाहिए। जो व्यक्ति एक निराशावादी जीवन जीने को मजबूर हो रहा है उसे सूर्य देव की उपासना अवश्य करनी चाहिए। जो जातक घर-परिवार में और समाज में मान-सम्मान चाहते है उन्हें भी सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिए। प्रशासन में अच्छे पद की इक्षा रखने वाले छात्र भी सूर्य देव की उपासना अवश्य करें। सूर्य देव की उपासना के प्रकार : – सूर्य देव को प्रसन्न करने के कई प्रकार के उपाय है जैसे :- नवगृह मंदिर जाकर सूर्य देव की पूजा करना , पिता की सेवा करना व उनका सदैव आदर करना, सूर्यमंत्र या गायत्री मन्त्र जप करना और सूर्य को जल देना जिसे हम सूर्य को अर्ध्य देना भी कहते है। सूर्य को अर्ध्य देकर सूर्यदेव को प्रसन्न करना बहुत सरल है। प्रारंभ में आप सूर्य को जल देकर व पिता की सेवा करके सूर्य देव को प्रसन्न कर सकते है। सूर्य को जल देने की सही विधि : – सूर्य उदय के एक घंटे बाद तक ही सूर्य को जल देना सही होता है। सूर्य उदय के एक घंटे के भीतर अर्ध्य देने से सूर्य देव प्रसन्न होते है। प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत होकर किसी खुले स्थान में जाए जहाँ से सूर्यदेव आपको स्पष्ट दिखाई देतें हो। अब आप पूर्व दिशा की तरफ मुख करके खड़े हो जाये। एक तांबे के पात्र में जल भरकर इसमें थोड़े चावल , थोड़ी चीनी, पुष्प डाले व कुमकुम द्वारा जल में छीटे लगाये। अब आप सूर्य देव के सामने खड़े होकर तांबे के पात्र से दोनों हाथों से जल नीचे जमीन पर छोड़ते जाये। ध्यान दे तांबे के पात्र को अपने सीने के सामने रखे और सूर्य देव को जल अर्पित करते हुए पात्र को कंधो से ऊपर तक ले जाने का प्रयास करें। पात्र द्वारा नीचे गिरने वाली जलधारा में सूर्य के प्रतिबिम्ब के दर्शन करने का प्रयास करें। सूर्य को जल देते समय निरंतर इस मंत्र का जप करते जाए : ” ॐ सूर्याय नमः ” । सूर्य को जल देने के उपरान्त नीचे झुककर जल को स्पर्श करे और अंत में खड़े होकर हाथ जोड़ते हुए सूर्य देव को प्रणाम करें । सूर्य को जल देते समय ये गल्तियाँ भूलकर भी न करें : – बिना स्नान किये सूर्य को जल कभी न दें। सूर्य को जल देते समय आपका मुख सूर्य की ओर ही होना चाहिए। और भूलकर भी पिता का अनादर न करें। कभी बादल होने के कारण सूर्य देव न दिखें तो जल देते समय आपका मुख पूर्व दिशा की तरफ ही होना चाहिए। सूर्य को जल देते समय जल पात्र को सिर से नीचे न रखे। जल पात्र को सिर से ऊपर ही रखे इससे सूर्य की किरणें सीधे आप पर पढ़ती है। जल पात्र को दोनों हथेलियों में इस तरह पकड़े कि आपकी उंगलियां व अंगूठा जलपात्र को न छुए। सूर्य को जल देते समय चांदी, शीशे, स्टील, प्लास्टिक, के पात्र का उपयोग नहीं करें केवल मात्र लोहे या तांबे के पात्र का उपयोग करना चाहिये। यदि आप समय के अभाव रहते प्रतिदिन सूर्य देव को जल देने के लिए समय नहीं निकाल पाते है तो कम से कम रविवार के दिन अवश्य ही उन्हें जल अर्पित करें। रविवार सूर्य देव का दिन होता है। इस दिन सूर्य देव की आराधना करना विशेष रूप से फलदायी होता है।
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*उत्तर-पूर्व में शौचालय वास्तु दोष के साथ साथ बहुत अधिक मानसिक कष्ट देता है* कहीं आप मानसिक तनाव से ग्रसित है, क्या आपका व्यापार घाटे में जा रहा है , कर्ज और बीमारी आपका पीछा नहीं छोड़ती , अपने बच्चों की पढ़ाई और उनके करियर को लेकर चिंतित है , इन सब बातों का कारण वास्तु दोष हो सकता है। और इसमें सबसे बड़ा वास्तु दोष उत्तर पूर्व में बना शौंचालय होता है , अगर कुंडली में 2 घर का उप नक्षत्र स्वामी राहु होता है या राहु २ घर में बैठा होता हो तो ईशान कोण में वस्तु दोष जरूर होता है और अगर राहु के दशा से चल रही हो तब तो ये और प्रभावी हो जाता है। शौंचालय राहु से सम्बंधित होता है , यानि की नकारात्मक ऊर्जा ईशान कोण (उत्तर पूर्व दिशा) बहुत ही पवित्र दिशा है , ईशान कोण यानि की देव का दिशा यहाँ भगवान शिव का वास होता है यहाँ वास्तु पुरुष का मस्तिस्क होता हैं और यहाँ से आने वाली चुम्बकीये ऊर्जा बहुत ही पवित्र होती है और इसे पवित्र रखना चाहिए। अगर इस जगह पर शौंचालय होता है तो ईशान कोण से आने वाली चुम्बकीये ऊर्जा नकारात्मक हो जाती हैं। , ईशान कोण जल तत्व है और शौंचालय पृथ्वी तत्व है पृथ्वी का काम है जल को सोख लेना यानि की पृथ्वी जल के लिय विरोधी तत्व का काम करता है साथ ही साथ शौंचालय राहु है जिससे इस दिशा से आने वाली सभी सकारात्मक ऊर्जा यानि की दैविक ऊर्जा ख़त्म हो जाता है और राहु की ऊर्जा में वृद्धि हो जाता है और इस वजह से घर में रहने वाले सभी लोगो के मन नकारात्मक विचार आने लगते है और साथ ही साथ शौंचालय dispose करने का काम करता है जिससे की हमारे मन में , दिमाग में जो भी अच्छी विचार आते है वो सब ख़त्म हो जाते है या बर्बाद हो जाते है और अपने जीवन में कुछ नया नहीं कर पाते है। जिससे घर में कई तरह की परेसानी आने लगती है.... www.shivshaktijyotish.co.in www.jyotshi.com
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गुरुदेव बृहस्पति के विषम फल, कारण और निवारण 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ आज तक हम लोग गुरु को सौरमंडल का सिर्फ एक ग्रह तक ही सीमित कर पाए है, गुरु ग्रह नही बल्कि एक सकारात्मक आकर्षण होता हैं, जैसे शिखा बांधने का सकारात्मक प्रभाव पड़ता हैं, उसी तरह सिर पर पल्लू लेने का भी असर होता हैं, हम किसी भी बात का एक पहलू ही देख पाते हैं, दूसरा नही देखते, जैसे हम ये देखते की वो हीरोइन या वो महिला तो किसी के सामने सिर नही ढकती, या कम कपड़ो के रहती , फिर वो तो सफल है या ऊंचाई पर है, पर क्या आपने उनकी पारिवारिक स्थिति देखी या आपने उनको नजदीक से देखा। उनके जीवन मैं तलाक, शराब, खुलापन कितना बढ़ गया। कब वो किसकी थी, किसकी हो जाती, बहुत सी बातें होती जो लेख मैं सम्भव नही। ये बात सच है की आजादी के इस युग मैं मनचाहे कपड़े पहनने की आजादी हो गई, पर आजादी और संस्कार दोनों अलग अलग होते हैं। अब जींस, पेंट, टी शर्ट की दुनिया मैं सिर पर पल्लू , चुनरी आदि के संस्कार लुप्त प्रायः हो गए। जब लड़कियों को मन्दिर मैं आरती करते वक्त देखा जाता तो जीन्स पेंट पर बिना पल्लू, या बिना चुनरी ढके आरती करती है, आप खुद ही सोचिये क्या ये संस्कार उचित है। महिलाओं की बात छोड़ो, जो पुरुष भी बिना वजह बदन की नुमाइश करता उसका गुरु ग्रह भी खराब हो जाता है। महिलाओं का जीवन उनके पति बच्चों और घर -गृहस्थी में सिमटा होता है। जन्म कुंडली में बृहस्पति खराब हो तो वह महिला को स्वार्थी, लोभी और क्रूर विचार धारा की बना देता है। दाम्पत्य जीवन में दुखों का समावेश होता है और संतान की ओर से भी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पेट और आंतों के रोग हो जाते हैं। अगर जन्म- कुंडली में बृहस्पति शुभ प्रभाव दे तो महिला धार्मिक, न्याय प्रिय, ज्ञानवान, पति प्रिया और उत्तम संतान वाली होती है। ऐसी महिलाएं विद्वान होने के साथ -साथ बेहद विनम्र भी होती है। कुछ कुंडलियों में बृहस्पति शुभ होने पर भी उग्र रूप धारण कर लेता है तो स्त्री में विनम्रता की जगह अहंकार भर जाता है। वह अपने समक्ष सभी को तुच्छ समझती है क्योंकि बृहस्पति के शुभ होने पर उसमें ज्ञान की सीमा नहीं रहती। वह सिर्फ अपनी ही बात पर विश्वास करती है।अपने इसी व्यवहार के कारण वह घर और आस-पास के वातावरण से कटने लगती है और धीरे- धीरे अवसाद की और घिरने लग जाती है क्योंकि उसे खुद ही मालूम नहीं होता की उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है। यही अहंकार उस में मोटापे का कारण भी बन जाता है। वैसे तो अन्य ग्रहों के अशुभ प्रभाव से भी मोटापा आता है मगर बृहस्पति के अशुभ प्रभाव से मोटापा अलग ही पहचान में आता है यह शरीर में थुल थूला पन अधिक लाता है क्योंकि की बृहस्पति शरीर में मेद कारक भी है तो मोटापा आना स्वाभाविक ही है। कमजोर बृहस्पति हो तो पुखराज रत्न धारण किया जा सकता है, पर लग्न कौन सा है, देखकर ही पहने गुरुवार का व्रत करें, सोने का धारण करें, पीले रंग के वस्त्र पहनें और पीले भोजन का ही सेवन करें। एक चपाती पर एक चुटकी हल्दी लगाकर खाने से भी बृहस्पति अनुकूल होता है। उग्र बृहस्पति को शांत करने के लिए बृहस्पति वार का व्रत करना, पीले रंग और पीले रंग के भोजन से परहेज करना चाहिए बल्कि उसका दान करना चाहिए। केले के वृक्ष की पूजा करें और विष्णु भगवान् को केले का भोग लगाएं और छोटे बच्चों, मंदिरों में केले का दान और गाय को केला खिलाना चाहिए। अगर दाम्पत्य जीवन कष्टमय हो तो हर बृहस्पति वार को एक चपाती पर आटे की लोई में थोड़ी सी हल्दी , देसी घी और चने की दाल ( सभी एक चुटकी मात्र ही ) रख कर गाय को खिलाएं। कई बार पति-पत्नी अगल -अलग जगह नौकरी करते हैं और चाह कर भी एक जगह नहीं रह पाते तो पति -पत्नी दोनों को ही बृहस्पति को चपाती पर गुड की डली रख कर गाय को खिलानी चाहिए। सबसे बड़ी बात यह के झूठ से जितना परहेज किया जाय, बुजुर्गों और अपने गुरु, शिक्षकों के प्रति जितना सम्मान किया जायेगा उतना ही बृहस्पति अनुकूल होता जायेगा। जिन महिलाओं या पुरुष का गुरु उच्च राशि का हो वो अपने पहने हुए कपड़े भी दान नही करे, साथ ही जो महिलाएं मॉल आदि मैं ड्रेस खरीदने के पहले पहन कर देखती हैं, क्या आप जानती हो कि उसके पहले उस ड्रेस को किसने पहनकर देखा? किसी और कि नकारात्मकता उस ड्रेस मैं पहले से होकर आपके साथ आ जाती हैं।
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