http://WWW.SHIVSHAKTIJYOTISH.CO.IN
http://WWW.SHIVSHAKTIJYOTISH.CO.IN

Checking delivery availability...

background-sm
Search
Home All Updates (432) Page 1 73
update image
*पूजा में आरती करना जरूरी क्यों?* *आरती करने के नियम एवं अन्य बातों की जानकारी इस पोस्ट में पढिये-* आरती (नीराजन) विशेष हमें आरती कैसे करना चाहिए क्या है आरती का महत्व आरती कितने प्रकार की होती है तथा पूजा के बाद क्यों जरूरी है आरती ? हिन्दू धर्म मे पूजा उपरांत आरती करने का विशेष महत्त्व है इसके बिना कोई भी पूजा पूर्ण नही मानी जाती मान्यता के अनुसार जो त्रुटि पूजन में रह जाती है वह आरती में पूरी हो जाती है। आरती का धार्मिक महत्व होने के साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। याद कीजिए आरती की थाल में कौन कौन सी वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। आपके दिमाग में रुई, घी, कपूर, फूल, चंदन जरूर आ गया होगा। रुई शुद्घ कपास होता है इसमें किसी प्रकार की मिलावट नहीं होती है। इसी प्रकार घी भी दूध का मूल तत्व होता है। कपूर और चंदन भी शुद्घ और सात्विक पदार्थ है। जब रुई के साथ घी और कपूर की बाती जलाई जाती है तो एक अद्भुत सुगंध वातावरण में फैल जाती है। इससे आस-पास के वातावरण में मौजूद नकारत्मक उर्जा भाग जाती है और सकारात्मक उर्जा का संचार होने लगता है। आरती में बजने वाले शंख और घड़ी-घंटी के स्वर के साथ जिस किसी देवता को ध्यान करके गायन किया जाता है उसके प्रति मन केन्द्रित होता है जिससे मन में चल रहे द्वंद का अंत होता है। हमारे शरीर में सोई आत्मा जागृत होती है जिससे मन और शरीर उर्जावान हो उठता है। और महसूस होता है कि ईश्वर की कृपा मिल रही है। स्कन्द पुराण में कहा गया है मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत् कृतं पूजनं हरे:। सर्वं सम्पूर्णतामेति कृते निराजने शिवे।। अर्थात - पूजन मंत्रहीन तथा क्रियाहीन होने पर भी नीराजन (आरती) कर लेने से उसमे सारी पूर्णता आ जाती है। आरती करने का ही नहीं, देखने का भी बड़ा पूण्य फल प्राप्त होता है। हरि भक्ति विलास में एक श्लोक है नीराजनं च यः पश्येद् देवदेवस्य चक्रिण:। सप्तजन्मनि विप्र: स्यादन्ते च परमं पदम।। अर्थात - जो भी देवदेव चक्रधारी श्रीविष्णु भगवान की आरती देखता है, वह सातों जन्म में ब्राह्मण होकर अंत में परम् पद को प्राप्त होता है। श्री विष्णु धर्मोत्तर में कहा गया है धूपं चरात्रिकं पश्येत काराभ्यां च प्रवन्देत। कुलकोटीं समुद्धृत्य याति विष्णो: परं पदम्।। अर्थात - जो धुप और आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह करोड़ पीढ़ियों का उद्धार करता है और भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है। आरती में पहले मूल मंत्र (जिस देवता का, जिस मंत्र से पूजन किया गया हो, उस मंत्र) के द्वारा तीन बार पुष्पांजलि देनी चाहिये और ढोल, नगाड़े, शख्ङ, घड़ियाल आदि महावाद्यो के तथा जय-जयकार के शब्दों के साथ शुभ पात्र में घृत से या कर्पूर से विषम संख्या में अनेक बत्तियाँ जलाकर आरती करनी चाहिए। ततश्च मुलमन्त्रेण दत्त्वा पुष्पाञ्जलित्रयम्। महानिराजनं कुर्यान्महावाद्यजयस्वनैः।। प्रज्वलेत् तदर्थं च कर्पूरेण घृतेन वा। आरार्तिकं शुभे पात्रे विषमानेकवर्दिकम्।। अर्थात - साधारणतः पाँच बत्तियों से आरती की जाती है, इसे 'पञ्चप्रदीप' भी कहते है। एक, सात या उससे भी अधिक बत्तियों से आरती की जाती है। कर्पूर से भी आरती होती है। पद्मपुराण में कहा है कुङ्कुमागुरुकर्पुरघृतचंदननिर्मिता:। वर्तिका: सप्त वा पञ्च कृत्वा वा दीपवर्तिकाम्।। कुर्यात् सप्तप्रदीपेन शङ्खघण्टादिवाद्यकै:। अर्थात - कुङ्कुम, अगर, कर्पूर, घृत और चंदन की पाँच या सात बत्तियां बनाकर शङ्ख, घण्टा आदि बाजे बजाते हुवे आरती करनी चाहिए। आरती के पाँच अंग होते है। पञ्च नीराजनं कुर्यात प्रथमं दीपमालया। द्वितीयं सोदकाब्जेन तृतीयं धौतवाससा।। चूताश्वत्थादिपत्रैश्च चतुर्थं परिकीर्तितम्। पञ्चमं प्रणिपातेन साष्टाङ्गेन यथाविधि।। अर्थात प्रथम दीपमाला के द्वारा, दूसरे जलयुक्त शङ्ख से, तीसरे धुले हुए वस्त्र से, आम व् पीपल अदि के पत्तों से और पाँचवे साष्टांग दण्डवत से आरती करें। आदौ चतुः पादतले च विष्णो द्वौं नाभिदेशे मुखबिम्ब एकम्। सर्वेषु चाङ्गेषु च सप्तवारा नारात्रिकं भक्तजनस्तु कुर्यात्।। अर्थात आरती उतारते समय सर्वप्रथम भगवान की प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार घुमाए, दो बार नाभिदेश में, एक बार मुखमण्डल पर और सात बार समस्त अंङ्गो पर घुमाए। यथार्थ में आरती पूजन के अंत में इष्टदेवता की प्रसन्नता के हेतु की जाती है। इसमें इष्टदेव को दीपक दिखाने के साथ ही उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है। आरती के दो भाव है जो क्रमशः 'नीराजन' और 'आरती' शब्द से व्यक्त हुए है। नीराजन (निःशेषण राजनम् प्रकाशनम्) का अर्थ है- विशेषरूप से, निःशेषरूप से प्रकाशित करना। अनेक दिप-बत्तियां जलाकर विग्रह के चारों ओर घुमाने का यही अभिप्राय है कि पूरा-का-पूरा विग्रह एड़ी से चोटी तक प्रकाशित हो उठे- चमक उठे, अंङ्ग-प्रत्यङ्ग स्पष्ट रूप से उद्भासित हो जाये, जिसमें दर्शक या उपासक भलिभांति देवता की रूप-छटा को निहार सके, हृदयंगम कर सके। दूसरा 'आरती' शब्द (जो संस्कृत के आर्ति का प्राकृत रूप है और जिसका अर्थ है अरिष्ट) विशेषतः माधुर्य-उपासना से सम्बंधित है। आरती-वारना का अर्थ है आर्ति-निवारण, अनिष्ट से अपने प्रियतम प्रभु को बचाना। इस रूप में यह एक तांत्रिक क्रिया है, जिसमे प्रज्वलित दीपक अपने इष्टदेव के चारों ओर घुमाकर उनकी सारी विघ्न बधाये टाली जाती है। आरती लेने से भी यही तात्पर्य है कि उनकी आर्ति (कष्ट) को अपने ऊपर लेना। बलैया लेना, बलिहारी जाना, बली जाना, वारी जाना न्यौछावर होना आदि प्रयोग इसी भाव के द्योतक है। इसी रूप में छोटे बच्चों की माताए तथा बहिने लोक में भी आरती उतारती है। यह आरती मूल रूप में कुछ मंत्रोच्चारण के साथ केवल कष्ट-निवारण के लिए उसी भाव से उतारी जाती रही है। आज कल वैदिक उपासना में उसके साथ-साथ वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी होता है तथा पौराणिक एवं तांत्रिक उपासना में उसके साथ सुंदर-सुंदर भावपूर्ण पद्य रचनाएँ भी गायी जाती है। ऋतू, पर्व पूजा के समय आदि भेदों से भी आरती गायी जाती है। बिना मंत्र के किए गए पूजन में भी आरती कर लेने से पूर्णता आ जाती है। 1.आरती दीपक से क्यों रुई के साथ घी की बाती जलाई जाती है। घी समृद्धि प्रदाता है। घी रुखापन दूर कर स्निग्धता प्रदान करता है। भगवान को अर्पित किए गए घी के दीपक का मतलब है कि जितनी स्निग्धता इस घी में है। उतनी ही स्निग्धता से हमारे जीवन के सभी अच्छे कार्य बनते चले जाएं। कभी किसी प्रकार की रुकावटों का सामना न करना पड़े। 2.आरती में शंख ध्वनि और घंटा ध्वनि क्यों आरती में बजने वाले शंख और घंटी के स्वर के साथ, जिस किसी देवता को ध्यान करके गायन किया जाता है। उससे मन एक जगह केन्द्रित होता है, जिससे मन में चल रहे विचारों की उथल-पुथल कम होती जाती है। शरीर का रोम-रोम पुलकित हो उठता है, जिससे शरीर और ऊर्जावान बनता है। 3.आरती कर्पूर से क्यों कर्पूर की महक तेजी से वायुमंडल में फैलती है। ब्रह्मांड में मौजूद सकारात्मक शक्तियों(दैवीय शक्तियां)को यह आकर्षित करती है। आरती वह माध्यम है जिसके द्वारा देवीय शक्ति को पूजन स्थल तक पहुंचने का मार्ग मिल जाता है। 4 आरती करते हुए भक्त के मन में ऐसी भावना होनी चाहिए कि मानो वह पंच-प्राणों (पूरे मन के साथ) की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति को आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानना चाहिए। यदि भक्त अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं तो यह पंचारती कहलाती है। 5 आरती दिन में एक से पांच बार की जा सकती है। घरों में आरती दो बार की जाती है। प्रातःकालीन आरती और संध्याकालीन आरती। 6 दीपभक्ति विज्ञान के अनुसार आरती से पहले भगवान को नमस्कार करते हुए तीन बार फूल अर्पित करना चाहिए। 7 उसके बाद एक दीपक में शुद्ध घी लेकर उसमें विषम संख्या में यानी कि 3, 5 या 7 बत्तियां जलाकर आरती करनी चाहिए। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है, जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं। इसके बाद कर्पूर से आरती की जाती है। कर्पूर का धुंआ वायुमंडल में जाकर मिलता है। यहां धुआं हमारे पूजन कार्य को ब्रंह्माडकीय शक्ति तक पहुंचाने का कार्य करता है। 8 किसी विशेष पूजन में आरती पांच चीजों से की जा सकती है। पहली धूप से, दूसरी दीप से, तीसरी धुले हुए वस्त्र से, कर्पूर से, पांचवी जल से। कैसे सजाना चाहिए आरती का थाल आरती के थाल में एक जल से भरा लोटा, अर्पित किए जाने वाले फूल, कुमकुम, चावल, दीपक, धूप, कर्पूर, धुला हुआ वस्त्र, घंटी, आरती संग्रह की किताब रखी जाना चाहिए। थाल में कुमकुम से स्वस्तिक की आकृति बना लें। थाल पीतल या तांबे का लिया जाना चाहिए। आरती करने की विधि 1 भगवान के सामने आरती इस प्रकार से घुमाते हुए करना चाहिए कि ऊँ जैसी आकृति बने। 2 अलग-अलग देवी-देवताओं के सामने दीपक को घुमाने की संख्या भी अलग है, जो इस प्रकार है। भगवान शिव के सामने तीन या पांच बार घुमाएं। भगवान गणेश के सामने चार बार घुमाएं। भगवान विष्णु के सामने बारह बार घुमाएं। भगवान रूद्र के सामने चौदह बार घुमाएं। भगवान सूर्य के सामने सात बार घुमाएं। भगवती दुर्गा जी के सामने नौ बार घुमाएं। अन्य देवताओं के सामने सात बार घुमाएं। यदि दीपक को घुमाने की विधि को लेकर कोई उलझन हो रही हो तो आगे दी गई विधि से किसी भी देवी या देवता की आरती की जा सकती है। 3 आरती अपनी बांई ओर से शुरू करके दाईं ओर ले जाना चाहिए। इस क्रम को सात बार किया जाना चाहिए। सबसे पहले भगवान की मूर्ति के चरणों में चार बार, नाभि देश में दो बार और मुखमंडल में एक बार घुमाना चाहिए। इसके बाद देवमूर्ति के सामने आरती को गोलाकार सात बार घुमाना चाहिए। 4 पद्म पुराण में आरती के लिए कहा गया है कि कुंकुम, अगर, कपूर, घी और चन्दन की सात या पांच बत्तियां बनाकर अथवा रुई और घी की बत्तियां बनाकर शंख, घंटा आदि बजाते हुए आरती करनी चाहिए। 5 भगवान की आरती हो जाने के बाद थाल के चारों ओर जल घुमाया जाना चाहिए, जिससे आरती शांत की जाती है। 6 भगवान की आरती सम्पन्न हो जाने के बाद भक्तों को आरती दी जाती है। आरती अपने दाईं ओर से दी जानी चाहिए। 7 सभी भक्त आरती लेते हैं। आरती लेते समय भक्त अपने दोनों हाथों को नीचे को उलटा कर जोड़ते हैं। आरती पर से घुमा कर अपने माथे पर लगाते हैं। जिसके पीछे मान्यता है कि ईश्वरीय शक्ति उस ज्योत में समाई रहती हैं। जिस शक्ति का भाग भक्त माथे पर लेते हैं। एक और मान्यता के अनुसार इससे ईश्वर की नजर उतारी जाती है। जिसका असली कारण भगवान के प्रति अपने प्रेम व भक्ति को जताना होता है।
Send Enquiry
Read More
update image
*क्या धन टिकता नहीं। अंजना भय सताता है।। व्यपार चलता नहीं?तो इस नवरात्रि में कीजिये ये आसान उपाय-* धन संचय : यदि रुपया टिक नहीं पा रहा हो या सेविंग नहीं हो पा रही हो तो परिवार आर्थिक संकट में घिर जाता है। ऐसे में नवरात्रि या किसी शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के मंदिर में एक जटावाला नारियल, गुलाब, कमल पुष्प माला, सवा मीटर गुलाबी, सफेद कपड़ा, सवा पाव चमेली, दही, सफेद मिष्ठान्न एक जोड़ा जनेऊ के साथ माता को अर्पित करें। इसके पश्चात मां की कपूर व देसी घी से आरती उतारें तथा श्रीकनकधारा स्तोत्र का जाप करें। आर्थिक समस्याओं से छुटकारा मिलेगा। ऋ‍ण उतारना : नौरात्र के मंगलवार या किसी मंगलवार को एक नारियल पर चमेली का तेल मिले सिन्दूर से स्वस्तिक का चिह्न बनाएं। कुछ भोग (लड्डू अथवा गुड़-चना) के साथ हनुमानजी के मंदिर में जाकर उनके चरणों में अर्पित करके ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ करें। तत्काल लाभ प्राप्त होगा। अनजाना भय : शनि, राहु या केतुजनित कोई समस्या हो, कोई ऊपरी बाधा हो, बनता काम बिगड़ रहा हो, कोई अनजाना भय आपको भयभीत कर रहा हो अथवा ऐसा लग रहा हो कि किसी ने आपके परिवार पर कुछ कर दिया है, तो इसके निवारण के लिए नौरात्री में या किसी शनिवार के दिन एक जलदार जटावाला नारियल लेकर उसे काले कपड़े में लपेटें। 100 ग्राम काले तिल, 100 ग्राम उड़द की दाल तथा 1 कील के साथ उसे बहते जल में प्रवाहित करें। ऐसा करना बहुत ही लाभकारी होता है। व्यापार लाभ : कारोबार में लगातार घाटा हो रहा हो तो नवरात्रि में गुरुवार के दिन एक नारियल सवा मीटर पीले वस्त्र में लपेटकर एक जोड़ा जनेऊ, सवा पाव मिष्ठान्न के साथ आस-पास के किसी भी विष्णु मंदिर में अपने संकल्प के साथ चढ़ा दें। तत्काल ही व्यापार चल निकलेगा।
Send Enquiry
Read More
update image
*"नवरात्र में क्यों जलाते हैं अखंड ज्योत"?* नवरात्र यानि नौ दिनों तक चलने वाली देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के साथ ही इस पावन पर्व पर कई घरों में घटस्थापना होती है, तो कई जगह अखंड ज्योत का विधान है। शक्ति की आराधना करने वाले जातक अखंड ज्योति जलाकर माँ दुर्गा की साधना करते हैं। अखंड ज्योति अर्थात ऐसी ज्योति जो खंडित न हो। अखंड ज्योत पूरे नौ दिनों तक अखंड रहनी चाहिए यानी जलती रहनी चाहिए। अंखड दीप को विधिवत मत्रोच्चार से प्रज्जवलित करना चाहिए। नवरात्री में कई नियमो का पालन किया जाता है। *अखंड ज्योत का महत्व-* नवरात्री में अखंड ज्योत का बहुत महत्व होता है। इसका बुझना अशुभ माना जाता है। जहा भी ये अखंड ज्योत जलाई जाती है वहा पर किसी न किसी की उपस्थिति जरुरी होती इसे सूना छोड़ कर नहीं जाते है। अखंड ज्योत में दीपक की लौ बांये से दांये की तरफ जलनी चाहिए। इस प्रकार का जलता हुआ दीपक आर्थिक प्राप्‍ति का सूचक होता है। दीपक का ताप दीपक से 4 अंगुल चारों ओर अनुभव होना चाहिए, इससे दीपक भाग्योदय का सूचक होता है। जिस दीपक की लौ सोने के समान रंग वाली हो वह दीपक आपके जीवन में धन-धान्य की वर्षा कराता है एवं व्यवसाय में तरक्की का सन्देश देता है। निरंन्तर १ वर्ष तक अंखड ज्योति जलने से हर प्रकार की खुशियों की बौछार होती है। ऐसा दीपक वास्तु दोष, क्लेश, तनाव, गरीबी आदि सभी प्रकार की समस्याओं को दूर करता है। अगर आपकी अखंड ज्योति बिना किसी कारण के स्वयं बुझ जाए तो इसे अशुभ माना जाता। दीपक में बार-बार बत्ती नहीं बदलनी चाहिए। दीपक से दीपक जलाना भी अशुभ माना जाता है। ऐसा करने से रोग में वृद्ध‍ि होती है, मांगलिक कार्यो में बाधायें आती हैं। संकल्प लेकर किए अनुष्‍ठान या साधना में अखंड ज्योति जलाने का प्रावधान है। अखंड ज्योति में घी डालने या फिर उसमें कुछ भी बदलाव का काम साधक को ही करना चाहिए, अन्य किसी व्यक्ति से नहीं करवाना चाहिए। *अंखड ज्योत स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा-* दरअसल ऐसा माना जाता है कि मां के सामने अंखड ज्योति जलाने से उस घर में हमेशा से मां की कृपा रहती हैं। नवरात्र में अंखड दीप जलाना स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है क्योंकि घी और कपूर की महक से इंसान की श्वास और नर्वस सिस्टम बढ़िया रहता है। नवरात्र में अखंड दीप जलाने से मां कभी अपने भक्तों से नाराज नहीं होती हैं। नवरात्र में अखंड ज्योति से पूजा स्थल पर कभी भी अनाप-शनाप चीजों का साया नहीं पड़ता है। नवरात्र में घी या तेल का अखंड दीप जलाने से दिमाग में कभी भी नकारात्मक सोच हावी नहीं होती है और चित्त खुश और शांत रहता है। घर में सुगंधित दीपक की महक चित्त शांत रखता है जिसके चलते घर में झगड़े नहीं होते, वातावरण शांत रहता है।
Send Enquiry
Read More
update image
*चैत्र वासन्तिक नवरात्रि 6 अप्रैल 2019से 13 अप्रैल 2019 तक प्रतिदिन करे सर्व मनोकामना पूर्ति तथा लक्ष्मी प्राप्ति के लिये ये दुर्लभ प्रयोग यह प्रयोग दिखने मे साधारण है परंतु पूर्ण* *प्रभावशाली है, सिर्फ इनमे* *आपका विश्वास अटूट होना* *चाहिये क्यूके यह सभी* *प्रयोगआदि शक्ति माँ भवानी* *दुर्गा के है जो इस संसार की जगत* *जननी एवं एवं सभी प्राणीयो की पालनहार एवं समस्त जगत की कर्ता धर्ता है-* ============================== ================================ नीचे बताये गये प्रयोगो को करने वाले साधक को प्रतिदिन स्नान आदि से नृवित्त होकर साफ़ बस्त्र धारण करेl फिर पुजाघर या मंदिर मे देवी जी की प्रतिमा के सामने देशी घी का दीपक जला कर देवी जी को स्नान कराये फिर बस्त्र अस्टगंध रोली हल्दी दुर्वा चढाये फिर लाल फूलो की माला चढाये(गुडहल)की माला लक्ष्मी जी को बहुत ही प्रिय हैl फिर धूप दीप दिखाये तथा भोग(प्रसाद) अर्पित करेl तदनुपरान्त देवी जी ध्यान करने के उपरांत ही प्रतिदिन के बताये हुए प्रयोग प्रारम्भ करेl ध्यानमंत्र... *देवि प्रपन्नार्ति हरे प्रसीदत* *प्रसीद मातर जगतोखिल्स्यl* *प्रसीद विश्वेशरि पाहि विश्वम* *त्वम ईश्वरी देवि चराचरस्यll* १> प्रथम दिवस पे लाल वस्त्र मे अपनी ३ मनोकामना बोलकर ३ लौंग बांधकर माँ के चरनो मे समर्पित करे और *“ॐ ह्रीं कामना सिद्ध्यर्थे स्वाहा”* का १०-१५ मिनिट तक जाप करे, दूसरे दिन सुबह पवित्र होकर लाल वस्त्र मे देखे कितनी लौंग बची हुयी है, अगर सारी लौंग गायब हो जाए तो समज लीजिये ३ कामनाये पूर्ण होगी, क्रिया का समय है रात्रि मे ११:३६ से ०१:४२ तक.......... २> द्वितीय दिवस पर एक स्टील के प्लेट मे कुमकुम से स्वस्तिक बनाये और उस प्लेट मे अनार का शुद्ध रस भर दीजिये और वह प्लेट माँ के चरनोमे रखिये साथ मे आरोग्य प्राप्ति की कामना करे, आप चाहे तो किसी दूसरे व्यक्ति विशेष के लिए भी कर सकते है, इस प्रयोग मे अनार के रस को देखते हुये *“ॐह्रीं आरोग्यवर्धीनीह्रीं ॐ नम:”* का ३० मिनिट तक जाप करना है, दूसरे दिन स्नान करे और फिर अनार के रस से स्नान करे और जल से फिर एक बार शुद्धोदक स्नान करे, किसी और के लिए कर रहे हो तो उनका स्नान करे, संभव ना हो तो अनार के रस को पीपल के वृक्ष मे चढ़ा दीजिये मणिकान्त पाण्डेय ज्योतिषाचार्य प्रयागराज यूपी पूजा योग का समय शाम को ६:३० से ८ बजे तक...... ३> तृतीय दिवस पर ७ काली मिर्च के दाने लीजिये उसे सर से लेकर पैरो तक ७ बार उतारिये और काले वस्त्र मे बांधकर माँ के चरनो मे समर्पित करे और मंत्र का ३६ मिनिट तक जाप कीजिये *“ॐ क्रीं सर्व दोष निवारण कुरु कुरु क्रीं फट”*, इस प्रयोग से तंत्र बाधा समाप्त होती है, प्रयोग के बाद दूसरे दिन सुबह काले वस्त्र के पोटली को जल मे प्रवाहित कर दीजिये, साधना का समय रात्रि मे १० बजे से १२:२४ तक रहेगा........... ४> चतुर्थ दिवस पर लाल वस्त्र मे कुमकुम से स्वस्तिक निकाले और स्वस्तिक पर ९ कमलगट्टे स्थापित करे, उनका पूजन करे, साथ मे २७ मिनिट तक *“ॐ श्रीं प्रसीद* *प्रसीद श्रीयै नमः”* मंत्र का जाप करे, समय होगा रात्री मे ७.५५ से १०.५८ तक॰साधना से पूर्व एवं दूसरे दिन माँ को प्रार्थना करे की मेरा जीवन आपकी कृपा से मणिकान्त पाण्डेय ज्योतिषाचार्य प्रयागराज यूपी धन-धान्य-सुख-सौभाग्य युक्त हो, और वस्त्र सहित कमलगट्टे जल मे प्रवाहित कर दे........ ५> पंचम दिवस पर पाँच हरी इलायची माँ के चरनो मे समर्पित करे और व्यवसाय वृद्धि की कामना करे, साथ मे श्री सूक्त का ५ बार पाठ करे, और दूसरे दिन इलायची को किसी डिबिया मे संभाल कर रखे तो शीघ्र ही व्यवसाय मे वृद्धि एवं लाभ की प्राप्ति होती हे। साधना समय शाम ६.३० से रात्री ११ बजे तक........ . ६> षष्टम दिवस पर पाँच केले माँ के चरनो मे समर्पित करे और माँ से गुरुकृपा प्राप्ति की कामना करे और *“ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शक्ति सिद्धये नमः”* का ४५ मिनिट तक जाप करे॰ साधना का समय दोपहर ४.३० से रात्री मे ९ बजे तक रहेगा। दूसरे दिन केले छोटे बालको मे बाँट दे..... ७> सप्तम दिवस पर १०८ हरी चूड़िया माँ के चरनो मे समर्पित करे, और माँ से पंडित मणि कान्त पाण्डेय ज्योतिषाचार्य प्रयागराज यूपी। बल, बुद्धि, विद्या एवं सुख प्राप्ति की कामना करे साथ मे *“ॐ नमोभगवती जगदंबा* *सर्वकामना सिद्धि ॐ”* का ३२४ बार उच्चारण करे तथा दूसरे दिन १२-१२ चूड़िया ९ कन्याओ मे बाँट दे....साधना का समय रात्री ९ बजे से १.३० बजे तक....... ८> अष्टम-नवम दिन पर दो समय साधना करनी हैं, को सुबह ६ से ७.४७ के शुभ समय पर १०९ लौंग की माला मणि कान्त पाण्डेय प्रयागराज यूपी। बनाये जिस मे १ लौंग मेरु होगा और इसी माला से *“ॐ ७ ४ १ ५ २ ३ ६ ॐ दूं दुर्गायै नमः”* इस विशेष अंक मंत्र का १ माला जाप करे, मंत्र का उच्चारण होगा *“ॐ सात चार एक पाँच दो तीन छ: ॐदूं दुर्गायै नमः”*, मंत्र जाप के बाद माला को किसी दुर्गा जी के मंदिर जाकर शेर के गले मे पहना दे और अपनी विशेष कामना शेर के कान मे बोल दे या फिर आप माला को जहा कही दुर्गा जी के विग्रह की स्थापना हूई हो वहा भी यह कार्य कर सकते है, माला पहेनाने का समय होगा दोपहर मे ११:३० से १२:३० तक....... ९> नवमी तिथि को ९ कुँवारी कन्या का पूजन करे और उन्हे उपहार स्वरूप काजल की डिब्बिया अवश्य दे, और ज्यादा से ज्यादा त्रि-शक्ति मंत्र का जाप करे *“ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ॐनमः”* , कुँवारी कन्या पूजन का समय होगा सुबह ७:४८ से रात्री ६:५७ तक.................... १०> यह दिवस विजय प्राप्ति का सर्व श्रेष्ठ दिवस है ज्यादा से मणि कान्त पाण्डेय प्रयागराज यूपी। ज्यादा गुरुमंत्र का जाप करे एवं *“ॐ रां रामाय नमः”* का जाप करे अवश्य ही आपको जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे पूर्ण विजय प्राप्ति होगीl *ऊपरोक्त प्रयोग बहुत ही सिद्ध एवं आजमाये हुए प्रयोग है l इन प्रयोगो को कोई भी कर सकता है चाहे कोई पुरुष हो या स्त्री lअत: इस प्रयोग को केवल अपने कल्याण हेतु ही प्रयोग करे इन प्रयोगो मे पूर्ण आस्था एवं माता रानी के प्रति विस्वास का होना परम ही आवश्यक हैl जहा तक संभव हो सके साधना पूर्ण शांतिमय स्थान पुजाघर या किसी मंदिर मे करेl खुद के विचारो पर सँयम रखेl तथा ब्रह्मचर्य का पालन करेl तथा अपने बडो बुजुर्गो का आशीर्वाद ले तथा स्त्री का पूर्ण सम्मान करना परम ही आवश्यक हैl* मित्रो अगर आप मुझसे किसी विषय पर गम्भीरता से बात करना चाहते हैं तो वो समयाभाव के कारण फेसबुक पर या मैसेज के माद्दयम से सम्भव् नहीं है आप मुझसे अपनी कुंडली की विवेचना करवाना चाहते हैं या आप की कोई भी समस्या है तो आप मुझे मेरे मोबाइल नम्बर 09755555085 पर प्रति दिन दोपहर 11बजे से शाम7बजे तक फोन कर सकते है या इसी नम्बर पर वाट्सऐप पर मेसेज कर के टाइम ले सकते है। नोट मेरी सभी सेवाएं सशुल्क है। llजय श्री रामll जय माता दीll जय शिव शक्तिll
Send Enquiry
Read More
update image
*होली पर धन प्राप्ति के सरल उपाय-* आज हम आपको जो उपाय बताने जा रहे है वह सभी के लिये अत्यंत लाभदायक है। इस उपाय के प्रभाव से आपके घर एवं व्यावसायिक क्षेत्र की सारी नकारात्मक उर्जा समाप्त होगी नकारत्मकता समाप्त होने के बाद ही माँ लक्ष्मी का स्थायी निवास सम्भव हो पाता है। उपाय ४👉 आपके निवास के पास जब होली जल जाए तब आप होली की थोड़ी सी अग्नि लाकर अपने निवास व व्यवसाय स्थल के बाहर आग्नेय कोण की ओर उस अग्नि की सहायता से एक सरसो के तेल का दीपक जला दें। इस दीपक की मदद से एक दूसरा दीपक जलाएं और मुख्य द्वार के बाहर रख दें। जब दीपक जल कर ठंडा हो जाये तो इसे किसी चौराहे पर जाकर फोड़ दे और बिना पीछे देखे सीधे घर आ जाये। अंदर आने से पहले अपने हाथ पांव अवश्य धो लें। इस उपाय के प्रभाव से आपके निवास एवं व्यवसाय की सारी नकारत्मक उर्जा जलकर समाप्त हो जाएगी। उपाय ५ 👉 आप होली की रात्रि में होलिका दहन से पहले अपने घर अथवा व्यवसाय के मंदिर में माँ लक्ष्मी को रोली व गुलाल मिलाकर तिलक करें। शुद्ध घी का दीपक, धूप बत्ती दिखाने के बाद पीले रंग का भोग अर्पण करें इसके बाद माँ के चरणों मे पीला गुलाल व ३ गौमती चक्र अभिमंत्रित करने के बाद अर्पित करें। माँ के सामने लाल अथवा सफेद ऊनि आसान पर बैठकर कमलगट्टे की माला से ५ माला "(श्रीं ह्रीं श्रीं कमलवासिन्यै नमोस्तुते)" का जाप करें जाप के बाद पृथ्वी पर जल छोड़े उसे माथे पर लगाकर उठ जाए। अब अगले दिन माँ के चरणों से गौमती चक्र और पीला गुलाल उठाकर एक लाल वस्त्र मे बांधकर घर के शुद्ध स्थान पर रख दें। इस उपाय से माँ लक्ष्मी के चरण एक वर्ष आपके घर मे रहेंगे ऐसी आस्था रखें अगले वर्ष पुनः इस उपाय को करने से पहले पुरानी पोटली को होलिनसे एक दिन पहले धूप दीप दिखाकर बहते जल में प्रवाहित कर दें। इस प्रयोग को प्रत्येक वर्ष होली पर अवश्य करें। उपाय ६ 👉 होली की रात्रि में आप एक चांदी का गिलास अथवा कटोरी लेकर उसमे जल भर कर थोड़ा गंगाजल मिला दें सम्भव हो तो गंगाजल ही लें अब इसमें ३-३ अभिमंत्रित गौमती चक्र और धनकारक कौड़िया डाल दें। माँ लक्ष्मी के विग्रह पर लाल गुलाल और रोली मिलाकर तिलक करें धूप दीप दिखाकर खीर का भोग अर्पण करें चरणों मे भी लाल गुलाल अर्पण करें इसके बाद अधिक से अधिक संख्या में श्री लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करें पाठ के बाद 5 माला श्री लक्ष्मीभ्यो नमोस्तुते का जप करें। जप के बाद उस जल को पूजा स्थल पर ही रखा रहने दें अगले दिन एक लकड़ी अथवा चांदी की डिब्बी में माँ के चरणों से लाल गुलाल उठाकर भर दें तथा जल में से गौमती चक्र और कौड़िया निकाल कर डिब्बी में रख दें डिब्बी में गुलाल कम हो तो अलग से गुलाल लेकर डिब्बी को पूरा भर दें और एक लाल रेशमी वस्त्र में बांधकर धन वाले स्थान पर रख दें आपके पास जो जल बचा है उसे निवास स्थान की दीवारों पर छिड़क दें। उपाय ७👉 यदि आपको लगता है कि आपको मेहनत के अनुसार आय नही मिल रही है तथा निवास - व्यवसाय में कोई नकारात्मक ऊर्जा है अथवा किसी नजर के प्रभाव से हानि उठानी पड़ रही है तो आप होली जलने से पहले होलिकादहन वाले स्थान पर रात्रि के समय उस जमीन की पश्चिम दिशा में छोटा गड्ढा कर ४ बड़ी कीलें दबा दें किलो के ऊपर ११ लौंग रख हरा गुलाल भरने के बाद ऊपर से मिट्टी से ढक दें। जब होलिकादहन का समय हो तब एक पान पत्ते पर ५ बताशे, एक छोटी कील, एक लौंग का जोड़ा, कुछ काले तिल व पीली सरसों रखकर एक अन्य दूसरे पान के पत्ते से ढक दें। उस पान के पत्ते पर सात बताशे रखें इसके बाद परिक्रमा आरम्भ करें। प्रत्येक परिक्रमा की समाप्ति पर एक बताशा होलिका में अर्पित करते जाए सात परिक्रमा पूर्ण होने पर अंतिम परिक्रमा में पान के पत्ते पर रखी सामग्री भी होलिका में अर्पित कर प्रणाम कर आ जाएं। होली की मध्यरात्रि में शरीर शुद्धि के बाद मा लक्ष्मी को गुलाल से तिलक कर धूप, दीप, भोग अर्पण कर लाल आसन पर बैठ कर कमलगट्टे की माला से (श्रीं ह्रीं श्रीं लक्ष्मीनारायण नमोस्तुते) निम्न मंत्र का कम से कम ५ माला जप करें जप के बाद धरती पर जल छोड़ उसे सर से लगा कर उठ जाए। अगके दिन आप होलिकादहन स्थान पर जाकर गड्ढे से चारो कीले निकाल कर अपने निवास अथवा व्यवसाय के चारो कोनो में बाहर की ओर एक-एक कील ठोक दें इसके प्रभाव से आपका निवास एवं व्यवसाय नकारात्मक ऊर्जा के प्रबहव से बचा रहेगा। उपाय ८ 👉 होली की रात्रि में आप माँ लक्ष्मी को पूरे भाव से लाल गुलाल से तिलक करें शुद्ध घी का २ दीपक दोनो तरफ जलाए एवं धूप दिखाकर खीर का भोग लगाये इसके बाद एक लाल वस्त्र में लाल गुलाल व एक पीले वस्त्र में पीला गुलाल रख दोनो को पोटली का रूप देकर माँ लक्ष्मी के चरणों मे रख दें इसके बाद (ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं श्री महालक्षमये नमः) निम्न मंत्र का ११ माला जप करें जप के बाद धरती पर जल छोड़ उसे सर से लगाकर उठ जाए।अगके दिन दोनो पोटलियों को पहले माँ को धूप दीप भोग अर्पण करने के बाद पोटली को भी धूप दीप दिखाकर धन वाले स्थान पर रख दें इसके बाद इसका प्रभाव स्वयं अनुभव करें। उपाय ९ 👉 होली की रात्रि में आप अपने निवास के पूजा स्थल में एक लाल वस्त्र पर नागकेशर बिछाकर उस के ऊपर एक प्रतिष्ठित श्री यंत्र को स्थापित करें यंत्र को लाल गुलाल से तिलक कर घी का दीपक जलाये और धूप दिखाए इसके बाद खीर का भोग लगाएं इसके बाद श्री यंत्र के सामने आसान लगाकर पहले श्री ललिता सहस्त्रनाम का पाठ करे इसके बाद (ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं श्री महालक्षमये नमः) मंत्र की ११ माला जप करे जप कर भूमि पर जल छिड़क उसे माथे से लगाकर उठ जाए अगले दिन प्रातः ही श्री यंत्र को पुनः मंदिर में प्रतिष्ठित कर लाल वस्त्र को नागकेशर समेत उठाकर बांधकर धन रखने के स्थान पर रख दें यह उपाय कितना लाभ देगा आप स्वयं ही अनुभव करेंगे।
Send Enquiry
Read More
update image
*श्री गणेश की दाईं सूंढ़ या बाईं सूंढ़?* अक्सर श्री गणेश की प्रतिमा लाने से पूर्व या घर में स्थापना से पूर्व यह सवाल सामने आता है कि श्री गणेश की कौन सी सूंड होनी... चाइये ? क्या कभी आपने ध्यान दिया है कि भगवान गणेश की तस्वीरों और मूर्तियों में उनकी सूंड दाई या कुछ में बाई ओर होती है। सीधी सूंड वाले गणेश भगवान दुर्लभ हैं। इनकी एकतरफ मुड़ी हुई सूंड के कारण ही गणेश जी को वक्रतुण्ड कहा जाता है। भगवान गणेश के वक्रतुंड स्वरूप के भी कई भेद हैं। कुछ मुर्तियों में गणेशजी की सूंड को बाई को घुमा हुआ दर्शाया जाता है तो कुछ में दाई ओर। गणेश जी की सभी मूर्तियां सीधी या उत्तर की आेर सूंड वाली होती हैं। मान्यता है कि गणेश जी की मूर्त जब भी दक्षिण की आेर मुड़ी हुई बनाई जाती है तो वह टूट जाती है। कहा जाता है कि यदि संयोगवश आपको दक्षिणावर्ती मूर्त मिल जाए और उसकी विधिवत उपासना की जाए तो अभिष्ट फल मिलते हैं। गणपति जी की बाईं सूंड में चंद्रमा का और दाईं में सूर्य का प्रभाव माना गया है। प्राय: गणेश जी की सीधी सूंड तीन दिशाआें से दिखती है। जब सूंड दाईं आेर घूमी होती है तो इसे पिंगला स्वर और सूर्य से प्रभावित माना गया है। एेसी प्रतिमा का पूजन विघ्न-विनाश, शत्रु पराजय, विजय प्राप्ति, उग्र तथा शक्ति प्रदर्शन जैसे कार्यों के लिए फलदायी माना जाता है। वहीं बाईं आेर मुड़ी सूंड वाली मूर्त को इड़ा नाड़ी व चंद्र प्रभावित माना गया है। एेसी मूर्त की पूजा स्थायी कार्यों के लिए की जाती है। जैसे शिक्षा, धन प्राप्ति, व्यवसाय, उन्नति, संतान सुख, विवाह, सृजन कार्य और पारिवारिक खुशहाली। सीधी सूंड वाली मूर्त का सुषुम्रा स्वर माना जाता है और इनकी आराधना रिद्धि-सिद्धि, कुण्डलिनी जागरण, मोक्ष, समाधि आदि के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। संत समाज एेसी मूर्त की ही आराधना करता है। सिद्धि विनायक मंदिर में दाईं आेर सूंड वाली मूर्त है इसीलिए इस मंदिर की आस्था और आय आज शिखर पर है। कुछ विद्वानों का मानना है कि दाई ओर घुमी सूंड के गणेशजी शुभ होते हैं तो कुछ का मानना है कि बाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी शुभ फल प्रदान करते हैं। हालांकि कुछ विद्वान दोनों ही प्रकार की सूंड वाले गणेशजी का अलग-अलग महत्व बताते हैं। यदि गणेशजी की स्थापना घर में करनी हो तो दाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी शुभ होते हैं। दाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी सिद्धिविनायक कहलाते हैं। ऎसी मान्यता है कि इनके दर्शन से हर कार्य सिद्ध हो जाता है। किसी भी विशेष कार्य के लिए कहीं जाते समय यदि इनके दर्शन करें तो वह कार्य सफल होता है व शुभ फल प्रदान करता है।इससे घर में पॉजीटिव एनर्जी रहती है व वास्तु दोषों का नाश होता है। घर के मुख्य द्वार पर भी गणेशजी की मूर्ति या तस्वीर लगाना शुभ होता है। यहां बाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी की स्थापना करना चाहिए। बाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी विघ्नविनाशक कहलाते हैं। इन्हें घर में मुख्य द्वार पर लगाने के पीछे तर्क है कि जब हम कहीं बाहर जाते हैं तो कई प्रकार की बलाएं, विपदाएं या नेगेटिव एनर्जी हमारे साथ आ जाती है। घर में प्रवेश करने से पहले जब हम विघ्वविनाशक गणेशजी के दर्शन करते हैं तो इसके प्रभाव से यह सभी नेगेटिव एनर्जी वहीं रूक जाती है
Send Enquiry
Read More
Page 1 73

Updates